लौट आओ अपराजिता (अंतिम भाग ) – डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

अब तक आपने पढ़ा कि कैसे कार्तिक के जाने के बाद अपराजिता सब कुछ भुलाकर अपने प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में जुट जाती है और प्रथम बार में ही सफल भी हो जाती है। सफल होने के बाद वो अपने सास ससुर की दशा देखकर कार्तिक को कहीं ना कहीं से ढूंढ निकालने का वादा करती है। अब आगे…

एक बार जब वो रात को अपनी टीम के साथ गश्त कर रही थी तो नशे में धुत कुछ विदेश से आए लोगों को पकड़ा गया जो अफीम,गांजा पी रहे थे। उनकी हालत नशे में बद से बदतर थी।उन्हीं में एक जोड़ी आंखें कुछ कुछ पहचानी सी लग रही थी। उन सभी को पकड़कर थाने में बंद कर दिया था। पर उसका मन कहीं ना कहीं उन दो आखों की तरफ खिंचा जा रहा था। उसका संदेह बिल्कुल ठीक था वो और कोई नहीं उसको मझधार में छोड़ने वाला उसका सहचर कार्तिक था,

जिसको उसने पूरे हृदय से अपनाया था। आज उसकी ऐसी हालत थी कि वो खुद भी अपनेआप से भी अनजान था। हवालात से छुड़वाकर अपराजिता ने उसको नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया। उसकी मानसिक हालत भी ठीक नहीं थी। किसी तरह अच्छे से अच्छा इलाज़ होने से कार्तिक बहुत हद तक ठीक होने लगा था।

जिस दिन उसकी छुट्टी होनी थी उस दिन उसने अपने सास-ससुर को अपने पास बुला लिया था हालांकि उसने अभी उन लोगो को कुछ नहीं बताया था। वो उनको मंदिर में दर्शन कराने के बहाने से जहां कार्तिक का इलाज़ चल रहा था वहां ले गई। अपने बेटे पर नज़र पड़ते ही उसके सास-ससुर की तो जैसे दुनिया ही बदल गई। दोनों के हाथ अपराजिता के सामने जुड़ गए।

कार्तिक भी अब ठीक था बस अभी उसको अपनी पिछली जिंदगी का ज्यादा कुछ याद नहीं था पर डॉक्टर ने आश्वासन दिया था कि जल्दी ही वो ठीक हो जायेगा। अब उसको घर वापिस ले जाया जा सकता था। कार्तिक को अपराजिता ने अपने सास-ससुर को सौंप दिया था और साथ-साथ अपने दूसरी जगह स्थांतरण के आदेश भी दिखा दिए थे।

उसकी सास उसको रोकना चाहती थी।तब ससुर ने ये कहकर कि अब उसको अपनी दुनिया जीने दो, पहले ही हम सब उसके साथ स्वार्थवश जाने अंजाने में बहुत अन्याय कर कर चुके हैं उसको बंधन मुक्त कर दिया था। पर आज इस पुस्तक ने उसकी सारी स्मृतियों को विस्मृत कर दिया था।

उसको कहीं ना कहीं ये भी संतोष था कि अब कार्तिक शायद पूरी तरह ठीक होकर एक सृजनात्मक मार्ग पर चल चुका है। पुस्तक के प्रारंभ और अंत में भी कार्तिक ने अज्ञात लेखक के रूप में अपनी प्रेयसी अपराजिता से वापिस आने का कतार शब्दों में जो अनुरोध किया था वो उसका दिल भेद रहा था। पुस्तक के आखिर में लिखे वो शब्द जिनमें लिखा था कि अपराजिता मैं तुम्हारा दोषी हूं।

तुम्हारे मेरा इलाज़ कराने के बाद और मेरे जीवन से जाने के बाद जब मुझे इस जीवन का मर्म समझ में आया तब से अब तक एक मैंने एक तपस्वी का जीवन जिया है। माना मेरा गुनाह क्षमायोग्य नहीं है पर मैं आज भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं क्योंकि तुम अपराजिता हो मतलब दुर्गा का दूसरा रूप जो एक तरफ अपराजेय है तो दूसरी तरफ क्षमा करना भी जानती है कहीं ना कहीं उसको अपनी ज़िंदगी के पहले प्यार की तरफ खींच रहे थे।

वैसे भी कार्तिक उसका पहला और आखिरी प्यार दोनों था। कार्तिक के बाद उसके मन में कभी किसी पुरुष का ख्याल भी नहीं आया था।उसने एक बार कार्तिक से मिलने का फैसला किया क्योंकि उसको लगा कि वो और कार्तिक दोनों अपने अपने हिस्से का अज्ञातवास भोग चुके हैं।ये सब सोचकर वो कोरियर पर लिखे बुक स्टोर का नंबर मिलाने लगी क्योंकि उसको पक्का यकीन था कि उनके पास कार्तिक का पता अवश्य होगा।

तो दोस्तों कैसी लगी मेरी कहानी, बहुत मन से ताना बाना बुना है इस कहानी का,अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। कई बार नियति ने सबके लिए कुछ और ही सोचा होता है। वैसे भी हमारी योजना से बड़ी ऊपर वाले की योजना होती है। कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में आर्शीवाद की तरह आते हैं जो दूर जाने पर भी अपनी सुगंध की तरह हमारे आस पास रच बस जाते हैं।

नोट: पाठकों से अनुरोध है कि कहानी को कहानी की तरह ही लें। वास्तविक जीवन से इसकी तुलना ना करें। कुछ कहानियां समाज को कुछ शिक्षा देने के लिए लेखक की कल्पना पर भी लिखी जाती हैं।

 

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

लौट आओ अपराजिता (भाग 3)

लौट आओ अपराजिता (भाग 3) – डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

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