ऐसी विदाई हो तो.. – प्रियंका मुदगिल

“भाभी! आपकी लाडो मिली की शादी की डेट फिक्स हो गई है लड़केवालों ने कहा कि उन्हें सादे तरीके से ही शादी करनी है….इसलिए जब  देखने आए तभी  अंगूठी पहनाकर शगुन कर गए…..आप आएंगे ना…””संगीता ने अपनी जेठानी रजनी को फोन पर कहा।

रजनी :- “”जब इतना सबकुछ कर ही लिया है तो शादी भी अकेली ही कर लेना……मेरी क्या जरूरत है तुम लोगों को…..””

संगीता:- “” जो कुछ भी हुआ, उसे भूल जाइए ना भाभी……देखो मैं भी सब भूल चुकी हूं वैसे भी अभी सब बातों को याद करके कोई मतलब नहीं है……बाकी आपकी मर्जी……””और यह कहकर संगीता ने फोन काट दिया।

रजनी को बहुत गुस्सा आया। बाकी किसी के दिल पर क्या बितती है…आज भी उसे कोई मतलब नहीं ।

शाम को रजनी ने अपने पति राजेश से सब बातें कहीं। सब सुनने के  बाद  राजेश के मुंह से भी यही निकला कि “एक बार भी रिश्ता तय करने से पहले सुनील और संगीता ने हमसे पूछा भी नहीं….. अभी मैं जिंदा हूं क्या उसे इतना भी याद नहीं है…..जब आज उसने  मुझसे यह हक छीन ही लिया है तो मुझे भी बस शादी  का हिस्सा नहीं बनना है….एक मेहमान की तरह मैं शामिल हो जाऊंगा…””

बढ़ते हैं कहानी के आगे की ओर….

यह कहानी है दो भाइयों के परिवार की….

बड़ा बेटा राजेश अपनी पत्नी रजनी, छोटे भाई सुनील और माता-पिता के साथ रहता था। राजेश के पिता का खुद का बिजनेस होने की वजह से राजेश जी उसी बिजनेस को आगे बढ़ाने में लग गया। लेकिन सुनील की रूचि बिजनेस में बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए उसने अपनी पढ़ाई की पर ही फोकस किया और उसकी एमबीए  पूरी करने के बाद एक कंपनी में जॉब की लग गई। उधर राजेश और रजनी की शादी को तीन साल बीत गए थे लेकिन उनके कोई संतान नहीं हुई। हर तरह के इलाज के बावजूद भगवान ने उन्हें इस सुख से वंचित रखा। उसी चिंता में राजेश की माता जी बीमार रहने लगी कि उनका वंश कैसे आगे बढ़ेगा।




वैसे जब से रजनी घर में आई थी उसने घर के हर काम को अपने ऊपर ले लिया था। घर में हर सदस्य काम के लिए रजनी को ही पुकारता था।

चार साल बाद सुनील की शादी संगीता से हुई और संगीता घर की छोटी बहू के रूप में आ गई। रजनी उसे अपनी छोटी बहन की तरह ही प्यार करती है। संगीता को रसोई का कोई भी काम नहीं आता था लेकिन रजनी ने उसे सब काम में पारंगत कर दिया। सासु मां भी दोनों में बहनों जैसा प्यार देखकर वह संतुष्ट रहती। एक दिन संगीता ने पूरे घर में सबको खुशखबरी थी कि वह मां बनने वाली है।रजनी तो इस बात को सुनकर बहुत ज्यादा खुश हुई और पूरे नौ महीने उसने  संगीता का बहुत अच्छे से ख्याल रखा। कुछ समय बाद, संगीता ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया। जन्म के बाद संगीता ने बच्ची रजनी के हाथ में सौंप दी और कहा, “”भाभी!!भले ही इसको जन्म मैंने दिया है…लेकिन आज से इसकी असली मां आप ही हैं…. आप बड़ी माँ और मैं छोटी माँ…..ठीक है ना…..””

