हैप्पी फैमिली – डॉ. पारुल अग्रवाल  : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi  : आज जब अवनी पीहू को लेने स्कूल पहुंची तो देखा उसकी चार साल की बेटी पीहू केशव के साथ बहुत हिलमिल गई थी। वो दोनों खेलने में इतने मस्त थे कि अवनी के आने का भी उन्हें पता नहीं चला था।कहां तो उसकी बेटी पूरी दुनिया से अलग-थलग रहती है पर अब वो कैसे चहचहा रही है। ये सब अवनी सोच ही रही थी तभी केशव की निगाह उस पर पड़ गई और उसने पीहू से कहा कि आज का खेल खत्म अब आपकी मम्मी आ गई और आपको घर जाना है। केशव की बात सुनकर पीहू एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह अवनी के पास आकर खड़ी हो गई। 

अवनी आज पीहू के अंदर इतना सुधार देखकर केशव के प्रति बहुत एहसानमंद थी वो उसका धन्यवाद करना चाहती थी पर केशव उसके आते ही पीहू को उसके पास छोड़कर अपने कक्ष में चला गया था। केशव का इस तरह का अजनबी व्यवहार कहीं ना कहीं अवनी को तोड़ रहा था। अब वो पीहू को लेकर अपने घर वापिस आ गई। पीहू को खिला पिलाकर सुलाने के पश्चात जब वो उसके पास लेटी तो नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। केशव का अपने प्रति ऐसा रूखा व्यवहार कहीं ना कही उसको यादों की उन गलियों में ले जा रहा था

जिनसे वो कब की बहार आ चुकी थी पर आज गाहे बेगाहे वो फिर से उन्हीं राहों पर खड़ी थी। उन यादों की गलियों में घूमते घूमते वो पहुंच गई थी अपनी उस दुनिया में जब वो अठारह साल की स्कूल से निकली कॉलेज में प्रवेश करने वाली एक किशोरी थी। जिसके चेहरे की मासूमियत और होठों पर प्यारी सी मुस्कान किसी का भी ध्यान बस बरबस किसी का भी ध्यान खींचने के लिए काफ़ी थी।

वैसे भी ये उम्र भी खूब होती है क्योंकि मन हरपल सतरंगे सपनों की दुनिया में खोया रहता है। इसी उम्र के दौर में उसकी मुलाकात हुई केशव से। जहां उसकी उम्र के सारे लड़के कॉलेज की कैंटीन और लड़कियों के आगे पीछे घूमने में समय बिताते थे वहीं केशव सबसे अलग कभी जरूरतमंद लोगों के लिए रक्त की व्यवस्था, गरीब बच्चों के लिए शिक्षा प्रबंधन और सबकी देखरेख में लगा रहता।

कॉलेज की ऐसी कोई प्रतियोगिता नहीं थी जो केशव के बिना पूरी होती। ऐसी ही इन सभी प्रतियोगिताओं का हिस्सा अवनी भी होती थी। एक बार ऐसे ही वाद विवाद प्रतियोगिता और नाटक प्रतियोगिता के लिए विद्यालय की तरफ से जो टीम जा रही थी उसका प्रतिनिधित्व करने का अवसर केशव और अवनी को मिला। वहां के भागादौड़ी के माहौल में अवनी बीमार पड़ गई ऐसे में केशव ने अपनी आदतानुसार उसका बहुत ख्याल रखा। केशव के यही सब बातें कहीं ना कहीं अवनी के दिल में जगह बनाने लगी। वैसे भी अवनी शहर के प्रतिष्ठित और अमीर परिवार से संबंधित थी।

