मां होती तो उसके दर्द को तो समझती – किरण कुशवाहा

अंजू की शादी को डेढ़ साल हुए थे, पति अजय दूसरे शहर में नौकरी करते थे| महीने में दो-तीन दिन के लिये आते तो दिन भर तो घरवालों के साथ ही रहते तो कुछ कहने और सुनने का समय ही नहीं मिलता। इधर कुछ दिनो से अंजू कुछ भी खा रही थी तो उसे उल्टी हो जाती , जाँच में पता चला कि अंजू मां बनने वाली है।

अंजू कुछ भी खाती उसे उल्टी हो जाती इस वजह से काफी कमजोर हो गयी थी , जब तक काम करती तब तक सही रहता , जब वह उल्टी करके निढाल हो जाती और काम नहीं कर पाती तो सासूँ मां और ननद का बड़बड़ाना शुरु हो जाता। उस घर में तो दिन में लेटना जैसे अपराध माना जाता, हमेशा सुनाया जाता कि हमने भी तो बच्चे पैदा किये हैं हमने तो कभी दिन में आराम नहीं किया।

सारा दिन घर का काम करना और पौष्टिक भोजन नहीं ले पाने की वजह से वह काफी कमजोर हो गई थी।

अंजू की डिलीवरी डेट मे दो-तीन दिन थे, उसे रह-रहकर दर्द उठ रहा था , किसी तरह सुबह काम करके उठी ही थी कि सासूँ मां के मायके से तीन-चार लोग आ जाते हैं। फिर

से खाना बनने की तैयारी शुरु हो जाती है। अंजू अब दर्द से बेहाल हुई जा रही थी , उसने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था तभी अजय आता है और ” अंजू से कहता है कि जाओ मां की मदद करो।”  अंजू रोने लगती है कि ” मै अब कुछ नहीं कर पाऊंगी तुम मुझे अस्पताल ले चलो , दर्द अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।”

अन्जू को मां की बहुत याद आ रही थी कि अगर मां होती तो उसके दर्द को तो समझती पर यहाँ उसके दर्द को समझने वाला कोई नहीं था, किसी से उम्मीद करना भी बेकार था।

अंजू अस्पताल आ जाती है, अंजू की मां भी आ जाती है आते ही अंजू के सर पर हाथ फेरकर पूछती है कि ” बेटा कुछ खाया , ” वह मां के हाथों को पकड़कर रोने लगती है और कहती है ” नहीं मां मैने सुबह से कुछ नहीं खाया “




 

मां कुछ लाने के लिये जाने लगती है तो डॉक्टर मना कर देती हैं कि अब डिलीवरी के बाद ही कुछ खिलाइयेगा।

अंजू ने सुन्दर सी बेटी को जन्म दिया, मां ने नातिन को अपनी बाहों में भरकर कहा कि बिल्कुल तुम पर गयी है मेरी जूनियर अंजू आ गयी।

अंजू मुस्करा देती है।

अंजू की मां दूध और ब्रेड लाकर देती हैं तो सासूँ मां कहती हैं कि हमारे यहाँ जब तक छठी ना हो जाये तब तक अन्न नहीं दिया जाता सिर्फ चाय, दूध, गुड़ , सोंठ यही सब दिया जाता है अब तो छठी वाले दिन ही अन्न मिलेगा । आप दूध और चाय दे सकती हैं। अंजू की मां यह सुनकर अवाक रह जाती हैं कि अब चार-पांच दिन और मेरी बेटी को अन्न नही

मिलेगा पर वह कुछ नहीं कर सकती थी।

अंजू को दूसरे दिन ही शाम को अस्पताल से छुट्टी मिल गयी और वह ससुराल आ गयी। अंजू की मालिश करने वाली दस बजे तक आती कभी और देर से आती गर्मी के उमस भरे दिनों में उसका प्यास से गला सूखने लगता जब वह कहती भी कि जल्दी आया करो तो जवाब मिलता मै इतनी दूर से आती हूं , जल्दी नहीं आ सकती।

 

अंजू को पीने को पानी मिला दूध और गुड़ , सोंठ दिया जाता फिर एक कप चाय , शाम को एक गिलास दूध जिससे कि उसका पेट नहीं भरता और उसके बाद यह भी सुना दिया जाता कि वो लोग बहुत अहसान कर रहे हैं। भूख के मारे कभी-कभी पेट पकड़ कर रोने लगती पर उसको समझने वाला कोई नहीं था। वह खाना खाने के लिये तरस रही थी।

पेट ना भर पाने की वजह से वह बच्चे को भी दूध नहीं पिला पा रही थी।

वह सोच रही थी कि ये कैसे रीत-रिवाज है जो एक मां को भूख से तड़पा रहे थे , जब मां को खाने की बहुत ज्यादा जरुरत होती है तो रीतियों का हवाला देकर खाने से रोका जाय। इस दर्द को वही लोग समझ सकते हैं जो इस प्रक्रिया से गुजरे हो। क्या हमें ऐसे रीत-रिवाजों को बदलने की आवश्यकता नहीं है , आपकी क्या राय है कम्मेंट में जरुर बताएं।

 किरण कुशवाहा

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