यह सुनकर रजनी कृतज्ञता से संगीता को देखने लगी।

रजनी:- ” संगीता!!तुमने मुझे दुनिया की हर खुशी दे दी …मेरे जीवन की कमी को तुमने पूरा कर दिया…..इस बच्ची को देखकर तो मैं अपना सारा दुःख दर्द भूल जाऊंगी…..आज हम दोनों को हमारी संतान मिली है….इसलिए आज से हम इसका नाम भी ‘मिली’ ही रखेंगे””

धीरे-धीरे मिली के सब कामों की जिम्मेवारी रजनी ने ले ली।इसलिए संगीता आराम से निश्चित होकर कहीं भी आ जा सकती थी। उसे किसी तरह का कोई बंधन भी नहीं था । लेकिन पता नहीं क्यों पास पड़ोस के लोगों  और कुछ रिश्तेदारों की बातों में आकर संगीता के मन  में रजनी के प्रति नफरत  दिन प्रतिदिन बढ़ती गयी।

जब मेरी सात साल की थी तब एक दिन खाना खाने के चक्कर में संगीता ने उसे थप्पड़ मार दिया। तब रजनी ने प्यार से कहा ,”” अरे , मेरी बेटी के ऊपर क्यों हाथ उठा रही हो….इधर दो खाना…मैं इसे खिला देती हूँ..””

लेकिन संगीता ने मिली को अपनी तरफ खींच लिया और जोर से चिल्लाई, “”बस करो, यह बेटी बेटी का नाटक….मिली तुम्हारी नहीं ….मेरी बेटी है और आगे से इस पर हक जताने की कोशिश भी मत करना…..””

उसकी बातें सुनकर रजनी हतप्रभ रह गयी।

“ऐसे क्यों बोल रही हो संगीता!!क्या बात है..?मुझसे कुछ भूल हुई क्या…?””




“”भूल आपसे नहीं…भूल तो मुझसे हुई है भाभी….जो मैंने अपनी बेटी आप को सौंप दी….कभी आप खुद तो मां बन नहीं पाई””

रजनी ने उसे बहुत समझाया लेकिन बात इतनी बढ़ गई कि संगीता की एक-एक बात रजनी के हर घाव को हरा कर गई। उसे संगीता से इस तरह की उम्मीद नहीं थी कि वह उसे  माँ ना बनने का ताना मारेगी। नफरत इस कदर हावी हो गयी थी कि संगीता अपनी बेटी के ऊपर रजनी का साया भी नहीं पड़ने दे रही थी। कुछ महीनों बाद सुनील की दूसरे शहर में नौकरी लग गई  और वह संगीता और अपनी बेटी मिली को लेकर वहां शिफ्ट हो गया क्योंकि घर में भी आजकल दोनों देवरानी- जेठानी में बहुत तनाव हो गया था। और घर का माहौल भी धीरे-धीरे बिगड़ता जा रहा था।

 

वैसे भी कुछ लोगों का काम होता है कि दूसरों की खुशियों में वह आग लगाते ही है लेकिन अफसोस इस बात का था कि संगीता रजनी का प्यार उसकी परवाह  सब भूल गई। दूसरों की बातों में आकर उसने अपने संबंध हमेशा के लिए खत्म कर लिए। अब रजनी अपने बच्चे के लिए दिन-रात तड़पने लगी।  जो खालीपन मिली के आने से भर गया था वह अब उसे दिन रात तड़पाने लगा। लेकिन दो साल बाद भगवान ने उसकी प्रार्थना सुन ली और उसने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिय

बेटे के जन्म पर भी संगीता सिर्फ अपना फर्ज समझ कर उसके जन्म के बाद कुछ दिन के लिए रहने आई और वापस चली गई।

क्योंकि ना ही संगीता रखना चाहती थी और ना ही रजनी उसे रोकना चाहती थी।

और आज रजनी ये सब बातें याद करते करते रातभर रोती रही। सुबह उठी तो उसका सर बहुत भारी हो रहा था।

राजेश ने पूछा, “”क्या बात है ….तुम फिर से रातभर वही सब बातें सोचती रही….अब इन चीजों से बाहर भी निकल जाओ और अपने बेटे पर ध्यान दो””

“”हां शायद आप सही कह रहे हैं…मैं कुछ ज्यादा ही सोच रही हूं….जब मेरी बहन जैसी देवरानी ने ही मुझे इतना पराया कर रखा है तो फिर मैं अपनी उम्मीदें उससे क्यों बांधू..?””

मिली की शादी से कुछ दिन पहले रजनी और राजेश अपने बेटे के साथ वहां पहुंच गए। वैसे तो रजनी ने वहां जाते ही सारी जिम्मेदारियां उठा ली थी लेकिन फिर भी वह सब मन से यह सब काम नहीं कर रही थी।

एक दिन मिली ने कहा , “”बड़ी माँ!!मुझे नहीं पता आपके और मम्मा के बीच में अब तक क्या बात हुई और क्या नहीं….लेकिन सबमें मेरी क्या गलती…..मेरे लिए तो आप हमेशा से ही मेरी बड़ी माँ रहीं हैं…मेरी शादी आपके आशीर्वाद के बिना बिल्कुल अधूरी है…””




