दिव्या(भाग–9) – आरती झा आद्या : Moral stories in hindi

“माँ मुझे लेकर बाहर आ गई। मैंने माँ से पूछा है वो लोग ऐसे क्यूँ बोल रही थीं।” प्रियम्वदा खुद की रक्षंदा से होने वाली वार्तालाप को बता रही थी।

“उनकी और हमारी स्थिति एक ही है। उन सब की स्थिति भी गुलामों जैसी ही है और हमारी भी.. इस स्थिति से निकलने के लिए वो लोग भी छटपटा ही रही हैं। रानी कहलाने का एक यही फायदा है कि अपनी कुंठा, अपना नैराश्य किसी पर निकाल सकती हैं और हम ये भी नहीं कर सकती हैं। हमेशा की तरह माँ के चेहरे पर भावहीनता छाई हुई है।” इतना बोल कर दिव्या चुप हो गई।

राघव कुछ सेकेंड दिव्या के बोलने का इंतजार करता रहा। जब दिव्या की कोई और प्रतिक्रिया नहीं आई तो राघव मि. जॉन की तरफ देखता है। मि. जॉन इशारा कर बताते हैं कि वो दस से एक तक गिनती कर रहे हैं। इस बीच अगर दिव्या कुछ नहीं बोलती है तो आज का सेशन यही खत्म करेंगे।

मिस्टर जॉन की उलटी गिनती समाप्त होती है और इस दरमियान दिव्या की दिशा में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। मिस्टर जॉन राघव से दिव्या को अचेतन अवस्था से चेतना की ओर लाने का इशारा करते हैं।

राघव, मिस्टर जॉन के इशारे को समझकर, धीरे-धीरे दिव्या के पास बैठता है। उसकी आंखों में संवेदना है और उसमें व्यक्तिगत सहानुभूति दिखाई देती है। राघव धीरे-धीरे बातचीत की शुरुआत करता है, अपने शब्दों का सजगता से चयन करता है ताकि वह दिव्या की भावनाओं का समर्थन कर सके। इस महत्वपूर्ण क्षण में राघव दिव्या को सुनने और समझने के लिए संवाद स्थापित करने के लिए अपनी सकारात्मक भूमिका के साथ उसे धीमे-धीमे चेतनावस्था में लाने का प्रयास करता है। राघव की समझदारी से दिव्या का साथ देना एक समर्थन और सहानुभूति भरा माहौल बना रहा था। राघव की सकारात्मक भूमिका से दोनों का संबंध मजबूत होने लगता है और दिव्या धीमे धीमे चेतनावस्था में आने लगती है। राघव बहुत ही संयत होकर दिव्या को ध्यान से बाहर लाता है।

मि. जॉन दिव्या को देख मुस्कुरा कर जा चुके थे। मिस्टर जॉन की मुस्कान देखकर लगता था कि दिव्या ने आज के सत्र को अनूठा महत्व दिया है। यहाँ तक कि लंबे सत्र के बावजूद दिव्या की आँखों में एक नई रौशनी थी, जो उसकी प्रसन्नता का प्रतीक बन रही थी। अन्य दिनों की तरह आज भी दिव्या को कुछ भी स्मरण नहीं था। लेकिन उसने राघव को बताया कि वो अपने मन से, अपने हृदय से बहुत ही हल्का महसूस कर रही है।

राघव दिव्या में आए सकारात्मक बदलाव को देखकर खुश थे। आज का सत्र अपने आप में लंबा था, लेकिन इसके बावजूद दिव्या आज प्रसन्न लग रही थी। अन्य दिनों की तरह, आज भी उसे किसी घटना या विषय का स्मरण नहीं था, लेकिन उसने राघव को बताया कि उसे अपने मन और हृदय में एक शांति और हल्कापन महसूस हो रहा है।

बेटा.. एक दो सेशन और लगे शायद। तभी सारी बातें स्पष्ट हो सकेंगी।

“ठीक है.. फिर मुझे भी अवगत कराएंगे ना।” दिव्या बच्चों की तरह मचलती हुई पूछती है।

“बिल्कुल.. अब तुम थोड़ी देर आराम करो। कुछ खाने की इच्छा हो तो खाकर सिर्फ आराम, और कुछ नहीं।” राघव आदेशात्मक स्वर में कहता है।

