लौट आओ अपराजिता (भाग 2) – डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

जैसा कि आप लोगों ने प्रथम भाग में पढ़ा अपराजिता जो कि जिलाधीश है,प्रदेश में चुनाव के चलते सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह सुदृढ़ बनाए रखने के लिए काफ़ी व्यस्त चल रही थी पर चुनाव के अच्छे ढंग से निबटने के बाद उसको बहुत दिनों के बाद अवकाश मिलता है। जिसमें वो किसी अज्ञात लेखक द्वारा लिखी अपने ही नाम पर आधारित लौट आओ अपराजिता पुस्तक पढ़ना प्रारंभ करती है। अब आगे…….

किताब पढ़ना प्रारंभ करते ही उसको लगता है कि जैसे किसी ने उसकी ज़िंदगी को ही पन्नों पर उकेर दिया हो। अब उसे लगने लगता है कि हो ना हो ये किताब कार्तिक ने लिखी थी जो, उसकी जिंदगी में सुंदर स्वप्न की तरह आकार चला गया था। 

आज अपराजिता के मानस पटल पर अपनी जिंदगी की बहुत सारी स्मृतियां चलने लगी।उसका बीता हुआ एक एक लम्हा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा।अपराजिता जैसा नाम वैसा ही उसका जिंदगी जीने का जज़्बा,हार मानना तो जैसे उसने सीखा ही नहीं था। खूब ही प्यारी, मासूम सी सुंदर नैन नक्श वाली अपराजिता पूरे कॉलेज में अपने गायन और पढ़ाई में उत्कृष्ट योग्यता के लिए जानी जाती थी। पढ़ाई के बाद उसका प्रशासनिक सेवा में जाने का मन था जिसके लिए वो लगी भी रहती थी। गले में भी उसके मां सरस्वती का वास था।

कॉलेज का वार्षिकोत्सव था। शहर के जाने माने उद्योगपति मनोहर लाल जी मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। कार्यक्रम में अपराजिता के कंठ से निकली सरस्वती वंदना ने उनको कुछ और ही सोचने पर मजबूर कर दिया। उनका इकलौता पुत्र कार्तिक जो मां के लाड़-प्यार और उनकी दौलत के नशे में चूर होकर हाथ से निकला जा रहा था उसके लिए उनको अपराजिता एक बेहतर जीवन संगिनी के रूप में नज़र आई।

अपराजिता की आवाज़ और चेहरे को सौम्यता ने उन्हें अपने बेटे के भटकते कदमों को रोकने का यही रास्ता दे दिया। कार्तिक की लड़कियों के प्रति आसक्ति मनोहर लाल जी की अनुभवी आंखों से छुपी ना थी। अपने काम के सिलसिले में वो उस ध्यान नहीं दे पा रहे थे जब घर पर होते तो अगर कभी लगाम कसने की कोशिश भी करते तब पत्नी के लाड़-प्यार और आंसू रूपी हथियार के आगे कमज़ोर पड़ जाते।

आज अपराजिता को देखने के बाद कहीं ना कहीं उनको लगा कि ये लड़की उनके बेटे की ज़िंदगी का रुख जरूर मोड़ देगी। बस फिर क्या था,ये विचार आते ही उन्होंने अपराजिता के बारे में सारी जानकारी पता की और पहुंच गए उसके घर। घर पर अपराजिता की माता-पिता और दो छोटे भाई-बहन थे।

पिता साधारण से क्लर्क थे पर उन्होंने अपने बच्चों को संस्कार देने में कोई कोताही नहीं की थी। बहुत बड़े उद्योगपति होते हुए भी मनोहर लाल जी अपराजिता के पिता से बहुत सादगी के साथ मिले। वैसे भी इतने बड़े उद्योगपति थे कि जीवन में कोई भी अनुबंध कैसे तय करवाना है अच्छी तरह जानते थे और ये तो फिर उनके बेटे की ज़िंदगी की बात थी।

अपने सौहार्दपूर्ण व्यवहार से उन्होंने अपराजिता के माता-पिता का दिल जीत लिया।इतने बड़े नामी गिरामी परिवार से रिश्ता आना अपराजिता के मां-बाप के लिए बहुत बड़ी बात थी। हालांकि अपराजिता ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर जैसा कि हर मां-बाप का सपना होता है कि उनकी बेटी को मायके से ज्यादा सुख-सुविधा ससुराल में मिले यही सोचकर वो लोग इस रिश्ते से इंकार नहीं कर पाए।

उधर जब मनोहर लाल जी ने घर पर अपने बेटे कार्तिक और उसकी मां के सामने कार्तिक के रिश्ते की बात कही तब दोनों मां-बेटे को सांप सूंघ गया। मनोहर लाल जी ने तुरंत अपराजिता का फोटो कार्तिक को पकड़ाया। फोटो देखकर कार्तिक भी अपराजिता की सुंदर चितवन की झलक में कहीं खो सा गया।

अब तक उसने अपने आस-पास उसकी दौलत की वजह से मंडराती विचित्र परिधानों में सजी नित नए फैशन को अपनाती सुंदरियां देखी थी पर ऐसा विशुद्ध भारतीय सौंदर्य उसने कहीं ना देखा था। पिता की पसंद पर उसने अपनी भी मोहर लगा दी थी। उसको ये पता था कि अगर उसने इस बारे में कुछ भी ज्यादा बोला तो उसके पिता उसको जायदाद से बेदखल कर देंगे।

उसने अभी चुपचाप अपने पिता की बात मानकर आगे की योजना को क्रियान्वित करने की सोची। वैसे भी नई नई लड़कियों का साथ उसे हमेशा भाता था इसलिए उसने सोचा कि इस बार ऐसे ही सही। दोनों पिता और बेटे की सहमति देखकर मनोहर लाल जी की पत्नी भी कुछ ना कर पाई। इस तरह अपराजिता इतने बड़े घराने की बहु बनकर इस घर में आई।

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डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

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