रजनी:- “हां बेटा, तभी तो दौड़ी-दौड़ी आ गई ना मैं…””

“”बड़ी माँ!!आप आ तो गई हैं…लेकिन मन से नहीं…””

और फिर रजनी अपनी सब बातों को पीछे छोड़कर  अपनी लाडो के ब्याह के पूरे रंगचाव करने लगी। 

यह देखकर संगीता  ने भी रजनी से अपने किए की माफी मांगी।

“”भाभी!!न जाने क्यों मैं लोगों की बातों में आकर अपनी बड़ी बहन को खो चुकी हूं…आपने हमेशा मुझे प्यार दिया लेकिन मैं लोगों की बातों में आकर समझने लगी थी कि आप मुझे मेरी बेटी से अलग कर देंगी जबकि मैंने ही उस पर सारे अधिकार आपको दिए थे….फिर भी न जाने मुझे क्या हो गया था….प्लीज मुझे मेरी गलती के लिए माफ कर दीजिए…””

“”सही कहा तुमने संगीता!!माफ तो मैं तुम्हें कर दूंगी लेकिन क्या  वह पिछला पूरा वक्त तुम मुझे लौटा पाओगी..?जिस लाडो को देखकर मैं अपनी तकलीफ सब भूल गई थी….ऐसी लाडो को तुम मुझसे छीन ले गई….और तो और तुमने मुझे उसे हाथ लगाने से भी मना कर दिया….तुम्हारे आने के दो साल तक मैं बहुत तड़पती रही…रात रातभर उठकर रोई हूं….क्या तुम वो रातें मुझे लौटा सकती हो….?जब अंशु पैदा हुआ तो तुम कुछ चार-पांच दिन के लिए आई और चली गई …दो पल भी तुमने मुझसे बात करना जरूरी नहीं समझा….क्यों  तुम लोगों की बातों में आकर हमारा बहन जैसा रिश्ता, प्यार और विश्वास बिल्कुल ही डगमगा गया या फिर कभी हमारे बीच का रिश्ता इतना मजबूत हुआ ही नहीं..””

“” भाभी!!जो भी हुआ भूल जाइए….लाडो तो आज भी आपकी ही बेटी है ना..””

“”सच कहूं तो संगीता, तुमने मुझे इतना दर्द और तकलीफ दी कि मेरा तुम्हारे पास आने का बिल्कुल मन नहीं था…मैं यहां आई हूं तो सिर्फ और सिर्फ मेरी लाडो की वजह से ….जहां तक माफ करने का करने की बात है तो उसके लिए मुझे थोड़ा वक्त चाहिए क्योंकि एकदम से सब कुछ भूल जाना किसी भी इंसान के हाथ में नहीं होता…..””




पर चाहे कुछ भी हो, आज रजनी के  मन को थोड़ा सा तसल्ली हुई थी कि कम से कम संगीता को अपने किए का पछतावा तो था। सारी बातें भूल नहीं पा रही थी लेकिन मन को थोड़ा सा शांति मिल गई थी और फिर वह धूमधाम से अपनी लाडो को सजाने में लग गई।

जब पंडित जी ने कन्यादान के लिए उसके माता-पिता को बुलाया तब संगीता ने हाथ पकड़कर रजनी को भी अपने साथ बिठा लिया और पूछा ,””पंडित जी!!क्या  हमारी मिली  बिटिया के दोनों माता-पिता साथ में उसका कन्यादान कर सकते हैं…?””

पंडित जी ने भी इस बात की सहमति दे दी।

कन्यादान करते वक्त रजनी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। आज उसे वही तकलीफ महसूस हो रही थी जब उसकी लाडो को संगीता उसके पास से ले कर चली गई थी। जैसे- तैसे खुद पर संयम रख के सारे विधि-विधान पूरे किए गए।

और विदाई के समय जब मिली अपनी बड़ी मां के गले लगी तो रजनी फूट-फूट कर रोने लगी

“”मेरी लाडो!! मेरी पहली संतान तू है और हमेशा तू ही रहेगी…कोई भी तकलीफ हो तो प्लीज बड़ी मां को पहले याद रखना…””

आज लाडो की विदाई के साथ-साथ अब तक जो उसके मन का गुस्सा और तकलीफ थी उसको भी उसने विदा कर दिया था।

और इस तरह से वर्षों से बिखरा हुआ परिवार फिर से पिछली बातों को भुलाकर एक हो गया।

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धन्यवाद🙏

#अपने_तो_अपने_होते_हैं 

स्वरचित एवं मौलिक

प्रियंका मुदगिल

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