नई सुबह नई राह -अंशु श्री सक्सेना

महक को आज की रात कितनी लम्बी लग रही थी। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी । वह यही सोच रही थी कि पुनीत से विवाह कर के उसने कितनी बड़ी ग़लती की है । उसने करवट ले कर पलंग के दूसरे कोने में सो रहे पुनीत को देखा ।वह सोचने लगी , उसके ऊपर अपना सारा ग़ुस्सा निकाल, पुनीत कितने आराम से सो रहा है….पुनीत के मन में ज़रा सी भी ग्लानि नहीं है कि आज उसने महक को कितनी बुरी तरह से मारा है । पुनीत को इस बात की बिलकुल भी परवाह नहीं है कि पलंग के दूसरे कोने में लेटी महक लगातार दो घंटों से रो रही है । महक को अपना परिवार बहुत याद आ रहा था । उसका मन यादों के गलियारों में भटकने लगा ।

महक इंजीनियर पिता और प्रोफ़ेसर माँ की बेटी थी ।दो बड़े भाइयों के बाद उसका जन्म हुआ था । उसके परिवार में दूर दूर तक रिश्तेदारों में भी कोई और लड़की नहीं थी इसलिये वह पूरे परिवार की अत्यधिक लाड़ली थी । दादी ने बड़े प्यार से उसका नाम महक रखा था, वे कहतीं थीं….

“ मेरी लाडो जिस घर भी ब्याह कर जायेगी….अपने संस्कारों की ख़ुशबू से पूरा घर महका देगी “

महक देखने में भी बेहद आकर्षक थी, दूधिया गोरा रंग….तीखे नाक नक़्श….साँचे में ढला शरीर और कमर तक लहराते काले घने बाल । जो भी उसे देखता  बस देखता ही रह जाता।महक पढ़ाई में भी बहुत होशियार थी और बड़े होकर अपने पिता की तरह ही इंजीनियर बनना चाहती थी ।अपनी तीव्र बुद्धि और कड़ी मेहनत के बल पर महक का एडमिशन देश के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया था ।



पुनीत से उसकी मुलाक़ात यहीं इसी इंजीनियरिंग कॉलेज में हुई थी ।पुनीत भी पढ़ाई में बहुत अच्छा था, और आरम्भ में तो महक और पुनीत के बीच परीक्षाओं में मिलने वाले नम्बरों के लेकर अच्छी प्रतिद्वंद्विता रहती थी । परन्तु धीरे धीरे उनके बीच दोस्ती हो गई थी ।समय के साथ यह दोस्ती प्रगाढ़ होती गई थी । फिर इस प्रगाढ़ दोस्ती के बीच कब प्रेम का अँकुर पनपने लगा दोनों को ही पता नहीं चला था ।इंजीनियरिंग के फ़ाइनल वर्ष में आते आते पूरे कॉलेज में दोनों प्रेमी जोड़े के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे ।

महक ने अब तक अपने घर पर पुनीत के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया था । उसे पता था कि पुनीत के बारे में जानकर उसके परिवार में भूचाल आ जायेगा क्योंकि एक तो पुनीत दूसरी जाति का था , दूसरा वह बहुत ग़रीब घर से ताल्लुक़ रखता था । उसके पिता ऑटो चालक थे और माँ एक साधारण गृहणीं ।वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी बैंक से लोन लेकर कर रहा था । महक जानती थी कि उसके परिवार वाले कभी भी पुनीत के साथ उसके रिश्ते को मंज़ूरी नहीं देंगे ।

फ़ाइनल वर्ष में महक और पुनीत दोनों का ही कैम्पस प्लेसमेंट हो गया था ।

अब एक दिन मौक़ा देख कर महक ने अपनी माँ को पुनीत के बारे में बताया । फिर तो वही हुआ जिसका अंदेशा था । महक के घर में तूफ़ान ने दस्तक दे दी थी । महक रो रोकर सबसे पुनीत की अच्छाइयाँ गिनाईं और अपने प्रेम के लिये गिड़गिड़ाती हुई बोली….

“ मैं पुनीत के बिना नहीं रह पाऊँगी….मुझे पुनीत से ही शादी करनी है….क्या हुआ अगर वह हमारे स्टैंडर्ड का नहीं है….अब हम दोनों मिल कर नौकरी करेंगे फिर हमें पैसों की कमी नहीं रहेगी….और जहाँ तक उसके दूसरी जाति का होने का सवाल है तो आज ज़माना बहुत बदल गया है….ये जात पात अब कोई मायने नहीं रखते “

परन्तु दादी , पापा , माँ और दोनों बड़े भाइयों ने महक के एक नहीं सुनी । महक के दोनों बड़े भाई तो पुनीत को जान से मारने की धमकी देने लगे।

पुनीत ने भी जब अपने परिवार में महक से शादी की बात की तो वे भी तैयार नहीं हुए । उनका मानना था कि बड़े घर की बहू आकर उन सब पर रौब जमायेगी ।

कोई उपाय न देख कर महक और पुनीत ने घर पर बिना बताये, दोस्तों की मौजूदगी में पहले मंदिर में और फिर कोर्ट में शादी कर ली थी । शादी के बाद महक और पुनीत दोनों का अपने अपने घरों से नाता टूट गया था ।परन्तु दोनों एक दूसरे के प्यार में डूबे हुए, एक दूसरे के साथ बेहद ख़ुश थे । दोनों की नौकरी भी अच्छी चल रही थी ।

