गंवार कौन – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

पूरे गाॅंव में ढ़ोल नगाड़े बज रहे थे। क्यूं नहीं होता, रंजन गाॅंव का पहला युवा था, जिसका देश की प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा में चयन हुआ था। माता–पिता, भाई–बहन के पाॅंव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ था, फोन की घंटी चुप होने का नाम नहीं ले रही थी। रंजन के मम्मी पापा गर्व से बधाई स्वीकार करने में लगे थे।

“अब तो चाॅंदी ही चाॅंदी है आप लोग की, एक से एक बड़े लोगों के घर के रिश्ते आएंगे। दान दहेज का अंबार लग जाएगा। हमें बुलाना न भूलिएगा।” रिश्तेदार, अड़ोसी पड़ोसी की बातें सुनकर रंजन के घर वाले गदगद हुए जा रहे थे।

“हाॅं, हाॅं रिश्ते बराबर वालों में ही अच्छे लगते हैं। कैसे भूल जाएंगे भाई। अपनों को कौन भूलता है और भूल गए तो खुद ही चले आइएगा, अपनों को बुलाना थोड़े न पड़ता है।” इसी तरह की कई बातें चर्चाएं हवाओं में तैर रही थी।

“पापा आप क्यों नहीं समझते हैं, रिश्ता बराबर वालों में होने चाहिए। श्यामपुर वाले कलेक्टर साहब की बेटी हमारे घर में नहीं टिक पाएगी। फिर मुझे मत कहना हमें कुछ नहीं समझती है।” रंजन फोन पर अपने पापा से बात करते हुए उनकी बात एक सिरे से नकारता हुआ कहता है।

“अरे बिटवा कलेक्टर साहब बराबरी में ही तो हैं। खूब सारा दान दहेज भी देंगे कह रहे हैं और दिल्ली वाली कोठी भी तुम्हारे नाम कर देंगे।” रंजन की माॅं चहकती हुई बता रही थी।

लेकिन घर वालों के सामने रंजन की एक ना चली। पोस्टिंग के साथ साथ जीवन में पति के रूप में भी उसकी पोस्टिंग हो गई। रंजन की पत्नी संजना को रंजन और उसके परिवार वाले फूटी आंख नहीं सुहाते थे। 

गंवार हैं गंवार सब, आपने क्या देख कर मेरा विवाह वहाॅं कर रहे हैं। संजना अपने माता पिता पर बिफर पड़ी थी।

तुम्हें कौन सा उन लोगों के साथ रहना है। इतने दान दहेज के बाद पूरा घर तुमसे दब कर रहेगा। समझा बुझा कर कलेक्टर साहब ने संजना को रंजन के साथ विवाह के लिए मना लिया। जिसका नतीजा था कि संजना की नजर में रंजन का ना कोई अस्तित्व था और ना ही उसकी कोई इज्जत। उसके मातहत के सामने भी वो उसका और उसके परिवार वालों का मखौल उड़ाने से बाज नहीं आती थी।

“इतने महंगे महंगे कटलरी सेट पापा ने दिए हैं, फिर भी तुम क्या गंवारों की तरह हाथ से खा रहे हो।” डाइनिंग टेबल पर खानसामा के सामने ही संजना रंजन को लताड़ने लगती थी। 

ये लॉन से फूल तोड़ने किसने कहा था और क्या गंवारो की तरह बाल में फूल लगाए घूम रही हो। गंवार के घर गंवार लोग ही जन्म लेंगे ना, जिंदगी ही खराब हो गई मेरी। 

रंजन ने बड़े शौक से अपने बड़े से घर में रहने के लिए घरवालों को आमंत्रित किया था और संजना किसी को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी। कई बार रंजन ने उसे समझाने की, बगल के कोठी में रहने वाले उसके माता पिता को बताने की कोशिश की थी, लेकिन पति पत्नी का मामला कह कर संजना के माता पिता हमेशा हाथ खींच लेते थे।

रंजन के माता पिता रंजन से भी कोई शिकायत नहीं कर सकते थे क्योंकि रंजन के बार बार आगाह करने बावजूद ये सब उनकी जिद्द का ही परिणाम था। संजना के साथ जितना भी तालमेल बिठाने की कोशिश करते, संजना अपने माता पिता से तुलना कर सब कुछ गुड़ गोबर कर देती। उस घर में रंजन का परिवार खुद को अलग थलग ही महसूस करता इसलिए अब उन्होंने लौटने का मन बना लिया था।

“रंजन रंजन उठो, मम्मी का कॉल है, पापा की तबियत ठीक नहीं है। हाथ पाॅंव ठंडे हो रहे हैं उनके, जल्दी चलो।” संजना पौ फटते ही सोए हुए रंजन को जोर जोर से हिलाती हुई बोली।

इतनी गहमागहमी और शोरगुल से रंजन का परिवार भी जग गया और मामले की नजाकत भाॅंपते हुए रंजन और संजना के साथ हो लिए।

पिता को अचेतावस्था में देख संजना के हाथ पैर ढ़ीले हो गए थे। रंजन देखते ही डॉक्टर को कॉल कर चुका था और रंजन के माता पिता घर से लाए सरसों के तेल से उनके सुन्न पड़े हाथ पैर में मालिश प्रारंभ कर चुके थे। जब तक डॉक्टर का पदार्पण हुआ मालिश में शरीर को मिले गर्मी से संजना के पिता धीरे धीरे ऑंखें खोलने लगे थे। लेकिन अभी बोलने की हालत में नहीं थे।

अचानक इनका बीपी और शुगर कम हो जाने के कारण इन पर बेहोशी हावी होने लगी थी। आप लोगों की मालिश के फलस्वरूप इनके शरीर में ब्लड फ्लो बढ़ा और गर्मी आई, जो इनके नीम बेहोशी की हालत से निकलने में मददगार हुआ। दवाइयों का पर्चा रंजन की ओर बढ़ाते हुए डॉक्टर ने कहा। डॉक्टर की बात सुनकर संजना और उसकी मम्मी शर्मिंदा होती हुई खड़ी रही।

“समधी समधन जी हमें माफ कर दीजिए। सभी में सारे गुण नहीं पाए जाते हैं और मद में चूर होकर किसी के गुण को पहचान सकने में भूल करना गंवार होने की निशानी है।” संजना की माॅं की ऑंखों में पश्चाताप के ऑंसू अविरल बह रहे थे।

आरती झा आद्या

दिल्ली

 

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