उसके माता पिता दिखावे और अपने उच्च रहन सहन की खातिर हमेशा पार्टियों और विदेश यात्रा में ही व्यस्त रहते थे। बचपन में भी तबियत खराब होने पर उसका ध्यान रखने के लिए सिर्फ नौकर-चाकर ही होते थे। ममता की छांव से वो हमेशा वंचित रही। ऐसे में केशव का उसकी बीमारी में इस तरह से ख्याल रखना उसके लिए गर्मी में बारिश की बूंदों जैसा था।इस तरह अवनी केशव की तरफ खींचती चली गई। केशव भी अवनी को मासूमियत से बहुत दिन दूर नहीं रह पाया वैसे भी ये उम्र भी कुछ ऐसी ही होती है।

जहां स्नातक पूरा होने के बाद अवनी ने एमबीए ने प्रवेश लिया वहीं केशव ने अपनी रुचि के अनुसार दिव्यांग बच्चों की देखभाल से संबंधित दो वर्ष के व्यवसायिक कोर्स में प्रवेश ले लिया। अवनी ने घर में तो रुपए-पैसे की कोई कमी नहीं थी।एमबीए पूरा होते-होते घर में उसकी शादी की बात होने लगी। कोर्स तो केशव का भी पूरा हो गया था और दिव्यांग बच्चों की बड़ी संस्था में उसको नौकरी भी मिल गई थी जहां अपने गुजारे लायक तो वो आराम से कमा लेता था। अब जब अवनी की शादी की बात घर में होने लगी तब उसको अपने माता-पिता को केशव के विषय में बताना पड़ा।

उसके पापा ने अवनी के लिए अपने दोस्त के बेटे मानव को पसंद किया हुआ था जो कि उनके ही जैसे बड़े कारोबारी थे। अवनी की ज़िद्द के आगे मजबूर होकर उनको केशव से मिलना पड़ा। केशव में वो चाहकर भी कोई कमी नहीं निकाल पा रहे थे पर तभी उन्होंने केशव से उसके भविष्य की योजना पूछी तो उसने स्पष्ट शब्दों में दिव्यांग बच्चों के प्रक्षिशण से सम्बन्धित कार्य करने की अपनी इच्छा बता दी।

ये सुनते ही अवनी के पापा गुस्से से भड़क उठे। उन्होंने केशव को सुनाते हुए कहा कि ये भी कोई काम होता है भला, मैं अपनी बेटी का विवाह ऐसे गूंगे,बहरे,अंधे और अपंग बच्चों के बीच समय गुजारने वाले इंसान के साथ कैसे कर सकता हूं। मेरा समाज ने इतना बड़ा नाम है। मैं ऐसे अनमेल विवाह से अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर नहीं लगा सकता। तुमने ही पैसे और जायदाद के लालच में मेरी बेटी को अपने प्यार के जाल में फंसाया होगा नहीं तो वो इतनी संस्कारहीन नहीं हो सकती। 

अवनी के पापा का इस तरह चिल्लाना और इस तरह के निराधार आरोप सुन केशव वहां पर नहीं रुक सका। उसके आत्मसम्मान को बहुत ठेस पहुंची थी। उधर अवनी के पापा ने यह कहकर कि अगर अब उन्होंने केशव का नाम भी इस घर में सुना तो वो उनका मरा हुआ मुंह देखेगी उसके और केशव के रिश्तें को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था।

केशव ने एक-दो हफ्ते तक अवनी के फोन का इंतज़ार कर उसको फोन भी मिलाया पर अवनी ने फोन उठाकर हमेशा के लिए उससे सारे रिश्ते तोड़ने की बात कही। इस तरह उनके बीच के प्यार का एक दुखदाई अंत हो गया। इधर अवनी की शादी मानव से हो गई उधर केशव ने भी दिव्यांग बच्चों की दूसरी शाखा में ट्रांसफर करा लिया और उन बच्चों में ही अपनी दुनिया बनानी शुरू कर दी।

