चीटियां मेला जाती है – सुनीता मुखर्जी “श्रुति Moral Stories in Hindi

चार-पांच दशक पहले की बात है जब नित्या बहुत छोटी थी। उसे चीटियां बहुत आकर्षित करती थी। हमेशा सोचती यह चीटियां कितनी अच्छी है दूर-दूर तक घूमने चली जाती है।

आखिर जाती कहांँ है??

यह उत्सुकता हमेशा उसके मन में बनी रहती। 

एक दिन नित्या पड़ोस की एक महिला से बोली काकी!! यह चीटियां कहांँ जाती है? 

उन्होंने छोटी बच्ची को नजरअंदाज करते हुए कहा- “चीटियां मेला देखने जाती हैं।”

नित्या के बालमन पर यह बात घर कर गई। 

कहते हैं छोटे शिशु जब कोई प्रश्न करें तो उसका जवाब सोच-समझकर कर सही देना चाहिए क्योंकि उनके मानस पटल पर वह बात स्थाई रूप से अंकित हो जाती है। 

नित्या का पालन पोषण बूढी दादी मांँ ने किया था।नित्या के माता पिता नहीं थे।

नित्या बहुत बातूनी स्वभाव की थी।

अपनी वाक्पटुता के कारण अड़ोस- पड़ोस में आकर्षण का केंद्र रहती थी।

दादी  से वह सवालों की झड़ी लगा देती थी। दादी कभी उसकी बातों का जवाब देती और कभी झल्लाकर उसे  चुप करा देती थी। 

नित्या के बाल मन की कई अनसुलझे सवालों का जवाब देने के लिए वह हमेशा उपलब्ध नहीं रहती थी क्योंकि उन्हें भी घर बाहर के हजार काम करने होते थे।

चार साल की बच्ची नित्या को मेला देखना बहुत अच्छा लगता था। 

और हो भी क्यों न!!! 

गांव में मेला छोटे बड़े सभी के लिए उस जमाने में किसी उत्सव से कम नहीं होता था।

नित्या ने मन ही मन ठान लिया कि वह चीटियों के साथ-साथ मेला देखने जरूर जाएगी। 

एक दिन सुबह सो कर उठी तो उसने देखा कि घर के बाहर चीटियां कहीं दूर आ- जा रही है नित्या भी उनके साथ-साथ चलने लगी।

नित्या इधर-उधर कुछ न देखकर सिर्फ चीटियों का रास्ता ही देख रही थी कि वह किधर जा रही है?? 

उनके साथ- साथ उछल -उछल कर ध्यान से चल रही थी, कि कहीं कोई चींटी पैर के नीचे दब न जाए।

चलते-चलते  दोपहर हो गई थी। नित्या बहुत दूर वीरान में पहुंच गई।

उसने चारों तरफ देखा वहां सिर्फ बबूल ही बबूल के पेड़ दिख रहे थे। 

उसे दूर-दूर तक कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। 

नित्या को बहुत जोर से भूख और प्यास लगी अब उसे दादी की याद आने लगी। 

घर से जब निकली थी तब सोच रही थी कि मेला पहुंचकर खूब अच्छी-अच्छी चीज़ें खाने को मिलेंगी ….लेकिन उस छोटी सी बच्ची को क्या पता कि पैसे के बदले सब चीजें मिलती हैं।  

जेठ के महीने की भीषण गर्मी चारों तरफ लपटें निकल रही थी। दोपहर की गर्मी और नन्ही सी जान…. ओफ्फ!!

चारों तरफ अपने आप को अकेला पाकर नित्या जोर-जोर से रोने लगी, वापिस घर जाने का रास्ता भी उसे पता नहीं था। 

मेला भूल गई अब सिर्फ उसे अपनी दादी की याद आ रही थी।

इधर दादी नित्या को घर-घर में जाकर खोज रही थी और गुस्से से चिल्ला रही थी इस नित्या की बच्ची ने नाक में दम कर रखा है!!! 

मिलो बच्चू आज जमकर धुनाई करूंगी!!

दादी खोज- खोज कर परेशान हो गई । उनके सब्र का बांध टूट गया और वह जोर-जोर से रोने लगी….कोई मेरी बच्ची को ढूंढ कर ला दो।

जेठ के महीने की दोपहरी में तो कोई भी बाहर नहीं निकलता था। बाजार हाट के लिए लोग सुबह शाम ही  निकलते थे।

उस दिन खरीदारी करते-करते शंभू चच्चा को बाजार से लौटने में देर हो गई। भरी दोपहरी धूप से साइकिल के पीछे बहुत बड़ा बोझा लादे तमतमाते हुए साइकिल चला कर आ रहे थे…. अचानक वीरान में एक बच्चे के रोने की आवाज सुनकर वह ठिठक गए!!

उन्होंने अपनी साइकिल का रुख बच्चे के रोने की दिशा में मोड़ दिया… बच्चे को देखकर अचंभित रह गए!!

बोले नित्या तू!!

यहां कैसे आई?

उनके आश्चर्य का ठिकाना न था!!

चच्चा हम चीटियों के साथ मेला देखने आए थे। लेकिन मेला कहीं दिखाई नहीं पड़ा। 

बच्चे की मासूमियत पर शंभू चच्चा ने प्यार से उसके सिर पर एक थपकी दी।

धत् पगली!!  किसने कहा चिट्टियां मेला देखने जाती है।

चच्चा हमें बहुत जोर से भूख और प्यास लगी है। शंभू ने थैले से कुछ खाने का सामान निकाल कर दिया और साइकिल के डंडे पर बैठाकर घर की ओर चल दिए।

दादी के आसपास पूरे गांव के लोग इकट्ठा थे। दादी जोर-जोर से दहाड़े मार – मारकर लगातार रोए जा रही थी कोई मेरी नित्या को ढूंढ कर ला दो!!

उस समय गांव में अक्सर भेड़िया बहुत आते थे जो एकान्त पाकर जानवरों को मार कर खा जाते थे।

कुछ लोग खुसरूपुर कर रहे थे कि कहीं नित्या को भेड़िया उठाकर तो नहीं ले गया ले गया,,,, और अब तक तो…..

तभी दूर शंभू चच्चा दिखाई दिए जो नित्या को साइकिल में बैठाकर ला रहे थे।

नित्या को देखकर सब की जान में जान आई। दादी ने अपनी बच्ची को अपने आंचल में छुपा लिया।

कहांँ चली गई थी तू मेरी बच्ची??

शंभू चच्चा ने काकी को बहुत भला बुरा कहा…

काकी -मैंने तो बस यूंँ ही कह दिया था।

तुम्हारे छोटे से मजाक से आज नित्या की जान भी जा सकती थी।

बच्चा अपना हो या पराया किसी को सही शिक्षा नहीं दे सकते तो कम से कम गलत भी मत दो!!

बच्चे तो बड़ों की बातों को शत प्रतिशत सही मानते हैं और उनका अनुसरण करते हैं।

आज तुम्हारे एक गलत जबाब से छोटी सी जान को कितना मुश्किल हो जाता।

काकी को अपनी ग़लती का अहसास हुआ।

– सुनीता मुखर्जी “श्रुति”

     लेखिका

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश

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