इन दीवारों के कान नहीं हैं – रवीन्द्र कान्त त्यागी   : Moral stories in hindi

लाहौल विला कुव्वत. अरे बेगम, ये गुसलखाने में उबलता पानी क्यों रख दिया. मुझे नहलाना है या पकाना है. अरे सुनती हो, नलके से थोड़ा ठंडा पानी लाकर मिला दो. हमने कपडे उतार दिए हैं. बहार नहीं आ सकते. खलील मियां बाथरूम से चिल्लाये.

“अरे कहाँ मर गईं नसीमन की खला. यहाँ हम ठण्ड से मरे जा रिये हैं और तुम पड़ौस में निकल गई होगी गप्पे हांकने. अरे मर ही जायेंगे तब आओगी क्या.

बरेली के पास के छोटे से कस्बे की पुरानी सी हो गई हवेली में मुहम्मद खलील बेग और उनकी बीवी शमीम बेगम अपनी जिंदगी की शाम गुजार रहे थे. अकेला बेटा सऊदी में कहीं ठीक ठाक सी नौकरी करता था और अम्मी अब्बा के गुज़ारे के लिए मुकम्मल रकम भेजता रहता था. घर में हैंडपंप का पानी होता था जो गुसलखाने से कुछ दूर था.

“अरे मखदूम की अम्मी, अब क्या क़यामत के दिन तक हिंया गुसलखाने में ही बैठे रहें या उबाल जांय गरम पानी में अंडे की तरह”.

बहार से कोई जवाब नहीं आया.

तंग आकर बिना नहाये ही ठण्ड से कांप रहे वृद्ध शरीर को कपड़ों में ढका और लड़खड़ाते से सुबह से फैले बिस्तर में जा घुसे.

गुस्सा सातवें आसमान पर था. न जाने कहाँ मर गई बेगम. सोचा तो था, मस्त स्नान करेंगे, फिर धूप में बैठकर गरमागरम चाय का लुत्फ़ लिया जायेगा मगर पानी के उबाल ने खून में गुस्से का उबाल पैदा कर दिया था. स्नान हुआ नहीं और कन्धा झुलस गया अलग से. न जाने सुबह उठते ही किसका मुँह देखा था कि दिन की शुरूआत ही नामुराद गुज़र रही थी.

तभी टीन के दरवाजे की कुंडी जोर से खड़की और काली शलवार व सलमे सितारों वाले कुर्ते पर काली ओढ़नी ओढ़े बेगम नमूदार हुई. मिया जी रजाई में मुँह ढके चुपचाप बिस्तर में घुसे पड़े थे. बड़े नाज से बोलीं “अये मखदूम के अब्बा, बड़ी जल्दी नाहा धो लिए. क्या बात है, बुढ़ापे में जवानी को मात दे रिये हो मिया”. फिर कोई अनुकूल प्रतिक्रिया न देखकर कुछ घबराई सी बिस्तर के पास पहुंचीं और मुहब्बत से बोलीं “सब खैरियत तो है मेरे हमदम मेरे महबूब. नाराज हो गए क्या”.

दरअसल जवानी के दिनों से ही दोने एक दूसरे से बेपनाह मुहब्बत करते थे. जब बच्चे बड़े हो रहे थे तो थोड़ी बहुत चिख चिख आपस में होती रहती थी मगर उम्र के इस दौर में, कुछ अकेले रहने के कारण और कुछ एक दूसरे पर पूरी तरह निर्भर होने के कारण दोबारा एक दूसरे के एकदम नजदीक आ गए थे. बुढऊ कभी बेगम जान कहकर बुलाते और कभी महबूबा, कभी जानेमन या नूरेनजर कहकर पुकारते थे.

बेगम साहिबा अपने शौहर को प्यार भरे लफ्जों से नवजातीं. कभी हमदम कहतीं तो कभी दिलनवाज. दोनों एक ही कंपनी का तम्बाकू चबाते और एक ही हुक्के में दम लगाया करते थे. दरवाजे की कुंडी लगाकर बेगम के बाल संवार देने, उनकी शलवार कुर्ते सूखा देना और झूठे बर्तन धो डालने जैसे ‘जानना’ काम निपटना भी खलील मिया का इजहारे मुहब्बत का तरीका था. जवानी के गुलाबी दिनों को याद करते करते जिंदगी की शाम मज़े गुज़र रही थी. मगर आज …..

बिना ताप देखे गर्म पानी बदन पर उंडेलने के कारण कन्धा झुलस कर सुर्ख हो गया था, ऊपर से बेगम साहिबा पड़ौस में बज रहे ढोल की आवाज सुनकर दुलहन की बिदाई देखने से खुद को रोक नहीं पाई थी.