शुरू शुरू के कुछ महीने तो पंख लगा कर उड़ गये थे, फिर धीरे धीरे उन दोनों के बीच हल्की फुल्की नोंक झोंक होने लगी थी ।

दरअसल महक ने अपनी कार्यकुशलता एवं कर्मठता से ऑफ़िस में अपनी बहुत अच्छी पहचान बना ली थी और उसको ऑफ़िस के सभी लोग विशेषकर उसके बॉस बेहद पसन्द करते थे । जबकि पुनीत का अपने बॉस से किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया था और वे उसको परेशान करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते थे । पुनीत वह नौकरी छोड़ना भी चाहता था पर उसे अपनी मनपसंद नौकरी अभी तक नहीं मिली थी।महक ने कई बार पुनीत को समझाने की कोशिश भी की थी कि वह अपने बॉस से माफ़ी माँग ले, पर पुनीत अपने पुरूष अहं के कारण ऐसा नहीं कर रहा था।

इधर कुछ दिनों से पुनीत बहुत चिड़चिड़ा हो गया था । बात बात पर महक पर चिल्ला उठता था , कई बार ग़ुस्से में घर के सामानों को इधर उधर फेंकना शुरू कर देता था । महक जितना उसे संभालने का और समझाने का प्रयास करती, वह उतना ही रौद्र रूप धारण कर लेता ।

आज तो पुनीत ने हर हद पार कर दी थी । शाम को जब पुनीत ऑफ़िस से लौटा था तब महक किचेन में खाना बना रही थी। जब उसने खाना परोसा तब पहला निवाला खाते ही पुनीत बिफर पड़ा

“ तुम्हें कब खाना बनाना आयेगा महक ? ये कैसी सब्ज़ी बनाई है ? अगर खाना बनाना नहीं आता तो नौकरी वौकरी छोड़ो और कोई कुकिंग क्लास ज्वाइन कर लो….मेरी तो मति मारी गई थी कि मैंने तुम जैसी लड़की से शादी कर ली…. तुम्हारी माँ ने तुम्हें खाना बनाना तक नहीं सिखाया… अमीर बाप की औलाद हो…..घर संभालना क्या जानोगी ? मेरे माँ पापा ठीक ही कहते थे…मुझे उन्हीं की पसन्द की लड़की से शादी करनी चाहिये थी….कम से कम दो वक़्त का खाना तो ढंग का मिलता…मैंने तो यह सोच कर तुमसे शादी की थी कि तुम्हारा बाप शादी में न सही पर बाद में हमारा घर पैसों से भर देगा…पर वह तो हमें फूटी कौड़ी भी नहीं दे रहा है “ कहते हुए उसने सब्ज़ी की कटोरी फेंक दी ।



महक के दिल की तरह ही काँच की कटोरी टूटने से पूरे घर में काँच के टुकड़े बिखर गये । यह उसी डिनर सेट की कटोरी थी, जिसे महक कुछ दिनों पहले ही बड़े चाव से ख़रीद कर लायी थी ।

“ मेरे माँ पापा को बीच में मत लाओ पुनीत…तो तुमने इस लालच में मुझसे प्यार का नाटक किया कि तुम्हें मेरे पापा की दौलत मिलेगी ? और यह कटोरी क्यों तोड़ दी ? पूरा डिनर सेट ख़राब हो गया….मैं कितने मन से ख़रीद कर लाई थी “ महक ने भी ऊँची आवाज़ में जवाब दिया ।

बस फिर क्या था, क्रोध के आवेश में उसने महक को बुरी तरह मारा ।जब वह महक को मारते मारते थक गया तो जाकर अपने कमरे में सो गया ।

महक पूरी तरह टूट चुकी थी, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कॉलेज में उस पर जान छिड़कने वाला पुनीत उसके साथ ऐसा कर सकता है….पुनीत का प्यार सिर्फ़ छलावा था ? सच में पुनीत को पापा की दौलत चाहिये ? क्या इसी दिन के लिये उसने अपने घर वालों से लड़ कर पुनीत से शादी की थी ? इसी पुनीत के लिये उसने अपने इतने प्यार करने वालों का दिल दुखाया था ? यह अपराधबोध उसे काटने को दौड़ रहा था……यही सब सोचते सोचते कब महक की आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला ।

अगले दिन सुबह जब महक की नींद खुली तो देखा पुनीत ऑफ़िस जा चुका है । वह भी जल्दी जल्दी तैयार होकर ऑफ़िस के लिये निकल पड़ी । उसके ऑफ़िस के पास ही वर्किंग वुमन हॉस्टल था । वहाँ जाकर उसने अपने रहने के लिये एक कमरे की व्यवस्था की, फिर अपने बॉस को फ़ोन किया….

“ आज मैं ऑफ़िस देर से आऊँगी सर….मुझे अपना सामान शिफ़्ट करना है “

अब वह अपराधबोध से मुक्त एक नई राह पर आगे बढ़ने के लिये तैयार थी ।

अंशु श्री सक्सेना

मौलिक एवं स्वरचित

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