अवनी की मानव से शादी एक दिखावे वाली दुनिया से दूसरी दिखावे वाली दुनिया में जाना था। उसको लगता कि वो शीशे की अलमारी में कैद एक गुड़िया है जिसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है। इन सब के बीच उसको अपने अंदर के नन्हें जीव की आहट मिली। उसको लगा अब इस दुनिया में कोई तो ऐसा आएगा जिसके साथ वो अपनी सारी बातें साझा कर सकेगी। अब वो थोड़ा खुश रहने लगी थी।

नौ महीने के पश्चात उसने गुलाब की पंखुरी सी नाजुक और प्यारी बिटिया पीहू को जन्म दिया। थोड़े समय तक तो सब ठीक रहा पर फिर अवनी ने महसूस किया कि अन्य बच्चों की की तुलना में पीहू बहुत कम रोती है और वो साथ के लोगों के गोदी लेने,खिलाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। उसने मानव से भी इस बारें में कहा पहले तो सबने ये सब उसके मन का वहम करार दिया।

अब उसका मन नहीं माना वो खुद उसको बच्चों के डॉक्टर के पास लेकर गई। वहां पीहू के कुछ टेस्ट हुए और उसको ऑटिज्म नामक बीमारी से ग्रस्त पाया गया। उपचार के लिए डॉक्टर को कुछ सलाह देनी थी  अतः उन्होंने अवनी को अगले दिन उसके पति मानव के साथ क्लिनिक पर बुलाया। उन्होंने इस बिमारी के बारे में बताते हुए कहा कि पीहू सामान्य बच्ची नहीं है बल्कि दिव्यांग बच्चों की श्रेणी में आती है। ऐसे बच्चों को प्रारंभ में बहुत देखरेख की आवश्यकता होती है। 

इस बीमारी के विषय में सुनकर मानव तो गुस्से से बौखला गया। इधर अवनी की ससुराल में भी अन्य लोगों की प्रतिक्रिया पीहू के लिए बहुत ही रोषपूर्ण थी। एक अवनी ही थी जिसे सिर्फ अपनी बच्ची की चिंता थी। अवनी अपनी बच्ची के सारे काम खुद करती और डॉक्टर के बताए तरीकों से उसको पालने की कोशिश करती। ऐसे ही पीहू दो साल की हो गईं।एक दिन घर में एक पार्टी थी बहुत सारे लोग आए हुए थे।

अवनी उस दिन पीहू को समय ना दे पाई। अब छोटी सी बच्ची अपनी मां को ना पाकर उसको बाहर ढूंढने आ गई। ऑटिज्म से ग्रसित बच्चे वैसे भी बहुत सारे लोगों के बीच खुद को सहज नहीं पाते हैं अब लोगों की ऐसी भीड़ देखकर वो बेकाबू हो गई। अवनी मानव के साथ मेहमानों की आवभगत में व्यस्त थी उधर पीहू ने वहां पर लगे सारे सामानों को फेंकना और बहुत तेज़ रोना चिल्लाना शुरू कर दिया।

उस दिन सभी अतिथियों के सामने मानव की बहुत जगहंसाई हुई। आज मानव और उसके परिवार को लगा कि पीहू की वजह से उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है। अब उन लोगों ने पीहू को जो दिव्यांग बच्चों के लिए बोर्डिंग बने होते हैं वहां भेजने का निर्णय लिया पर अवनी इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं हुई। वैसे भी पीहू का उपचार कर रहे डॉक्टर ने भी बोला था कि ऑटिज्म गंभीर अवश्य है पर लाइलाज नहीं क्योंकि इस तरह के बच्चों में कोई ना कोई विशेष प्रतिभा अवश्य होती है जो कि एक सही दिशा और समय देने से आसानी से विकसित की जा सकती है।

अब अवनी के पीहू को अपने से अलग ना करने की ज़िद्द मानव और उसके परिवार को बहुत नागवार गुजरी। मानव ने कहा कि वो ऐसी बच्ची को किसी भी हालत में नहीं अपनाएगा और अगर अवनी नहीं मानती तो उसको तलाक़ के लिए तैयार होना होगा। उसको लगा था कि ये धमकी सुनकर अवनी पीहू को बोर्डिंग भेजने के लिए तैयार हो जायेगी पर आज बात एक मां की ममता थी अवनी ने तलाक लेना स्वीकार किया।