खैर …… बेगम साहिबा ने बड़े नाजोअंदाज से रजाई का पल्ला उठाया तो खलील मिया एकदम से फट पड़े. “जहन्नुम में जाओ तुम. पड़ौस में तमाशे देखो. नाचो गाओ, मज़े करो. बूढा शौहर मरे तो मरे. हट जाओ मेरी नज़रों के सामने से. मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहता. दफा हो जाओ. मैंने तुम्हे आजाद किया. तलाक तलाक तलाक. अब देखना सारे मोहल्ले के नाच गाने और दुलहन की बिदाई. तुमने ही ठेका ले रखा है बरेली भर की दुल्हनों को अगुआई का. भाड़ में जाओ”. और दोबारा लिहाफ में मुँह छुपा लिया.

शमीम बेगम जिन्हे प्यार से वो शन्नो कहा करते थे एकदम सन्न. अवाक. ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे. पत्थर की बूत बन गईं. न हिलें न डुलें.

खलील मियां का गुब्बार निकल गया तो रजाई में मुँह दुबकाये ही उन्हें अहसास हुआ कि बड़ी गलती हो गई. जिसे मैं खुदा की सबसे बड़ी नियामत मानता था, अल्ला मिया का दिया सबसे बेशकीमती खूबसूरत तोहफा कहता था, जिसने सुख में, दुःख में, मुफलिसी में या बीमारी में, हमेशा मेरा साथ दिया, जिसने मेरे खून… मेरी औलाद को जन्म दिया उसे इस उम्र में …..या खुदा, ये मुझसे क्या गुनाह हो गया.

एकदम रजाई फेंककर खड़े हुए तो देखा बेगम पत्थर की मूरत बनी खड़ी थीं और आँखों से जाऱ जाऱ आंसू बह रहे थे. कंधे को छुआ तो भरभराकर जमीन पर ढह गईं और बेहोश हो गईं.

खलील मिया तो बुरी तरह घबरा गए. भागकर रसोई से पानी ले आये और बेगम के मुँह पर छींटे मारने लगे. दोनों कंधे थामकर विलाप करने लगे “हाय मेरी शन्नो, क्या हुआ तुझे. ऑंखें तो खोल. अभी हकीम साहब को बुलाकर लाता हूँ”.

कई मिनट के बाद बेगम ने आँखें खोलीं. सूनी आँखों से छत की और देखने लगीं. खलील मिया ने उन्हें धीरे से सहारा देकर उठाया और बिस्तर पर बिठा दिया. वे अनमनी सी शून्य में देख रही थीं. कई मिनट दोनों के बीच सन्नाटा पसरा रहा.

फिर बेगम ने धीरे से कहा “अब”.

फिर खलील मिया ने भी धीरे से कहा “अब”.

“कोई कुआ खाई बता दो जहाँ जाकर अपना मुँह छुपा लूं “.

“अब… हो गया बेगम गुस्से में. देखो मेरा कन्धा गर्म पानी से जलकर सुर्ख हो गया है”.

“बेगम …. किसकी बेगम, कौन बेगम, सब ख़त्म…. इस उम्र में …….. अपने कुंवारे अरमान, अपनी दोशीज़गी दामन में समेटकर तुम्हारी दहलीज पर आई थी. मुहल्ले भर के शोहदे आँखों में काजल और मुँह में गिलोरी दबाये मेरी एक झलक पाने को चक्कर लगाया करते थे हमारी गली में, मगर इन नज़रों ने जिस दिन से तुम्हे देखा… फिर निगाह उठाकर किसी गैर की ओर ना देखा. तुम रोये तो आंसू मेरी आँखों से भी बरसने लगे. तुम भूखे रहे तो लुकमा मेरे हलक से भी नीचे ना उतरा. तुम्हारे माथे की शिकन मेरे दिल का दर्द बन गई ओर तुम्हारी एक मुस्कान पर सौ सौ बलिहारी गई मैं. मेरे सारे रिश्तेदार ओर सहेलियां हमारी मुहब्बत पर रश्क करती थीं… ओर आज तुमने मुझे जिंदगी के एक अँधेरे मोड़ पर लाकर अकेला छोड़ दिया”.

“मेरी पहली ओर आखिरी मुहब्बत, मेरी जानेमन गुस्से में आज भी तुम गजब की हसीन लगती हो”.