राघव दिव्या के सिर पर हाथ फेर कर कमरे से बाहर आ गया।

राघव के बाहर आते ही आनंद जो की बैठक में ही होता है, राघव के पास आता है और राघव को थका सा देखकर चंद्रिका से चाय और पकौड़े बनाने कहता है।

“मैं बनाती हूँ भाभी.. आप दिव्या के पास जाइए।” रिया चंद्रिका से कहती है।

“हाँ भाभी.. दिव्या कल की अपेक्षा बेटर फील कर रही है। फिर भी आप उसके साथ ही रहिए।” राघव के चेहरे पर ये बताते हुए खुशी छलक आई थी, जो दिखाता था कि वह दिव्या में आए सकारात्मक परिवर्तन से बहुत खुश है।

“चलो मैं पकौड़े बनाने में मदद कर देती हूँ।” आनंद की माँ रिया से कहती हैं।

“नहीं माँ.. मैं कर लूँगी… आप बैठिए।” रिया माँ को फिर से सोफ़े पर बिठाते हुए कहती है।

“अरे माते.. बना लेगी वो। अब खाने लायक होगा या नहीं, सो पता नहीं।” राघव मुस्कुराता हुआ रिया को चिढ़ा कर कहता है।

“चुप कर.. मेरी दोनों बहुएं तुम दोनों से अच्छी हैं। “आनंद की माँ राघव को प्यार से डपटते हुए कहती हैं।

“ये बताओ राघव.. आज बहुत समय लगा.. दिव्या ने कुछ और बताया।” आनंद विह्वल सा पूछता है। 

“हाँ, आज दिव्या से ज्यादा सवाल करने की जरूरत नहीं पड़ी। उसने खुद ही बहुत सी बातों पर से पर्दा उठाया।” राघव आनंद की ओर मुड़ता हुआ कहता है।

“मसलन”… आनंद प्रतिक्रिया स्वरूप पूछता है।

“भाभी को भी आने दे। फिर सारी बात बताता हूँ। वैसे आज के सेशन के बाद जब दिव्या ने कहा कि वो बहुत ही अच्छा महसूस कर रही है तो लगा हमलोग सही दिशा में बढ़ रहे हैं।” राघव इत्मीनान की साॅंस लेता हुआ कहता है।

“आज तो दिव्या बहुत खुश है। कल बिना कुछ बोले सो गई थी। आज बातें करते करते सोई है।” चंद्रिका कमरे से निकल कर बैठक में उन सभी के पास आती हुई कहती है।

“आती हूँ मैं किचन से। रिया की हेल्प करा दूँ।” कहती हुई चंद्रिका फिर वापस मुड़ गई।

थोड़ी देर में चाय पकौड़ों के साथ राघव रक्षंदा के देवदासी होने से लेकर दिव्या के द्वारा कही गई सारी बातें बताता है।

कोई कुछ नहीं बोलता है। एक गहन सन्नाटा सा कमरे में छा गया था। कोई कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन इस गहरे सन्नाटे में बड़ी बातें चल रही थीं, जो शब्दों के बिना मोहर छोड़ रही थीं। यह भावनाओं की भाषा थी, जैसे लोग एक-दूसरे की आत्मा को समझ रहे हों, बिना किसी शब्द के। इस चुप्पी को रिया तोड़ती हुई कहती है…”मतलब इसी के पीछे दिव्या की तकलीफ छुपी है।

“लगता तो ऐसा ही है। कल देखते हैं, दिव्या और क्या बताती है?” राघव दोनों हथेली आपस में रगड़ते हुए कहता है।

“जाने मेरी बेटी ने क्या क्या कष्ट सहे हैं। जो इस जन्म में भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है।” चंद्रिका विह्वल होकर कहती है।

“अब सब ठीक हो जाएगा चंदू। राघव हर सम्भव कोशिश कर रहा है।” आनन्द अपने बगल में बैठी चंद्रिका के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहता है।

“देवी माँ तुम्हें तुम्हारे काम में सफल करें बेटा।” आनंद की माँ राघव को आशीर्वचन कहती हैं।

