अतीत की परछाई – (अंतिम भाग ) – संगीता अग्रवाल  : Moral Stories in Hindi

” स्मृति अवंति को तैयार रखना लड़के वाले कभी भी आते होंगे !” अगली सुबह अवधेश पत्नी से बोला। स्मृति ने बिना बेटी से निगाह मिलाये उसे तैयार किया अवंति भी एक चाभी भरने वाली गुड़िया की तरह चलती जा रही थी मानो उसने खुद को परिस्थितियों के हवाले कर दिया था। अब तो दोनो माँ बेटी को किसी चमत्कार की उम्मीद थी कि शायद लड़के वाले रिश्ते से इंकार कर दे।

” हमें लड़की पसंद है और हम जल्द से जल्द विवाह करना चाहते है !” लड़के वालों के इस वाक्य ने माँ बेटी दोनो को चौंका दिया साथ ही चमत्कार की उम्मीद को भी खत्म कर दिया बस अब तो एक ही रास्ता था कि अवंति शादी के बाद अपने सपने पूरे करे ।

” जी लेकिन मैं आपसे एक विनती करना चाहता हूँ अगर आपको सही लगे तो !” अवधेश पत्नी और बेटी की तरफ देखते हुए लड़के के पिता से बोला।

” जी बोलिये !” लड़के के पिता ने अपनी पत्नी की तरफ देखते हुए कहा।

” जी असल मे अवंति शादी के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है ….पर आप फ़िक्र मत कीजियेगा उसके लिए मैं एक रकम उसके नाम से जमा कर दूंगा !” अवधेश बोला।

” देखिये भाई साहब हमें बहू ऐसी चाहिए जो घर संभाल सके ऐसी नही जो सुबह सज धज कर कॉलेज निकल जाये …अगर आपको बेटी को पढ़ाना ही है तो खुद पढ़ा लीजिये और अगर शादी करनी है तो पढ़ाई भूल जाइये !” इस बार लड़के की माँ बोली।

उनकी बात सुनकर अवंति और स्मृति की आँखों मे आंसू आ गये क्योकि अब तो सब उम्मीदें ही खत्म हो गई । वैसे भी जब जन्म देने वाला पिता ही कठोर बन चुका था तो पराये लोगो से क्या उम्मीद होती कि वो सपने पूरे करेंगे अवंति के । इधर अवधेश भी समझ नही पाया क्या जवाब दे क्योकि वो अवंति की शादी केवल अपने डर के कारण कर रहा था पर साथ साथ ये भी चाहता था कि उसके सपने पूरे हो ।

” आप सोच लीजिये फिर हमें बता दीजियेगा अभी हमें इज़ाज़त दीजिये !” लड़के का पिता अवधेश को खामोश देख बोला। अवधेश ने लड़के वालों को विदा किया और अपने कमरे मे आकर लेट गया। उसकी समझ मे नही आ रहा था क्या करे लड़के वालों को इंकार करता है तो अनिष्ट का डर अपनी जगह कायम रहेगा और उन्हे हां करता है तो बेटी के सपने टूट जाएंगे ।

थोड़ी देर बाद उसे नींद आ गई और सपने मे उसे नन्ही अवंति नज़र आई जो पहली बार स्कूल जा रही है वो भी हँसते हँसते। खुद अवधेश ने उसके हाथ मे बैग पकड़ाया था। स्कूल की पोशाक पहने अवंति छोटे छोटे काले जूते पहने अवंति। कितनी प्यारी लग रही थी उस दिन अवंति और कितनी खुश भी । नींद मे भी बेटी का बचपन देख अवधेश के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

धीरे धीरे वही अवंति अब उसे बड़ी नज़र आने लगी उसने खुद बेटी के हाथ से बस्ता छीन उसे बेलन और करछी पकड़ा दी। स्कूल ड्रेस की जगह साडी ने ले ली और पैरो मे …पैरो मे जूते की जगह बेड़िया डाल दी उसने। आंसुओं मे भीगी अवंति उसके घर से विदा हो रही है। स्मृति एक कोने मे खड़ी रो रही थी पर अवधेश ..उसके चेहरे पर तो मानो विजयी मुस्कान थी अपना डर खत्म करने की मुस्कान ।

