घरवाले है या मेहमान – रश्मि प्रकाश  : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi :

‘‘सुनो …आज माँ ,भैय्या ,भाभी और दोनों बच्चे पन्द्रह दिन की  छुट्टियां मनाने यहाँ हमारे पास आ रहे हैं…उनके सत्कार में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए…पहली बार आ रहे हैं वो लोग हमारे पास …तो समझ लो तुम्हारे लिए ये परीक्षा की घड़ी है….उनके पास हम जब भी गए तो दो चार दिन के लिए ही जाते थे…भाभी के साथ मिलकर तुम सब काम सँभाल लेती थी पर अब वो हमारे घर पहली बार आ रही है तो उनसे काम नहीं करवाना….भैय्या के सामने सिर पर पल्लू जरूर रखना….माँ जो भी बोले पलट कर जवाब मत देना।” हज़ारों हिदायतों के साथ  समर रेलवे स्टेशन जाने के लिए निकल गए

इधर मानसी ये सब सुन कर सोचने लगी क्या मुसीबत है ये घरवाले आ रहे हैं सा फिर कोई ऐसे मेहमान जिनके लिए मुझे इतनी हिदायत दे गए।

मानसी जल्दी जल्दी काम निपटाने में लग गई। 

रात के नौ बजे ट्रेन आएगी….आते ही सबको पानी….चाय दूं और आते खाना ही खायेंगे?  

मानसी खुद से सवाल कर किचन में घुस कर एक तरफ़ चाय का पानी रख दी साथ ही साथ थोड़ी रोटियां सेंकने लगी ताकि ज्यादा वक्त न लगे। 

इतने में उसकी डेढ़ साल की बेटी कुहू रोने लगी। 

सब काम छोड़कर वो बेटी के पास दौड़ कर गई…उसे गोद में उठाया और दूध पिला कर सुलाने की कोशिश करने लगी।

तभी कॉल बेल बज उठा…मानसी जल्दी से कुहू को लिटा कर दरवाजा खोलने गई।

मानसी ने अपनी तरफ से सबका पूरा ध्यान रखने की पूरी कोशिश करती रही पर सहयोग के नाम पर उसे किसी से कोई भी उम्मीद नजर भी नहीं आ रही थी। 

समर जब तक घर में रहते अपने घरवालों के साथ बातें करने में व्यस्त रहते। 

मानसी कुहू और किचन में चक्कर घिन्नी की तरह घुमती रहती। 

समर मानसी की हालत देख समझ गए कि वो बिना बोले सब करती रहेगी….और वो अपने घरवालों को वो कुछ भी बोल नहीं सकता है क्योंकि ये बात माँ ने बातों बात में कह दी थी कि उन लोगों को पूरा सम्मान देना… तेरे पिता के गुजर जाने के बाद इन्हीं भाई भाभी ने तुम्हें पढ़ाया लिखाया इस क़ाबिल बनाया है तो तुम लोगों का भी फ़र्ज़ बनता है उनका इतना मान तो करो।

किसी तरह एक सप्ताह बीता ही था कि समर को टाइफाइड हो गया….अब मानसी के लिए परीक्षा  की मुश्किल घड़ी आ गई। 

वो सब का ध्यान तो रखती ही थी पर खुद का ध्यान रखना मुश्किल होने लगा। 

छोटी कुहू को ज्यादा गोद की आदत नहीं थी पर थी तो वो बच्ची ही मानसी इन लोगो की खातिरदारी के चक्कर में कई बार उसको रोता छोड़ इनलोगो के लिए चाय ,पानी ,खाना ही करती रहती। 

समर के लिए अलग से खाना बनाना ,फल देना, कभी कभी शरीर में दर्द हो रहा हो तो मालिश करना, इन सब चक्कर में मानसी परेशान तो हो रही थी पर कुछ बोलना नहीं की गाँठ अब ढीली पड़ने लगी थी उसको लग रहा था ये कैसा परिवार है जो बस छुट्टियाँ मनाने आए है बाहर घूमवा फिरना कर रहे अपनी मस्ती कर रहे हैं पर ना समर की परेशानी दिख रही है ना मेरी। 