आनंद की माँ के कथन पर सबके हाथ प्रार्थना में जुड़ गए थे।

“कल मिलते हैं फिर। सेशन का समय तो यही रहेगा। दिव्या से कहना.. सुबह की सैर के लिए तैयार रहे।” राघव तफ्सील से आनंद से कहता है।

दूसरे दिन सुबह की सैर पर राघव और दिव्या निकलते हैं।

“रात नींद कैसी आई थी बेटा?” राघव दिव्या के साथ साथ चलता हुआ पूछता है।

“बहुत अच्छी… मैं हर रात सपने में डर जाती थी और चिल्लाने लगती थी। लेकिन रात ऐसा नहीं हुआ। माँ भी आश्चर्य कर रही थी।” दिव्या राघव की ओर चेहरा कर पीछे की ओर चलती हुई कहती है।

“ये तो काफी अच्छी बात है। इनफैक्ट ये हमारे उपचार का सकारात्मक पहलू है।” राघव बच्चों की तरह ताली बजा कर कहता है 

“मुझे तो कल की हुई कोई बात याद नहीं है।” दिव्या पूछने के अंदाज में कहती है।

“कोई बात नहीं… जब पूरी तरह से तुम्हें आराम हो जाएगा तो सारी बातें रिकॉर्ड होंगी। तुम सुन लेना। तुम्हारे मन में जो भी प्रश्न आए, वो भी बिना हिचक पूछना। ये भी हमारी थेरेपी का ही हिस्सा होगा।” पीछे की ओर चलती दिव्या के गाल थपथपाता हुआ राघव कहता है।

दिव्या को उसके घर पहुॅंचा कर और तैयार रहने कह राघव अपने घर चला गया।

आज मि जॉन बिना लाग लपेट कर प्रियंवदा नाम से ही शुरुआत करने कहते हैं।

“तो प्रियंवदा अंतःपुर से तुम और तुम्हारी माँ अपने निवास स्थान आ जाती हो। आगे क्या होता है?” राघव थेरेपी प्रारंभ करता हुआ पूछता है।

दिव्या एक क्षण के लिए चुप रहती है। राघव को लगता है, प्रियंवदा नाम शुरूआत में ले लेना शायद गलती हो गई। अभी वो सोच ही रहा था कि दिव्या ने बोलना शुरू कर दिया… 

“मैं.. माँ की बातों से पूरे मार्ग अनमनी सी रही। माँ भी चुप चुप सी थी।” प्रियंवदा बोलती हुई अनमनी हो उठी।

जैसे ही हम लोग अपने घर पहुॅंचे, मैंने माँ के समक्ष सवालों की झड़ी लगा दी। क्यूँकि अंतःपुर से निकल कर माँ ने जो कुछ भी कहा, मैं समझ नहीं सकी थी। अब मैं सम्पूर्ण बातों से अवगत होना चाहती थी।

पहले तो माँ ने मुझे झिड़क दिया। लेकिन मौसियों के कहने पर कब तक इसे अँधेरे में रखोगी, आज ना कल तुम्हारी जगह इसे ही लेना है। उनकी बातों से माँ चीख पड़ी… “नहीं ऐसा नहीं होगा.. मेरी बेटी अपना जीवन अपनी मर्जी से जिएगी।”

कल्पना मौसी.. जो की हमेशा शांत शांत रहती हैं अर्थात् बिल्कुल बैरागी की तरह रहती हैं… उन्होंने इतना ही कहा “रक्षंदा झूठे सपने ना देख.. ना इसे दिखा… जो सच है स्वीकार करके प्रियंवदा को भी बता दे।”

माँ एक गहरी साँस और आँखों में आँसू लिए मेरा हाथ पकड़ बिछावन पर बिठाती है। ऐसा लग रहा है जैसे उनकी सारी भूमिकाएँ उस एक साँस में समाहित हो रही हों। उसकी आँखों में आँसू बह रहे हैं, उसे देख लग रहा है जैसे ये मुझे अलग सफर पर ले जाने वाले हैं माँ की साँसें और आँसू मुझे डरा रही हैं।