” जा रही हूँ पापा आपसे दूर बहुत दूर शायद फिर कभी वापिस ना आऊं आप ये समझ लेना बेटी को डोली मे नही अर्थी पर विदा कर दिया !” जाती हुई अवंति ने अंतिम वाक्य यही बोले और वो दूर दूर बहुत दूर जाती जा रही है ।

अचानक से अवधेश के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और एक अलग डर ने वहाँ डेरा जमा लिया। तभी उसे अवंति डोली मे नही अर्थी पर नज़र आई।

” अवंति …अवंति बेटा अवंति रुको ऐसे ना जाओ अपने पापा को छोड़ … अवन्ति …!” अचानक अवधेश उठ बैठा पसीने से लथपथ अवधेश चारो तरफ देख रहा है।

” पापा …पापा क्या हुआ आपको !” अवंति पिता की आवाज सुन भागती हुई आई पीछे पीछे स्मृति भी थी। बेटी को सामने देख अवधेश उठ खड़ा हुआ और जोर से बेटी को सीने से लगा लिया मानो वो सच मे उससे हमेशा को दूर जा रही है। उसकी आँख मे आंसू थे पर बेटी को सीने से लगा इतने दिन से जो चेहरे पर कठोरता थी वो कही गायब थी।

उसने बेटी का चेहरा अपने हाथों मे लिया और उसका माथा चूम लिया ठीक वैसे ही जैसे जब पहली बार स्कूल छोड़ते हुए चूमा था। अवंति ने जबसे होश संभाला पापा के प्यार को इतने करीब से कभी महसूस नही किया इसलिए वो भी जार जार रो दी। तब तक आदित और उसके दादा भी वहाँ आ गये थे।

” मैं तुझे अपने से दूर नही जाने दूंगा …कभी नही जाने दूंगा !” ये बोल अवधेश ने फिर से बेटी को गले लगा लिया।

” क्या हुआ है आपको …कोई सपना देखा है क्या ?” स्मृति उसके पास आ बोली।

” नहीं स्मृति सपना नही देखा बल्कि एक सपने से जगा हूँ गहरी नींद से जगा हूँ और अब सब साफ दिखाई दे रहा है बिल्कुल साफ !” अवधेश बोला।

” क्या बोल रहा है तू होश मे भी है कभी सपना , कभी नींद बावला हो गया क्या ?” उसके पिता बोले।

” नही पिताजी पागल तो मैं हो रहा था पर अब ठीक हो गया हूँ एक सपने ने मुझे नींद से ही नही जगाया बल्कि मुझे सही गलत की पहचान भी करवा दी !” अवधेश बेटी को सीने से लगाए बोला।

कोई कुछ बोलता उससे पहले ही उसके फोन की घंटी बजी जिसपर लड़के के पिता का नंबर चमका।

” नही भाई साहब अभी मुझे अपनी बेटी की शादी नही करनी अभी वो पढ़ लिखकर अपने पैरो पर खड़ी होगी …जी आप अपने बेटे के लिए कोई ओर रिश्ता देख लीजिये। जी जी मुझे माफ़ किजियेगा नमस्ते  !” अवधेश ने ये कह फोन काट दिया स्मृति और अवंति को अपने कानो पर विश्वास ही नही हो रहा था।

” ये कह कह रहा है तू बेटा …?” अवधेश की पिता जी हैरानी से बोले।

” सही कह रहा हूँ पिताजी आज एक पिता का प्यार जीत गया और उसका डर हार गया । मैं अपनी बेटी को नही खोना चाहता कोई पिता अपनी बेटी को नही खोना चाहता । जो हुआ नही उसके डर मे अबतक बहुत तड़प लिया खुद भी और अपनी बेटी को भी बहुत तड़पा लिया लेकिन अब नही अब वही होगा जो सही है अवंति अपने पैरो पर खड़ी होगी अपने फैसले खुद करेगी ।

