बरगद – डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : आज विनय जी के छोटे भाई अनिल का फोन आया था। अनिल की बिटिया रिया का रिश्ता तय हो गया था। लड़का रिया के साथ ही पढ़ता था। लड़का लड़की एक दूसरे को पहले से जानते थे। लड़के की जात बिरादरी भी अलग थी। विनय जी के परिवार में आज तक कोई भी शादी अपनी जाति से बाहर नहीं हुई थी।

जब विनय जी ने कुछ कहना चाहा तो अनिल ने एकदम से ये कहकर कि भैया ज़माना बदल रहा है वैसे भी रिया डॉक्टर बनने जा रही है और लड़का भी डॉक्टर है तो ज़िंदगी तो उन लोगों को एक साथ बितानी है कहकर चुप करा दिया। आज विनय जी को बहुत कुछ याद आ गया। आज उनके कानों में अपनी बेटी अमृता की सिसकियां बार-बार गूंज रही थी। 

विनय जी के दो बच्चे हैं,बेटी अमृता और एक बेटा अमन अमृता बड़ी है।अमृता काफी समझदार और पढ़ाई लिखाई में होशियार थी।उसने अपने भविष्य के लिए बहुत सारे सपने देख रखे थे। वो अक्सर पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी का सपना देखती थी उसके लिए वो पूरी मेहनत से भी जुटी हुई थी। सपनें तो अमृता के बहुत बड़े थे पर विनय जी का परिवार बहुत रूढ़ीवादी था।

अमृता को घर सिर्फ कॉलेज जाने की ही अनुमति थी। उसे सख्त हिदायत थी कि वो कॉलेज में किसी लड़के से भी मेलजोल नहीं बढ़ाएगी।अमृता भी इन सब बातों को ध्यान में रखती थी और काफ़ी सर्तक रहती थी।एक दिन अमृता के साथ पढ़ने वाला राघव जो उसके घर के पास ही रहता था वो उससे किसी विषय के नोट्स लेने आ गया। अमृता ने किसी तरह उसको बाहर से ही नोट्स पकड़ा दिए। बात आई गई हो गई।

उसके बाद वो जब नोट्स की कॉपी वापिस करने आया तब उसमें से एक पत्र नीचे गिर गया जो उसने अमृता के लिए लिखा था वो अमृता के चाचा के हाथ लग गया,बस फिर क्या था घर पर तो जैसे हंगामा ही मच गया। एक सुर में सभी लोग जिसमें अमृता के दादाजी से लेकर विनय जी के छोटे भाई अनिल भी शामिल थे ने अमृता की पढ़ाई-लिखाई छुड़वाकर शादी का फरमान सुना दिया। उनका कहना था कि आज एक गैर लड़का जो कि अपनी जाति का भी नहीं है उसकी इतनी हिम्मत हो गई कि वो अमृता से मिलने घर तक चला आया।उनका मानना था कि उसको बढ़ावा देने में अमृता का भी हाथ होगा,ऐसा ही रहा तो परिवार की इज्ज़त पर बट्टा लगते देर नहीं लगेगी।

अमृता से छोटी घर में और भी लड़कियां हैं वो भी फिर गलत ही सीखेंगी।अमृता की इसमें कोई गलती नहीं थी।अमृता ने सबको बहुत समझाने की कोशिश की पर उसकी एक ना सुनी गई। अमृता ने अपने पिताजी विनय जी के सामने भी अपनी बात रखने की बहुत कोशिश की पर विनय जी अपने परिवार के विरुद्ध जाकर उसका साथ देने से मना कर दिया।

ऐसे में सिर्फ अमृता की मां ही थी जो कर तो कुछ नहीं सकती थी पर अपनी बेटी का दुःख समझ रही थी। उन्होंने अमृता को सांत्वना देते हुए कहा कि वो उसकी शादी तो नहीं रोक सकती पर वो हो सकता है कि उसका ससुराल इतना रुढ़ीवादी ना हो और उसको आगे पढ़ने दे। बस इस तरह आनन-फानन में अमृता की शादी उसके दादाजी के दोस्त के पोते अभिनव से तय कर दी गई। दरअसल उन लोगों ने और अभिनव ने अमृता को देख रखा था इसलिए वहां से तुरंत हां हो गई।