  इधर अवनी के माता-पिता ने भी संस्कारों की दुहाई देते हुए उसको ससुराल वालों की बात मानने को कहा। उन्होंने ये भी कहा कि कौनसा उसको पीहू को पूरी तरह से दूर करना है वो जब चाहे उससे मिल सकती है पर इस बार अवनी ने कहा कि अपनी बेटी के लिए वो संस्कारहीन बनना ही पसंद करेगी। तलाक की प्रक्रिया तो चल ही रही थी,अवनी ने एमबीए तो किया हुआ ही था अतः अपनी कुछ दोस्तों की मदद से उसको ऑनलाइन काम करने के प्रोजेक्ट मिल गए। उसने अपनी ससुराल और मायके से दूर एक छोटा सा घर भी ढूंढ लिया जहां वो और उसकी बेटी बिना किसी रोक टोक के आराम से रह सकती थी।

ये सब व्यवस्था होने पर अवनी मानव को बिना किसी शर्त तलाक़ देकर अपनी ससुराल से निकल पड़ी। अवनी के मेहनत और ममता के आगे पीहू में बहुत सुधार आने लगा। अवनी को और भी अच्छे पैकेज पर एक कंपनी में नौकरी मिल गई। जहां उसको सप्ताह में दो दिन ऑफलाइन जाना था और बाकी दिन ऑनलाइन काम करना था। वैसे भी पीहू के लिए भी उसने एक ऐसे स्कूल का पता किया था जहां उसके जैसे बच्चों को पूर्णतया सुरक्षित वातावरण प्रदान करके उनके अंदर छुपी विशिष्ट योग्यता को निखारा जाता है। जब वो उस स्कूल में पहुंची तब वहां के वातावरण में ही उसको एक अलग ही सकारात्मक ऊर्जा का एहसास हुआ। वहां के विभिन्न क्रियाकलाप से अवनी को पीहू के लिए नई उम्मीद बंधी। 

पीहू के एडमिशन की प्रक्रिया के दौरान उसका स्कूल के चेयरमैन से भी मिलना हुआ। अवनी ये देखकर हैरान थी कि वो और कोई नहीं केशव ही था पर केशव ने पुराने दिनों की कोई भी बात छेड़े बिना अपने सारे दायित्व निभाए। केशव ने पीहू से बहुत प्यार से बात की पर अवनी से बात करते हुए उसने एक प्रोफेशनल दूरी बनाए रखी। केशव को वहां देखकर अवनी कहीं ना कहीं अब पीहू के लिए निश्चित थी। स्कूल का समय सुबह 10 से 4 शाम तक का था। पीहू ने शुरू में तो वहां जाने में थोड़ा तंग किया पर एक दो दिन में ही वो वहां के वातावरण में रमने लगी।  वहां खेल-खेल में पीहू के अंदर जो कला करने की प्रतिभा छुपी थी उसको बाहर निकालने की पूरी कोशिश की जाने लगी।

पीटीएम वाले दिन भी पीहू की बनाए हुए बहुत सुंदर सुंदर चित्र अवनी को दिखाए गए। आज अवनी को पीहू को लेना थोड़ा देर हो गई थी। जब वो पहुंची तो सारा स्टाफ जा चुका था केवल केशव पीहू के साथ था पर आज भी केशव ने अवनी से कोई बात करने की चेष्टा नहीं की। कहीं ना कहीं अवनी को कुछ चुभा था आखिर पहला और आखिरी प्यार था वो अवनी का। पर फिर केशव के साथ हुए व्यवहार की याद आते ही अवनी को उसका ये व्यवहार ठीक लगा। अभी अवनी ये सब सोच ही रही थी तभी पीहू अवनी के ऊपर अपना हाथ रखा।