मैं स्मृति के पिता की तरह अपनी बेटी की खुशियों के आड़े अपना अहंकार या जात पात नही आने दूंगा वो जिसे पसंद करेगी उसके दिल से अपना लूंगा फिर तो मेरे डर का कोई औचित्य ही नही रहेगा एक पिता झुक जायेगा पर अपनी बेटी को दुनिया के सामने झुकने नही देगा ।…हेना स्मृति !”अवधेश बोला।

” पापा आपकी बेटी आपसे वादा करती है वो आपका सिर कभी नही झुकने देगी अव्वल तो मैं सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूंगी और शादी आपकी पसंद से करूंगी।  लेकिन अगर मुझे कोई पसंद भी आता है तो मेरा विश्वास कीजिये मैं सबसे पहले आपको बताऊंगी और आपकी हां या ना दोनो का मान रखूंगी पर कभी भी आपको कोई दुख नही पहुँचाऊंगी .।” अवंति पिता की बात सुन हाथ जोड़ बोली आज इतने सालों मे पहली बार अवंति खुल कर अपने मन की बात् बोल पाई थी वरना तो जबसे उसे समझ आई है वो पिता से डरती ही आई है।

” मुझे तुझपर यकीन है बेटा कोई बेटी अपने माँ बाप का बुरा नही चाहती बस हालात ऐसे हो जाते है स्मृति और मैने भी कहाँ सोचा था हमारे फैसले का ये परिणाम होगा वरना शायद हम वो कदम ही ना उठाते…स्मृति तुम मुझे माफ़ कर दो इन दिनों तुम्हे भी मैने बहुत कष्ट दिया है जबकि अतीत मे जो अनजाने मे हमसे गुनाह हुआ उसके जिम्मेदार हम दोनो है तुम अकेली नही फिर भी सजा तुम अकेली भुगत रही हो अपना मायका खो दिया तुमने …सारी जिंदगी को एक कलंक लग गया तुम्हारे माथे। ” अवधेश बेटी से बोल पत्नी की तरफ घुमा और उससे माफ़ी मांगी।

स्मृति तो बस जार जार रो रही थी उसके आँसू एक तरफ तो बेटी का भविष्य बचने के कारण खुशी के थे दूसरी तरफ इस अफ़सोस के थे काश उसने पिता को समझाया होता काश उसके पिता ने उसे समझा होता। अवधेश ने आगे बढ़ पत्नी और बेटी दोनो को गले लगा लिया। मुर्दा पड़े घर मे फिर से जान आ गई और सब कुछ फिर से जी उठा ।

दोस्तों प्यार करना गलत नही ना प्रेम विवाह गलत है पर माँ बाप को दरकिनार कर अपने फैसले खुद लेना गलत है उससे भी गलत है अपने अतीत के फैसले को अपने बच्चों से जोड़ कर देखना और उनके भविष्य से खेलना। यहाँ अवधेश को वक्त रहते समझ आ गई वरना अवंति की बर्बादी का जिम्मेदार वो खुद होता।

वही दूसरी तरफ माता पिता का भी फर्ज है बच्चो की खुशियों को देखे समझे और अगर उन्होंने अपने लिए उपयुक्त जीवनसाथी चुना है तो उनकी खुशियों मे शामिल हो उन्हे अपना आशीर्वाद दे।

मेरी ये कहानी काल्पनिक है जो आज का सच दिखाती है हो सकता है कुछ लोग मुझसे इत्तेफाक भी ना रखते हो उनसे मैं अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ।

समाप्त

आपकी दोस्त

संगीता अग्रवाल

अतीत की परछाई – (भाग 4)

अतीत की परछाई – (भाग 4) – संगीता अग्रवाल  : Moral Stories in Hindi

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