अभिनव के माता-पिता नहीं थे पर दादा-दादी,चाचा-चाची, ताऊ-ताई का बड़ा परिवार था जिनके बीच वो पला-बढ़ा था। अमृता शादी के लिए तैयार नहीं थी।उसके सपनें परिवार की झूठी शान के नाम पर बलि चढ़ गए थे। विदाई के समय भी उसकी आंखों में आंसू ना होकर कुछ अनकही शिकायतें थी जिन्हें देखकर विनय जी के दिल पर भी चोट पहुंची थी। उसके बाद अपने परिवार और खासकर विनय जी के प्रति उत्पन्न शिकायत को उसने दिल में ही दबा लिया था और धीरे धीरे मायके आना ही कम कर दिया था। 

उधर ससुराल का माहौल भी ऐसा ही था पर अमृता अभिनव के सभी परिवार वालों का बहुत ख्याल रखती थी। अभिनव की दादी जो डायबिटीज और लकवाग्रस्त होकर बिस्तर पर थी अमृता उनका खास ख्याल रखती। जहां वो बिल्कुल अकेली पड़ी रहती थी अब अमृता के आने पर उनको भी साथ मिल गया था। उसकी देखरेख में उनकी हालत सुधर रही थी।

वो थोड़ा बहुत शब्द ठीक बोलने लगी थी,थोड़ा उठने बैठने की कोशिश भी करने लगी थी। जहां घर की अन्य बहुएं अपनी ही दुनिया में मगन रहती वहां अमृता उनकी सेवा में लगी रहती। उनके लिए कामवाली होने के बाद भी नहलाने से लेकर अन्य काम अमृता करती। उनकी हालत में सुधार देखकर जो डॉक्टर उनका चेकअप करने आते थे उन्होंने भी अमृता की बहुत प्रसंशा की।

दादाजी का तो जैसे अमृता ने दिल जीत लिया। अभिनव भी अमृता जैसी पत्नी पाकर खुश था।दादाजी ने अमृता से कुछ मांगने के लिए कहा था।तब अमृता ने अपनी रुकी हुई पढ़ाई को पूरा करने की बात कही। बाकी परिवार के लोगों और दूसरी बहुओं को लग रहा था कि इस तरह की मांग तो दादाजी बिल्कुल नहीं मानेंगे उल्टा अमृता को ही सुना देंगे। साथ-साथ वो मन ही मन खुश भी थे कि जितनी जल्दी अमृता ने दादाजी और दादीजी के मन में जगह बनाई है उतनी जल्दी वो उनके मन से उतर भी जायेगी।

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ दादाजी ने उसकी बात भी मान ली और साथ-साथ उसको घर से ही व्यापार के हिसाब किताब का काम देखने के लिए भी अनुमति दे दी। वो दिन और आज का दिन है कि अमृता ने पढ़ाई तो पूरी की ही और साथ साथ ससुराल के व्यापार को भी नए आयाम पर पहुंचा दिया। आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी वो उदाहरण बनकर उभरी। 

अमृता ने अपने हिस्से की लड़ाई को अपने तरीके से लड़कर अपनी नई राहें चुन ली थी पर आज भी उसने अपने मायके खासकर विनय जी के प्रति उपजी मूक शिकायत को समाप्त नहीं किया था। मां के बहुत बार बुलाने पर भी वो केवल किसी शादी त्यौहार पर ही जाती। आज छोटे भाई अनिल का अपनी बेटी के निर्णय में इस तरह साथ देने पर विनय जी को उस समय बेटी अमृता का साथ ना देने की अपनी सोच पर आत्मग्लानि हो रही थी।