माँ की बातें सुनकर मैं अचंभित हूँ। क्या लड़कियाँ कोई वस्तु हैं? उन्हें भी भगवान ने हाड़ मांस का ही तो बनाया है। फिर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उन्हें इस तरह दलदल में धकेलना क्या उचित है? ख़ासकर धर्म से जुड़े लोगों को इस पर आवाज उठानी चाहिए तो वो भी राजा के साथ मिल जाते हैं।

माँ ने बताया कि देवदासी की बेटी ही इस प्रथा के लिए चुनी जाए.. ऐसा भी नहीं होता है। राज्य की सबसे सुन्दर कन्या खोजी जाती है और माँ के अनुसार बदकिस्मती से इस बार उनकी अपनी ही बेटी का चुनाव इसके लिए हुआ है।

        माँ के कथनानुसार कभी कभी माता पिता अपने किसी काम के पूर्ण होने के एवज में मन्नत माँगते हैं कि कार्य सम्पन्न होने पर बेटी को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देवदासी बनने दे देते हैं। कैसी विडंबना है अपनी ही बेटी के साथ ऐसा अन्याय…

माँ की बातें मेरी अंतरात्मा को झकझोर रही हैं, जैसे कि वह मेरे आत्मा की गहराइयों में प्रवेश कर रही हो। उनके वचन से एक अद्वितीय संवाद बढ़ रहा है, जो मेरी भावनाओं की सर्वांगीणता को छू रहा है। माँ की बातों से नए समझदारी के दरवाजे खुल रहे हैं, जिनसे मैंने पहले कभी सोचा भी नहीं था।यह एक अल्हड़ और प्रियंवदा अचानक ही बड़ी हो रही है, जैसे कि माँ के शब्दों ने मेरी आत्मा को नए और सार्थक दृष्टिकोणों से भर दिया है। इस सच्चाई से अभी तक की अल्हड़ प्रियंवदा अचानक ही बड़ी हो गई है।

अभी से ही मैंने प्रण ले लिया कि यहाँ रहने वाली और राज्य की तमाम लड़कियों को जागरूक करुँगी, जिससे ये कुरीति रोकी जा सकी। हमें भी उचित सम्मान मिले।

माँ अब रो रही हैं और कल्पना मौसी अश्रु सिक्त आँखों के साथ माँ को चुप करा रही हैं।

मैं बिना कुछ बोले अपने कमरे में आ गई। पीछे से कल्पना मौसी मेरे लिए खाना लेकर आ गई। खाना देखते ही मुझे भूख का एहसास हुआ। मैंने थाली उनके हाथ से ले लिया और पूछा” माँ का खाना”… 

“तू खा कर सो जाना.. रक्षंदा को मैं खिला दूँगी।” कल्पना मौसी कहती हैं।

मैं निश्चित होकर खाने लगी। जब तक मैं खाती रही, तब तक कल्पना मौसी मेरे पास ही बैठी रही। अब वो थाल लेकर चली गई।

         मैं सोच रही हूॅं.. इस अभियान में किसे किसे शामिल करुँ। मैंने दृढ़ प्रतिज्ञा ले ली थी कि हर हाल में मुझे ये करना है‌ चाहे अकेले ही क्यूँ ना करनी पड़े.. सोचते सोचते ही मेरी आँखों में नींद के बादल घुमड़ने लगे और मैं सो गई।

“खिड़की से आती दिनकर की लालिमा मेरे गालों को सहलाती मुझे जगा रही है और मैं अपने चेहरे को दूसरी ओर घूमा कर फिर से निंदिया के आगोश में जाने लगी हूॅं। ओह कल्पना मौसी दरवाजा जोर जोर से बजा रही हैं, जो काम बेचारा दिनकर नहीं कर सका, वो कल्पना मौसी के हाथों से संपन्न हुआ। यानि की अब मैं बिना मन के जग गई हूॅं और दिनचर्या की ओर प्रस्थान कर रही हूं।” प्रियंवदा मुॅंह बनाती हुई कहती है।

सुबह हमारी दिनचर्या में गुरुजी का आना.. नृत्य के अभ्यास के साथ पूजा के विधि विधान की जानकारी लेना.. गुरुकुल जाना शामिल था… सब कुछ होते होते मध्याह्न हो गया, तब अब जाकर मुझे अपनी सहेलियों से बातें करने का पर्याप्त समय मिलता है।

