अति सर्वत्र वर्जयेत् (भाग 3)- डा.पारुल अग्रवाल: Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : उन्होनें ने भी फोन पर चित्रा की कोई बात सुने बिना भाई भाभी की बात मानने की सलाह दी। चित्रा बहुत अकेली पड़ गई थी। वो पूरी रात सोई नहीं थी। अगले दिन सुबह वो पास के एक मंदिर में गई,जहां वो अक्सर जाती थी। वहां उसके भजन और शुद्ध हिंदी की वजह से उसको बहुत लोग जानते थे।

मंदिर प्रतिदिन आने वाली सुमित्रा जी को तो उससे बहुत ही लगाव हो गया था। उस दिन मंदिर में जब चित्रा ने भजन नहीं गाया तभी सुमित्रा जी समझ गई थी कि कोई बात अवश्य हुई है। पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने चित्रा को अपने पास बैठाया और उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए उसकी उदासी का कारण पूछा। आज चित्रा को उनमें अपनी मां दिखाई दी,वो अपने जज्बातों पर नियंत्रण नहीं रख पाई। उसने उनको सब कह सुनाया।

सुमित्रा जी चित्रा का सारा दुख समझ रही थी। उन्होनें उसको बोला कि सिर्फ पंद्रह-बीस दिन का समय किसी तरह काट ले, वो उसको भारत भेजने का किसी तरह इंतज़ाम करती हैं।  चित्रा से उसके माता-पिता का फोन नंबर लिया। घर आकर अपने बेटे नीलेश की मदद से उन्होंने चित्रा के माता-पिता को भारतीय समय के अनुसार फोन मिलाया।

उनको सुमित्रा जी ने सारी वास्तुस्थिति से अवगत कराया। पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ पर सुमित्रा जी ने अपने नंबर से चित्रा की बात उनसे करवाने का आश्वासन दिया। अगले दिन मंदिर में मिलने पर सुमित्रा जी ने चित्रा की बात उसके माता-पिता से करवा दी। माता पिता की आवाज़ सुनते ही चित्रा फूटफूट कर रोने लगी।

उसने अपने साथ हुए सारे बर्ताव को उनको कह सुनाया। उसने अपने माता-पिता से कहा कि वो अब भाई भाभी के साथ नहीं रह सकती उसे अपने देश और अपने घर वापिस आना है। यहां तो वो घुटघुट कर मर जायेगी। चित्रा के माता-पिता ने सुमित्रा जी को दिल से धन्यवाद दिया और उनसे अनुरोध किया कि किसी तरह बेटी को सुरक्षित भारत पहुंचा दें।

जो भी खर्चा आएगा वो एनआरआई अकाउंट के द्वारा सुमित्रा जी तक पहुंचा देंगे। सुमित्रा जी ने उनको सांत्वना देते हुए कहा कि वो चित्रा की तरफ से निश्चिंत रहें जल्द ही वो उनके साथ होगी। साथ-साथ सुमित्रा जी ने मनोहर जी और सरिता जी से ये भी कहा कि उन लोगों के बीच जो भी बात हुई है उसका जरा भी पता चिराग और रिया को नहीं होना चाहिए नहीं तो चित्रा के लिए समस्या हो जायेगी। सुमित्रा जी और नीलेश के अथक प्रयास से चित्रा के भारत वापसी का इंतज़ाम हो गया।

जाने वाले दिन चित्रा सुबह-सुबह जब चिराग और रिया गहरी नींद में थे चुपचाप उनके घर से निकल ली। उस दिन छुट्टी थी जब उन लोगों का छोटा बच्चा भूख से रोने लगा तब रिया ने गुस्से से चिल्लाकर चित्रा को आवाज़ दी क्योंकि बेड टी से लेकर मुन्ने के दूध बनाना भी उसी के ज़िम्मे था। जब बहुत आवाज़ देने पर चित्रा नहीं आई तब रिया ने नीलेश को भी उठाया। दोनों ने उठकर देखा कि घर का दरवाज़ा खुला था और चित्रा का कोई अता-पता नहीं था। इधर चित्रा सिक्योरिटी चेक में प्रवेश कर चुकी थी।

अब उसको भारत वापिस जाने से कोई नहीं रोक सकता था। इधर जब चित्रा का कुछ पता नहीं चला तब चिराग ने अपने माता-पिता को फोन किया और चित्रा पर ही तोहमत लगाते हुए उसके गायब होने की बात कही। अब मनोहर जी चुप ना रह सके और उन्होंने चिराग को कहा कि तेरे जैसा भाई किसी को ना मिले।

तुम दोनों पति-पत्नी ने मेरे भरोसा का अनुचित लाभ उठाया है। अब मेरे दिल में तुम लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। वो तो भगवान की कृपा से हम लोगों को चित्रा की हालत का पता चल गया। वो हमारे पास वापिस आ रही है। आज मुझे और तुम्हारी मां दोनों को ही तुम्हारे मतलबी रिश्ते से छुटकारा मिल गया। वो ये सब सोच ही रहे थे इतने में ही चित्रा अपनी बैंक की नौकरी से घर आ गई थी। अब वो नौकरी के साथ-साथ एमबीए भी कर रही थी।

आज उसका अच्छा मूड देखकर मनोहर जी ने चित्रा से नीलेश के साथ रिश्ते की बात की। चित्रा मन ही मन नीलेश और सुमित्रा जी से बहुत जुड़ाव महसूस करती थी पर विदेश जाने के नाम से सिहर उठती थी। अभी वो रिश्ते की बात पर कोई जवाब नहीं दे पाई। सुमित्रा जी ने मनोहर जी को चित्रा की हां या ना जानने के लिए फोन किया तब उन्होंने चित्रा का डर उनसे भी बताया।

सुमित्रा जी ने कहा मैं चित्रा की मनोस्तिथि से अच्छी तरह से परिचित हूं और वैसे भी नीलेश ने भी अपनी कंपनी की भारत वाली शाखा में ट्रांसफर करवा लिया है। मैं तो बहुत पहले से चित्रा को अपनी बहू मान चुकी हों। सुमित्रा जी की बातों से आज मनोहर जी और सरिता जी  सारी चिंताएं दूर हो गई थी। उनकी बेटी के लिए सुमित्रा जी से अच्छी सास और नीलेश से अच्छा पति नहीं मिल सकता था।

दोस्तों कैसी लगी मेरी कहानी? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। कई बार अपने सगे खून के संबंध मतलबी रिश्ते बन जाते हैं पर पराए रिश्तें अपनों से भी बढ़कर साथ निभाते हैं। कई बार अपने बच्चों पर भी हद से ज्यादा भरोसा खतरनाक होता है क्योंकि कहा भी गया है कि “अति सर्वत्र वर्जयेत्”

अति सर्वत्र वर्जयेत् (भाग 2)

अति सर्वत्र वर्जयेत् (भाग 2)- डा.पारुल अग्रवाल: Moral Stories in Hindi

#मतलबी रिश्ते

डा.पारुल अग्रवाल,

नोएडा

 

 

 

3 thoughts on “अति सर्वत्र वर्जयेत् (भाग 3)- डा.पारुल अग्रवाल: Moral Stories in Hindi”

  1. बहुत सुन्दर। भावना प्रधान लेख। लेखिका को उत्कृष्ट लेख के लिए कोटिश: साधुवाद।

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