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दर्द -सुलाना खातून 

मैंने अपनी जिंदगी के 28 साल पूरे कर लिए लिए हैं, और दो बेटियों की मां हूं, मेरी दूसरी बेटी 9 महीने की है बीमार है मौत उसके सिरहाने खड़ी है पर मेरी बच्ची नहीं जानती, मौत क्या है? मेरी बेटी कड़वी से कड़वी दवा पीने के लिए मुंह खोल देती है, ऑक्सिजन पाइप की तरफ़ मुंह ले जाती है, उसे जीना है शायद, पर वह नहीं जानती, ज़िंदगी क्या है? वह नीली पड़ जाती है, सांस ले नहीं पाती, तड़पती है, खांसते खांसते सुस्त पड़ जाती है, आंखे आंसुओं से भर जाती है उसकी, मेरी तरफ़ देखती है, एड़ियां रगड़ती है, पर मेरी बच्ची नहीं जानती, दर्द क्या है?

मैं तो जानती हूं,जिंदगी क्या है? मौत क्या है? पर अब के बाद दर्द की परिभाषा बदल जाए मेरे लिए, क्योंकि अब… मैं जानती दर्द क्या है? क्योंकि दर्द की परिभाषा जो मैं जानती हूं वह इन सबसे अलग है…. मुझे हॉस्पिटल में देख, मेरी मां कहती है, कैसे सह ले रही हो यह सब..? तो मेरे अब्बा मेरी मां को डांटते हुए मुझसे कहते हैं, मेरी बेटी बहादुर है, सब कर लेगी… उन दोनों के आंखों में दर्द के ही जैसा कुछ एहसास नज़र आता है…! पति के तरफ़ देखती हूं… मैं थकने लगती हूं कभी–कभी पर वह नहीं थकते, पिता हैं ना?

थकते होंगे बताते नहीं… बेटी को हाथों पर रखते हैं…जैसे बस आज भर ही हो…मेरी दोस्त कहती हैं, खुशकिस्मत हैं तुम्हारी बेटियां जो ऐसा पिता मिला..! मैं इस पिता के दिल में भी दर्द से जुड़ा हुआ कुछ आहट सुनती हूं…! पर सच में अब मैं नहीं जानती दर्द क्या है? मैं बड़े बड़े हॉस्पिटल्स में जाती हूं, हर एक चेहरे पर दर्द की एक अलग कहानी लिखी होती है, मुझे लगता है, सारे दर्द यहीं अस्पतालों में सिमट आया हो, लगता ही नहीं कहीं खुशी नाम की कोई चीज़ भी होती होगी… मेरे सामने वाले बेड पर एक 10 साल का लड़का लेटा है, अभी कोमा में चला गया, मां एक टक उसे देख रही है, उसके हिलती उंगलियों को देखते हुए, उसके फेबरेट ग्रीन कार दिलाने का वादा कर रही है, वो पूर उम्मीद है, उसके बेजान शरीर को घर ले जाने के वक्त भी किसी अनहोनी का इंतजार था उसे… कोमा में जाने से पहले तड़पते बच्चे के चेहरे पर, उस मां के चेहरे पर, दोनों चेहरे पर दर्द से मिलते जुलते ही भाव हैं… फिर भी मुझे नहीं पता चल रहा दर्द क्या है…




फिर मैंने गूगल किया…. गूगल कहता है…. दर्द स्नायु तंत्र में वह सामान्य संवेदना है…. जिसकी शुरुआत किसी भी संभावित चोट से शुरू होती है…. मैं पूछना चाहती हूं… दर्द सिर्फ शरीर के ऊतकों की क्षति है…पर किससे पूछूं? एक मां से, जो बच्चे को जन्म देते समय अपने शरीर के ऊतकों का सबसे बड़ा नुकसान सहती हैं… मैं भी तो मां हूं, जिसके मन में… अपनी पहली बच्ची के जन्म लेते ही प्रसव पीड़ा से भी बड़े नुकसान का अनुभव हुआ…. कि मेरी बच्ची भी एक रोज इसी पीड़ा से गुजरेगी, बेटा होता तो इस पीड़ा से न गुजरना पड़ता..? मुझे अपने नुकसान से ज्यादा पर बच्चे के नुकसान का ख्याल था… क्या यह दर्द है… या फिर उस बूढ़े बाप से पुछूं… जिसने अपने झुके कंधे पर अपनी जवान औलाद की लाश उठाई हो… या फिर दर्द के बारे में उस भाई से पूछूं, जिसकी बहन उसकी गैरत को कदमों तले रह गई… या फिर उस यतीम बच्चे से पूछूं.. जो जरूरतों के लिए तरसते हैं… जिस से भी पूछूंगी वह दर्द का एक अलग परिभाषा बताएगा…. पर मैं तुझसे पूछती हूं जिंदगी, दर्द क्या है? ऐ ज़िंदगी आ बैठ मेरे पास थोड़ी देर और बता दर्द क्या है? क्या वो जो जिम्मेदारियों के बोझ, तले दबी बचपन सहती है या वो जो हवस की जीत पर, मरती मासूमियत सहती है या वो जो समाज के नाइंसाफी पर, गरिबों की भूख सहती है या वो जो अपनों की मौत पर, जिंदा रहने वालों की रूह सहती है जिंदगी ने कहा… दर्द है हकीकत से आशना होना मैंने कहा… और हकीकत क्या है? ज़िंदगी ने कहा… हकीकत मौत है…! या वह मासूमियत की मौत हो एहसास की मौत हो जज्बों की मौत हो इंसानियत की मौत हो या फिर इंसान की मौत हो दर्द वह नहीं… जहां जिंदगी जन्म ले दर्द तो वह है जहां ममता की मौत हो…

स्वरचित –सुल्ताना खातून दोस्तों ये मेरी डायरी से दर्द की परिभाषा, आपके दिलों में दर्द उतर जाए तो जरूर लाइक कमेंट करें धन्यवाद

# दर्द

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