देवर जी, ना का मतलब ना होता है… – चेतना अग्रवाल

तुम्हें यह बात क्यों समझ नहीं आती नीरज…., तुम्हें  अपना अच्छा दोस्त समझती थी, लेकिन आज के बाद देवर-भाभी से ज्यादा मेरा-तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है… कहकर माधवी कमरे से बाहर आ गई।

ये हैं माधवी और नीरज….. दोनों के बीच देवर-भाभी का रिश्ता है। जब से माधवी की शादी राजन से हुई है, नीरज उसके आस-पास रहने की कोशिश करता।

जब भी माधवी उससे पलट कर पूछती, वह हँसकर टाल जाता, कभी पढ़ने के बहाने तो कभी कुछ पूछने के बहाने वह बिना पूछे उसके कमरे में आ जाता। माधवी ने कई बार मना किया, तब भी वह नहीं माना।  फिर माधवी ने अंदर से  कमरा लॉक करना शुरू कर दिया।

एक दिन माधवी जब उसे खाना परोस रही थी तो नीरज ने उसे अपने पास ही बैठा लिया और बोला, “भाभी, मैं आपको बहुत पसंद करता हूँ, मुझे आपके साथ बातें करना और खेलना बहुत अच्छा लगता है, आप मेरे साथ बैठा करो ना….”

“नीरज, अपनी भाभी से बात करने का यह कौन सा तरीका है, भाभी माँ समान होती है, क्या तुम मम्मी जी के साथ भी ऐसे ही बातें करते हो…?

“माँ समान होती है, माँ तो नहीं होती ना, इसमें शर्म की क्या बात है…. देवर हूँ आपका, इतनी मजाक तो चलती है ना माधवी जी….”




“तुम्हें एक बार में समझ नहीं आता क्या, क्या लगती हूँ मैं तुम्हें, अब तुम मेरा नाम भी लेने लगे। मजाक भी हद में होती है…. अब तुम अपनी हद पार कर रहे हो…. अपनी हद में रहो, देवर जी…”

माधवी की बात सुनकर नीरज बेशर्मी से हँसा और उसने माधवी का हाथ पकड़ लिया… उसे पता था कि आज घर पर कोई नहीं है…

नीरज की इस हरकत पर माधवी को गुस्सा आ गया, उसने एक जोर का तमाचा नीरज के गाल पर मारा…”क्या तुम्हें मेरी इतनी सी बात समझ नहीं आती कि मेरी ना का मतलब सिर्फ और सिर्फ ना है, अगर तुम मेरे देवर हो तो इसका मतलब यह नहीं कि जो तुम कहोगे, मैं सब मिलती रहूँगी…..

तुम्हारी इस गंदी हरकत के लिए घर में भी कोई तुम्हारा पक्ष नहीं लेगा और अगर लेगा तो भोग मेरा जवाब ना हो है… निकल जाओ यहाँ से, ये मत सोचना कि मैं घर पर अकेली हूँ तो तुम मेरे साथ जबरदस्ती कर सकते हो, एक औरत अपनी रक्षा करना जानती है….”

तभी कमरे में माधवी की सास कविता जी आई और उन्होंने नीरज को एक तमाचा मारा….

“माँ, देख लो, भाभी ने मुझे मारा….”

“मैंने सब सुन लिया है नालायक…. आज तूने मेरी परवरिश पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है… मेरी परवरिश ऐसी तो नहीं थी, तू एक औरत का सम्मान करना नहीं जानता फिर यह तो तेरी भाभी है… दफा हो जा यहाँ से … माधवी तो तेरी भाभी है अगर तू अपनी पत्नी के साथ भी ऐसी ही जबरदस्ती करने की कोशिश करेगा, तब भी मैं तेरे खिलाफ ही रहूँगी।

औरत का सम्मान करना सीख, तभी तुझे सम्मान मिलेगा।  ये बात हमेशा याद रखना कि औरत हो या आदमी, सबकी ना का मतलब ना ही होता है,  अगर कोई तुम्हारी बात का विरोध नहीं कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसमें उसकी हाँ छिपी है…

कविता जी के मुँह से यह सब सुनकर माधवी ने आँखों ही आँखों में उन्हें धन्यवाद दिया। “मैं भी एक औरत हूँ, और एक औरत की मनःस्थिति को अच्छी तरह समझती हूँ, तुझे बहू बनाकर लाई हूँ इस घर में…. अब बेटी है मेरी… तूने बिल्कुल सही किया, ऐसे शैतानों को ऐसे ही सबक सिखाया जाता है….” कविता जी ने माधवी को गले लगा लिया।




अपनी माँ की डाँट सुनकर नीरज जैसे होश में आया, “माँ,उसे माफ कर दो, मेरे सभी दोस्त कहते थे कि भाभी तो अपनी होती है, जैसा कहो वैसा करती है, इसलिए मैं बहक गया था…. अब से मैं ध्यान रखूँगा कि ना का मतलब सिर्फ ना होता है…..

सखियों, अधिकतर घरों में जब घर की पहली बहू आती है तो लड़के के छोटे सगे-चचेरे भाई उसे अपनी प्रोपर्टी समझने लगते हैं। उन्हें लगते है कि वो घर की बहू है तो वह उनकी कही हर बात मानेगी और यह उसका फर्ज है। अगर सास कविता जी के जैसी हो तो बहू को घर में कोई दिक्कत नहीं होती,  वरना तो बहू का घर में रहना मुश्किल हो जाता है।

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#विरोध 

धन्यवाद

चेतना अग्रवाल

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