” मेरे भैया ” – रणजीत सिंह भाटिया

 सरला जो की अनाथ आश्रम में पली थी l  रजत ने उससे शादी की इसलिए घर वाले उससे बहुत नाराज थे l कॉलोनी वाले सब सरला को भाभी कहते थे l एक तीन साल का प्यारा सा बेटा था सरला अपनी छोटी सी गृहस्थी मैं बहुत खुश थी l अपने आंगन में फूल सब्जियां उगाती, पूजा पाठ करती, हमेशा कुछ ना कुछ  कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी l एक दिन कॉलोनी में किसी के घर जन्मदिन  की पार्टी चल रही थी l सरला नहीं आई थी l और लोग उसी के बारे में बातें कर रहे थे ”  अनाथ है.. जात पात का कुछ पता नहीं है…ससुराल वालों ने भी नहीं अपनाया,… हम सब राखियां खरीदने बाजार जा रहे थे तो कहने लगी कि मैं भी साथ चलूंगी… कुछ भाई बहन का तो पता नहीं है भला किसे   राखी बांधेगी ” आलोक जो वहीं पास में खेल रहा था कहने लगा ” कौन कहता है कि सरला भाभी का भाई नहीं है… मैं हूं उनका भाई  “

 

                       आलोक जिसकी उम्र  केवल बारह साल की  थी l उसकी यह  बात सुनकर सब हंसने लगे लेकिन पार्वती मौसी ने यह बात जाकर सरला को बता दी, तो सरला कहने लगी कि ” क्या मैं उनके घर राखी लेकर जाऊं…?  पर वह तो बहुत ज्यादा अमीर हैं ” l पार्वती मौसी ने कहा ”  नहीं वह पैसे वाले जरूर है लेकिन वह लोग बहुत ज्यादा अच्छे लोग  हैं तू राखी लेकर जरूर जा “

 

      राखी का दिन आया और सरला ने अपने बेटे बिट्टू को गोद में उठाया और राखी लेकर आलोक के घर पहुंच गई I आलोक की माँ को सारी बात बताई आलोक की माँ ने सरला का बहुत स्वागत किया और आलोक  को आवाज लगाई  ” देखो बेटा तुम्हारी दीदी आई है… राखी बांधने के लिए ” आलोक बहुत खुशी खुशी दौड़ते हुए आया, सरला ने आलोक को राखी बांधी आलोक की माँ ने उसे कई तरह के उपहार दिए  कहा  ”  बेटा आती-जाती रहा करो तुम्हारा ही घर है l  अपने आप को अकेले मत समझना l” आलोक बिट्टू के साथ खेलने लगा बहुत ही ज्यादा खुश था l सरला की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था इतना प्यारा भैया मिला साथ में इतना प्यार करने वाला परिवार l

 

 मौलिक एवं स्वरचित

 

 लेखक 

रणजीत सिंह भाटिया 

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