सास भी बस बोलती रहती ….पानी दे दो सबको….थोड़ा चाय बना दो….तो वक़्त पर खाना दे दो… बच्चों के लिए ये बना दो पर मदद के नाम पर मानसी के खुद के दो ही हाथ चलते रहते।

दो घड़ी कुहू को सास लेती भी तो कुहू किसी के पास रहती नहीं थी।

एक समर के पास रहती है पर अब वो भी बीमार पडे़।

समर की तबियत खराब सुन कर मानसी की माँ उनको देखने आई। 

मानसी की हालत देख कर एक माँ का कलेजा रो पड़ा।

अब वो किचन में मदद करने लगी और बोली तुम कुहू और दामाद जी को देखो।

मानसी माँ के आने से खुश तो थी पर जानती थी सास की नजर में उसकी माँ बस बहू की माँ भर ही है जो बेटी की मदद कर रही तो क्या गलत हम तो मस्ती करने आए हैं आराम करेंगे।

मानसी ने किचन माँ के हवाले कर समर पर ज़्यादा ध्यान देना शुरू किया। 

डॉक्टर घर आकर देख जाते थे बोले,”कमजोरी है अभी भी…हेल्दी और सुपाच्य खाना खिलाइए ।”

कुछ दिन बाद समर ठीक हो गए पर कमजोरी अभी भी थी।

देखते देखते पन्द्रह दिन भी गुजर गए। 

ससुराल वाले अपने नियत तिथि को जाने के लिए तैयार हो गए। 

पहली बार आए थे तो सबके लिए कपड़े भी लेने थे। समर उस हालत में भी जाकर सबके लिए कपड़े लेकर आए। माँ खुश होकर बोली ,‘‘की बेटा कितना सोच रहा सबके लिए….इतना ध्यान रखता है सबका।‘‘

मानसी टुकुर टुकुर बस सास को देख रही थी।

सोच रही थी किसने क्या किया वो तो भगवान ने देखा। 

जब वो लोग चले गए तब मानसी की माँ ने समर से पूछा,‘‘ बेटा मेरी बेटी आपके परिवार वालों की खातिरदारी में पास हुई?‘‘

समर आश्चर्य से सास को देखकर नजरे झुका कर बोले ,‘‘ मैंने देख लिया माँ  किसकी परीक्षा हुई और किसने उसको सही तरीके से हल किया…मैं जानता था मानसी को परेशानी होगी क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता था छोटा हूँ तो माँ कभी नहीं चाहेगी कि भाभी यहां आकर काम करे और ना माँ करेंगी क्योंकि वो भी दिखाना चाहती थी कि मैं कोई काम नहीं करती अब दो -दो बहुओं के रहते…. मैं ये नहीं जानता था कि वो खुद से भी पहल नहीं करेंगी….ना माँ ने ना भाभी ने किसी ने मानसी की हालत नहीं समझी और मैं उसकी कोई मदद नहीं कर पाया….आप के आने से मानसी ठीक से खाने और सोने लगी थी…नहीं तो इसे बस ये फिक्र रहती थी कोई गलती ना हो जाए और मैं नाराज ना होजाऊँ ….मानसी ये परीक्षा हम दोनों के लिए ही थी और इसमें तुमने बाजी मार ली और मैं हार गया… अब से एक वादा करता हूँ जब भी वो लोग आएँगे कोई मदद करें ना करें पर मैं तुम्हारी हर संभव मदद करूँगा और कोशिश करूँगा ।”

मानसी की माँ ने बेटी और दामाद को आशीर्वाद देते हुए कहा,” गृहस्थी ऐसे ही चलती है… मिल जुलकर चलना पड़ता है नहीं तो किसी एक के कंधे पर बोझ दे देने से आने वाला चाहे कोई भी क्यों ना हो मुसीबत लगने लगता है ।”

परिवार मिल जुलकर संग में रहते तो अच्छा रहता है। जब किसी का आना किसी के लिए मुसीबत बन जाए ऐसे घरवालों से लोग दूरियाँ बनाने लगते। 

मेरी रचना पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा ।

धन्यवाद 

रश्मि प्रकाश 

# मुसीबत

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