उन्हें आज अनुभव हो रहा था कि पिता तो बच्चों के लिए बरगद के समान होता है पर उन्होंने तो अपनी बेटी का साथ ना देकर हमेशा के लिए उसे अपनी छांव से वंचित कर दिया था। उन्हें एहसास हो रहा था कि ये जरूरी नहीं कि हमेशा बच्चे ही गलत हों कई बार माता-पिता भी गलत हो सकते हैं। वो तो अमृता समझदार थी इसलिए उसने कोई गलत कदम नहीं उठाया नहीं तो ज़िंदगी की जंग में समाज से घबराकर आत्महत्या करने वाले अधिकतर बच्चे वो होते हैं जिनके अपने माता-पिता भी उनका साथ नहीं देते। विनय जी ने सोच लिया था कि वो अब किसी तरह अमृता और अपने बीच का अबोलापन समाप्त करके रहेंगे।बस ऐसा सोचते हुए वो यादों की दुनिया से वापिस आ गए।

जल्दी ही वो घड़ी भी आ गई।रिया की शादी में अमृता भी आई थी।सारे परिवार के लोग भी थे।अमृता चुपचाप एक तरफ बैठी थी। इतने में माइक पर विनय जी की आवाज़ आती है और वो कहते हैं कि आज रिया की शादी है,उसको ज़िंदगी की सारी खुशियां मिलें।साथ-साथ मैं ये भी चाहता हूं कि मेरी प्यारी बेटी अमृता जो बरसों पूर्व मेरे पास होते हुए भी मुझसे दूर हो गई थी वो अपनी सब शिकायत भुलाकर मुझे माफ़ कर दे क्योंकि पता नहीं मेरी ज़िंदगी के अब कितने दिन बचे हैं।

वैसे भी मुझे अपनी गलती का एहसास है,एक पिता होने के नाते मेरे को अमृता पर भरोसा करना चाहिए था और उसके साथ देना चाहिए था जो मैं नहीं कर पाया। पिता की ऐसी बातें सुनकर अमृता के मन में बरसों से जमी पुरानी बर्फ पिघलने लगी वो उठकर गई और सब शिकवे-शिकायत भूलकर विनय जी के गले लग गई। सारे नाती-रिश्तेदार बाप बेटी का मधुर मिलन देख रहे थे।

रिया भी इस खुशी के मौके पर चुप नहीं रही उसने चुटकी लेते हुए कहा कि वाह दीदी शादी तो मेरी थी आज भी सारी लाइमलाइट आप ही लूट कर ले गई। ये बात सुनते ही सबके चेहरे पर हंसी आ गई। अमृता ने कहा कि मैं तो बस इतना चाहती हूं कि ज़िंदगी भर चार लोगों की परवाह छोड़कर हम अपने और अपने बच्चों के सपने पूरे करने की तरफ ध्यान दें। वैसे तो सबको अपने हिस्से की लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है पर माता-पिता का साथ बरगद की छांव जैसा होता है जो उनको मानसिक मजबूती देता है।सब उसकी बात से सहमत थे।आज विनय जी को अपनी बेटी वापिस मिल गई थी।

दोस्तों कैसी लगी मेरी कहानी?अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। शिकवे-शिकायत तो ज़िंदगी भर चलते हैं पर माता पिता को समाज की परवाह ना करके अपने बच्चों पर भरोसा करके उनके सपनेंं पूरा करने में उनका साथ देने की कोशिश करनी चाहिए।

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

#शिकायत#

2 thoughts on “बरगद – डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral Stories in Hindi”

  1. Bahut sundar rachna
    Maata pita ko to apne bacchon ki baat par dhyan dena hee chahiye yeh unki zimmedaari hai….Jaise apeksha ki jaati hai ki bacche maata pita ki baat sune waise hee maata pita ko bhi bacchon ki baat sun-ni hee chahiye

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद मानसी जी आपकी सुंदर सी प्रतिक्रिया के लिए…बहुत ही अच्छी बात कही आपने🙏🙏

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