“हटो जी. तीन लफ्ज बोलकर तुमने मुहब्बत के सारे हुकूक खो दिए हैं. तुमने हमारे पोशीदा पाकदामन रिश्ते को बेआबरू कर दिया है. चली जाउंगी” उन्होंने एक दर्द भरी हिचकी सी ली ओर दोबारा बोलने लगीं “अपना मुँह छुपा लूंगी किसी अंधेरी खोह में. अगर अल्ला ताला ने इस उम्र में यही लिखा है मेरी किस्मत में तो यही सही”.

” ओर मै. मैं कहाँ जाऊंगा जानू. मुझमे तो इस बेमुरव्वत जहान में तुम्हारे बिना चार कदम चलने की हिम्मत भी नहीं है. उम्र के इस दौर में अकेला सहारा हो तुम मेरा… ओर… मैं तुम्हारा. इस शहरे नामुराद में तुम्हारे सिवा है कौन मेरा अपना. मुझे अकेला छोड़ दोगी मरने के लिए”. वे एकदम द्रवित होकर बोले. फिर उन्होंने बिस्तर पर बैठकर कम्बल का एक सिरा अपने घुटनो पर डाल लिया और दूसरा सिरे से बेगम के कंधे ढकते हुए बोले “देखो जानू, जब मुरादाबाद में चाचू के निकाह के वक्त दुल्हन के पीछे बैठी तुम एक पल के लिए बेपर्दा हुई थीं और तुम्हारा जमाल देखकर मैं बावला सा हो गया था, या दोबारा मौका मिलते ही जब हमारी ऑंखें चार हुईं और तुम शर्माकर घर के भीतर भाग गईं थीं,

तो मुहब्बत की उस आंखमिचौली का कोई गवाह है. दुलहन की डोली के वक्त भीड़भाड़ में मैंने तुम्हारी गोरी कलाई बेसाख्ता पकड़ ली थी और तुम्हारा चेहरा गुलाब की पंखुड़ी सा गुलाबी हो गया था, उस छुअन के पहले अहसास का कोई चश्मदीद है क्या मेरी बुलबुल. वो शब् जिसे सुहागरात कहते हैं… जिस रात आस्मां के सारे सितारे मेरे आंगन का उजाला बन गए थे और चाँद मेरी बाँहों में उतर आया था, जब जन्नत की सबसे खूबसूरत हूर और अल्लाह ताला का दिया सबसे नायाब तोहफा मेरी जिंदगी में आया था. मैंने तेरा पर्दा हटाया तो मेरे मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा था ‘या खुदा, तूने मेरे दिल की मुराद पूरी कर दी’ तब… तब मेरे और तुम्हारे बीच कोई तीसरा शख्स था क्या.

बेपनाह मुहब्बत के उन पलों में दो दिलों और दो जिस्मों के बीच इंसान का बनाया हुआ कोई कानून, कोई मजहबी आयत, किसी मंदिर या मस्जिद की रवायत या समाज की बंदिशें नमूदार होती थीं क्या. नहीं न. अच्छा एक बात बताओ मेरी नूरेनज़र, जब तंगी के हालात में हम अपने हिस्से का खाना बच्चों को खिलाकर भूखे ही बुरा वक्त गुज़र जाने के सपने देखते हुए एक दूसरे की बाँहों में समाकर सो जाय करते थे तब कोई पूछने वाला था कि तुम्हारे घर में दाल, चून है कि नहीं. तुम मर रहे हो या जी रहे हो. सुख में, दुःख में, बीमारी में, गरीबी में, गम में, खुशी में , तीज में और त्यौहार में पूरी जिंदगी कोई एक दूसरे के साथ था तो हम और तुम थे.

तुम्हारे जख्मो पर मरहम मैंने लगाया तो मेरे दुखते दिल को रहत सिर्फ तुम से मिली. जब हमारे अकेलेपन से, हमारी जरूरतों से, हारी बीमारी से और दुखदर्द से इस बेमुरव्वत नामुराद समाज को कुछ लेना देना नहीं तो हमारे झगड़ों से किसी मजहब वाले को या किसी रवायतों की मैली चादर ओढ़े ज़माने को क्या लेना देना जानू. मुहब्बत दुनिया के हर कानून से, रस्मोरिवाज से और किताबी लकीरों से दूर अल्लाह के सबसे नजदीक की शय है. इस से बड़ी इबादत और कोई नहीं है. चल खड़ी हो जा मेरी हुस्न की परी. लज़ीज सी चाय बना ले अदरक डालकर. दोनों धूप में बैठकर पिएंगे और गुफ्तगू करेंगे. भाड़ में जाय तलाक वलाक. इस जिंदगी में जुदा न होंगे.

देर तक दोनों लिपटकर रोते रहे. इस घर की दीवारों के कान नहीं थे.

रवीन्द्र कान्त त्यागी

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