एक अनूठी प्रेमकथा (भाग 1)- डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi :  आज रोहित का बड़े मीडिया चैनल में साक्षात्कार होना था। असल में उसने तीन साल पहले स्टार्टअप कंपनी शुरू की थी जिसका टर्नओवर आज करोड़ों में पहुंच गया था। छोटी सी लागत से शुरू हुई कंपनी का तीन साल में ही इतने बड़े मुकाम पर पहुंचना चर्चा का विषय था। वैसे भी सरकार द्वारा स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए समय समय पर नए उधमी को पुरुस्कार से भी सम्मानित किया जाता है जिसमें इस बार रोहित का भी नाम था।

रोहित और पूरे परिवार के लिए ये बहुत ही हर्ष और गर्व का विषय था। सबसे ज्यादा उत्साहित तो रोहित की अठारह साल की बेटी रिया थी। उसको लग रहा था कि जल्द से जल्द उसके पापा का लाइव इंटरव्यू आए और फिर वो अपने दोस्तों के बीच धाक जमा सके। नियत समय पर साक्षात्कार शुरू हुआ।

रोहित की पत्नी शिखा और बेटी रिया भी टीवी के सामने आकर बैठ गए थे। बाकी लोग जैसे रोहित के माता-पिता भाई-बहन,मामा-मामी,चाचा-चाची जो दूसरे शहर में रहते थे,ये लोग भी रोहित का साक्षात्कार देखने अपने अपने टीवी सेट के सामने बड़े मनोयोग से जुट गए थे। साक्षात्कार के प्रारंभ में औपचारिक परिचय से संबंधित प्रश्र थे पर बाद में जब रोहित से पूछा गया कि आपके यहां तक पहुंचने के पीछे किसका योगदान सबसे ज्यादा है?

तब रोहित ने बिना ज्यादा बात को घुमाए फिराए कहा कि उसके माता-पिता ने उसको पढ़ाया लिखाया। अपने स्तर से ऊपर उठकर सुविधाएं दी पर अगर बात यहां तक पहुंचने की है तो इसका पूरा श्रेय मैं अपनी गृहलक्ष्मी शिखा जो कि मेरी अर्द्धांगिनी भी है उसको दूंगा।  

ये सुनकर शिखा को तो सहसा अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ आज उसके पति ने पूरी दुनिया के सामने वो भी नेशनल टीवी चैनल पर अपनी सफलता का सारा श्रेय उसको दे दिया था। रोहित का तो साक्षात्कार अभी जारी था। रिपोर्टर उससे संघर्ष के दिनों के विषय में प्रश्न पूछ रहा था पर शिखा अपने अतीत के उन दिनों में पहुंच गई थी जब वह मात्र बाइस-तेईस वर्ष की उम्र में रोहित की पत्नी बनकर इस घर में आई थी।

पढ़ाई में वो शुरू से अच्छी थी और बहुत ही कम उम्र में उसने अपनी पढ़ाई पूर्ण कर नौकरी प्राप्त कर ली थी। शादी के समय भी वो नौकरी में थी।ससुराल पक्ष की तरफ बहू-बेटी में अभी तक कोई भी उस जितना पढ़ा लिखा नहीं था। ना ही नौकरी वाली बहू आई थी। वो काफी समय से पढ़ाई और नौकरी की वजह से घर से बाहर ही रही थी।

उसको रिश्तों में पनपती परस्पर ईर्ष्या या घर गृहस्थी के जोड़तोड़ का एहसास नहीं था। ऐसे में जब वो शादी करके आई तो उसने सास ननद के तो ताने झेले ही साथ साथ ससुराल पक्ष की अन्य स्त्रियों के मुख से भी अपने लिए व्यंगात्मक वचन ही सुने।

जब तब उसको घर के काम ना आने के लिए सुना दिया जाता।सास के ये वचन कि मां ने उसको कुछ नहीं सिखाया और फिर अपनी परवरिश और बेटी के गुणों का बखान उसका दिल दुखा जाता। बहुत संयत रहती वो पर अकेले में बहुत रोती। रोहित से भी कुछ कहने की कोशिश करती तो उसका जवाब होता कि उसको ऐसे लोगों की परवाह नहीं करनी चाहिए अपने में मस्त रहना चाहिए।इन सबके बीच वो लोग अपनी नौकरी वाली जगह आ गए।

अगला भाग

एक अनूठी प्रेमकथा (भाग 2 )- डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

 

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

#गृहलक्ष्मी

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