फर्ज – गीतांजलि गुप्ता

घर मे और कोई तो था नहीं पुनिता और आशीष अकेले रहते हैं। आशीष बैंक में बड़े अफ़सर के पद पर है शादी के बाद पुनिता की इच्छानुसार दूसरे शहर में बदली करा ली थी। घर के काम काज में हाथ बंटाने को एक बड़ी आयु की महिला रख ली थी। पुनिता उसे काकी बुलाती थी। पुनिता का पूरा नौ माह ख़याल रखा।

पुनिता बच्चे को पा कर खुश तो है पर अपना सुख अपना आराम अपनी नींद सब का त्याग उससे नहीं हो पा रहा। बात बात में आशीष से बहस भी करती  चिड़चिड़ापन सवार होने लगा। उसकी माँ दो दिन आई बच्चे को मिली कपड़े खिलोने और आशीर्वाद दे लौट गई।

आशीष भी कतराता रहता उसके पास अधिक समय नहीं था कुछ समय भी बच्चे को न दे पाता। बच्चे को पालना बड़ी जिम्मेदारी है। पुनीता के सामने छुट्टियों का प्रश्न भी खड़ा था। नौकरी छोड़नी पड़ेगी। पुनिता को परेशान देख काकी ने घर के काम के साथ साथ बच्चे का पूरा काम अपने जिम्मे ले लिए। पुनिता को तो मन चाही मुराद मिल गई।

अब काकी अपने घर नहीं जाती रात को भी पुनिता के घर ही रहती और मोक्ष के कमरे में झूले के साथ बिस्तर डाल सो जाती। पुनिता के बनाये टाइम टेबल के अनुसार बच्चे का खाना, नहाना, सोना सब पुष्पा करती। सोसायटी में, पार्टी में, ऑफिस में पुनिता फिर से स्वतंत्र घूमने लगी। रविवार व शनिवार को भी देर तक सोती कुछ समय बच्चे  को देती।

मोक्ष का जन्मदिन था सुसराल से सभी लोगों को बुलाया माँ पापा भी आये बच्चे के लियें उपहारों का ढेर लग गया। सभी लोग बच्चे को देख बातें मिला रहे थे। मोक्ष को जो भी खड़ा करता वो थप से गिर पड़ता। “इसकी परवरिश कुछ ठीक नहीं हो रही।”आशीष की मम्मी ने जैसे ही बोला “पुनिता का गुस्सा फूट पड़ा तो रहिए ना यहाँ और कीजिए इसकी परवरिश।”


जब ये सब बातें हो रही थी पुष्पा के चेहरे पर घबराहट के कारण पसीना छलक आया। उठकर जाने लगी तो पुनिता की माँ भी उसके पीछे हो ली। आखिर पुष्पा इतना घबरा क्यों गई अपने कमरे में जा पुष्पा कुछ छुपाने लगी। पूछने पर बोली कुछ नहीं है ये डिब्बा है मुझे मसाला खाने की आदत जो है माजी बस वही खाने आई हूँ।

दिखा ज़रा ,सरिता जी ने उसके हाथ से डिब्बा ले लिया।

उन्हें वो मसाला जैसा नहीं लगा तुरंत ले कर हाल में आईं सभी को दिखाते हुए पूछने लगी ये पान मसाला तो नहीं लगता।

एकाएक पुष्पा घर से बाहर भागने को हुई आशीष तब तक समझ चुके थे कि ये कोई नशीला पदार्थ है जो पुष्पा मोक्ष को चटाती है ताकि मोक्ष दिन भर सोता रहे और पुष्पा को परेशान न करे। सीधी साधी दिखने वाली अधेड़ उम्र की महिला ऐसा काम कर रही है पुनिता को विश्वास नहीं हुआ। आंखों के आगे अंधेरा छा गया। आत्मग्लानि ने पुनीता को हिला कर रख दिया। पुष्पा पर विश्वास क्यों किया। याद आने लगा की मोक्ष को सचमुच उसने हमेशा सोते ही देखा था। ऑफिस जाते समय भी और लौट कर आने पर भी। प्रश्नों का चक्रव्यूह ने उसका मस्तिष्क कुंद कर दिया। माँ होकर भी वो कैसे अंधी हो गई।

पुष्पा को धक्के मार घर से निकल दिया। मोक्ष को घण्टों सीने से लगाए बैठी रहीं। किसी से आँख नहीं मिला पा रही थी पुनिता।

नौकरी से इस्तीफा देने का फैसला ले लिया सबने मोक्ष को क्रेच में छोड़ने की सलाह दी परन्तु पुनिता ने किसी की बात नहीं मानी कहते हैं न दूध का जला छाज को भी फूंक मार कर पीता है तो अब पुनिता भी मोक्ष की परवरिश अपने आप ही करेगी। माँ के फर्ज से मुँह नहीं फेर सकती।

गीतांजलि गुप्ता

नई दिल्ली©®

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