वो गहरी नींद में थी पर अवनी को पीहू का हाथ थोड़ा गरम लगा। उसने पीहू के माथे को छूकर देखा तो वो बुखार से तप रही थी। अगले दो तीन दिन पीहू स्कूल नहीं जा पाई। केशव को पीहू को एक अलग सा लगाव हो गया था। केशव ने पीहू के एडमिशन के समय भरा हुआ फॉर्म निकलवाया तो देखा अवनी के अपने आपको सिंगल मदर लिखा था और तलाकशुदा वाले कॉलम पर टिक किया था। अब केशव ने उनके घर का पता देखा जो कि एक कॉलोनी का था जो स्कूल से पास ही थी। वैसे भी पीहू की बनाई हुई एक ड्राइंग जिलास्तर पर चुनी गई थी जिसके लिए पीहू को पुरुस्कार मिलना था। पुरुस्कार के लिए पीहू का वहां जाना बहुत जरुरी था। ये सब सोचते हुए पता नहीं कैसे केशव के कदम खुदबखुद अवनी के दिए पते की और बढ़ गए। 

अब पीहू की हालत में थोड़ा सुधार था हालांकि थोड़ी कमज़ोरी थी। जैसे ही केशव वहां पहुंचा। अवनी के दरवाजा खोलने पर सीधे पीहू के पास पहुंचा। पीहू की आंखों में उसको देखकर एक चमक आ गई। पीहू भी केशव को देखकर टूटे फूटे शब्दों में उसे पापा कहकर पुकारने लगी। अवनी ने पीहू को टोकने की भी कोशिश की पर वो उसकी जो दशा था ऐसे में उसे समझाना भी मुश्किल था। 

केशव ने ही अवनी को ये कहकर रोक दिया कि वो मासूम ये सब नहीं जानती। बहुत लंबे अरसे के बाद केशव की आवाज़ में थोड़ी नरमी थी। आज उसके ये पूछते ही कैसी हो अवनी ? वो फूट फूट कर रो पड़ी। अब तक जो भी उसके साथ घटा उसने केशव को कह सुनाया और साथ ही साथ केशव के साथ उसके पापा और उसने जानबूझकर जो व्यवहार किया था माफ़ी मांगी। 

केशव तो अवनी के दर्द की परिकाष्ठा सोचकर ही बहुत दुखी था।उसने भी अवनी से अपने रूखे व्यवहार की क्षमा मांगी और फिर पीहू की बनाई हुई पुरुस्कृत ड्राइंग दिखाई जिसमें उसने अवनी के साथ अपनी और केशव की भी तस्वीर बनाने की कोशिश की थी। तस्वीर पर एक कोने में हैप्पी फैमिली लिखा था। अवनी तो पीहू की इतनी सुंदर ड्राइंग और लिखाई देखकर ही अभिभूत थी। उसको ये भी लग रहा था कि दुनिया से बचने वाली उसकी मासूम सी बेटी के मन में भी भावनाओं का सैलाब उमड़ता है। वो ये सोच ही रही थी कि केशव ने ये कहकर कि क्या वो उसको पीहू का पापा बनाना पसंद करेगी ? उसकी सोच को विराम दे दिया। केशव की ये बात सुनते ही अवनी ने शर्म से आंखें झुकाकर अपनी मौन अभिव्यक्ति दे दी। आज पीहू की हैप्पी फैमिली वाली ड्राइंग असल में भी पूर्ण हो गई थी। 

दोस्तों ये थी मेरी कहानी। एक मां ही होती है जो अपनी ममता की छांव बच्चे पर बनाए रखने के लिए कई बार संस्कारहीन भी बन जाती है।

नोट: कहानी पूर्णतया काल्पनिक है। असली जीवन से इसकी तुलना ना करें।

#संस्कारहिन 

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

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