मैंने सबसे पहले अपनी पक्की सहेलियों रावी और रम्या से माँ की बातें और अपनी प्रतिज्ञा के बारे में बताया।

“राजा जी को भनक भी लग गई तो जानती भी है कि क्या होगा”..रावी चेतावनी देती हुई कहती है।

“ये सिर्फ हमारी बात नहीं है। राज्य की अन्य लड़कियों की भी बात है।” मैंने उन्हें चेताया है।

“लेकिन उन लड़कियों से हम मिलेंगे कैसे?” रम्या पूछती है 

“गुरुकुल में।” मैं कहती हूॅं।

“गुरुकुल में.. कैसे?? उन्हें हम से बात करने की आज्ञा नहीं है।” रम्या मुझे याद दिला रही है।

“तुम दोनों को डर लग रहा है तो कोई बात नहीं। मैं अकेली ही बिगुल बजा लूँगी। बस तुम दोनों इन बातों को किसी के कानों तक पहुॅंचने नहीं देना।” प्रियंवदा अपनी दोनों सहेलियों से कहती है।

रावी और रम्या “किसी को नहीं बताएंगी” कहकर चली गई। इस अभियान में मैं अकेली ही हूँ।

सबसे कठिन है सबके मन से राजा का डर निकालना। गुरुकुल की गृहस्थ परिवार की लड़कियाँ भी मुझे मुख्य देवदासी की बेटी और भावी देवदासी जानकर हिकारत भरी नजर से देखती हैं। इस कारण बात करना और भी कठिन हो गया है, फिर भी मैं अपने अभियान में लगी हूँ, चाहे कोई कितनी भी बेइज्जती करें और मज़ाक बनाएं। अब तो मुझे रावी और रम्या का साथ भी मिलने लगा है।

साल भर होने को आए… मैं बहुत ज्यादा नहीं.. फिर भी कुछ लड़कियों को बताने.. समझाने में सफल हो गई हूॅं। सब कुछ बहुत चुपके चुपके कर रही थी हमलोग।

लेकिन किसी ने मेरे इस क्रियाकलाप की जानकारी माँ तक पहुँचा ही दिया। माँ के सामने आज मेरी पेशी है।

“प्रियंवदा मैं ये क्या सुन रही हूँ?” माँ पूछ रही हैं।

“क्या माँ?”… प्रियंवदा पूछती है।

“तू लड़कियों को बहका रही हो।” माँ गहरी नजर से मुझे घूरती हुई कह रही हैं।

“नहीं माँ.. बहका नहीं रही हूँ। ये बता रही हूँ कि हम भी इंसान हैं। हमारे साथ अन्याय करने का किसी को अधिकार नहीं है। चाहे वो राजा ही क्यूँ ना हो!” प्रियंवदा रोष में कहती है।

“एक बात सुन ले जो चीज़ हमारे वश में नहीं है, वो करना ही बहकना होता है। आज से ये सब बंद कर या तेरा गुरुकुल जाना बंद। अगर राजा जी के कान में ये बात गई तो जानती है तेरी सजा क्या होगी? तेरी सजा होगी अभी ही तुझे देवदासी बना देना। क्यूँ अभी से इसमें फँसना चाहती है… कुछ बोलेगी।” रक्षंदा की अदालत में प्रियंवदा सिर झुकाए खड़ी थी।

“मैं इसे बंद नहीं करुँगी। इस प्रथा के नाम पर जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है। हम अपनी इच्छानुसार अपने ढंग से अपने भगवान की पूजा करेंगे।” प्रियंवदा अपनी पेशी में कहती है।

“बस… बहुत हो गया.. तेरा गुरुकुल जाना बंद।” रक्षंदा क्रोध में प्रियंवदा की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई 

और बुदबुदाते हुए प्रार्थना करती है… “राजाजी तक बात ना पहुँची हो।” 

अगला भाग 

दिव्या(भाग–10) – आरती झा आद्या : Moral stories in hindi

दिव्या(भाग–8) – आरती झा आद्या : Moral stories in hindi

आरती झा आद्या

दिल्ली

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