आशियाना – कमलेश राणा

आज फिर मकानमालिक से राधा की बच्चों को लेकर तू- तू, मै- मै हो गई,, उसका बेटा रोहन साइकल चला रहा था कि अचानक से जोर जोर से उसके रोने की आवाज़ सुनकर वह बाहर आई,, 

अरे, क्या हुआ मेरे बच्चे को,, मम्मा, नील ने मुझे धक्का दे दिया,, अरे,, ये तो खून निकल रहा है,,, 

क्यों नील ,तुमने रोहन को धक्का क्यों दिया,, देखो न कितनी चोट लग गई उसे,, ऐसा करते हैं क्या,, सॉरी बोलो,, 

इतने में नील की मम्मी भी बाहर निकल आई और उसके बेटे की ही गलती बताने लगी,, रोज़- रोज़ की इस झिक झिक से तंग आ गई थी वो,, 

हर मकानमालिक यह समझता है कि ये तो उठाईगीरे हैं,, जैसे इनके तो घर द्वार है ही नहीं, अब इन्हें कौन समझाये कि जितनी जगह में इनका मकान बना है, उससे ज्यादा बड़ा तो उसके घर का आंगन ही है,, 

अब घर ऐसी चीज़ तो है नहीं कि जहाँ जाओ,, उठा कर ले जाओ,, भुनभुनाये जा रही थी वो,, आने दो राघव को,, आज वह उससे बात करके अपना घर लेने को उसे मना ही लेगी,, 

क्या बात है डार्लिंग,, ये प्यारा- प्यारा मुखड़ा उदास क्यों है आज,, 

राघव, मुझे नहीं रहना यहाँ,, कोई भी कुछ भी बोल देता है,, मुझ से नहीं सुनी जाती,, तुम अपना घर ले लो, प्लीज़,, वहां हम अपनी मर्ज़ी से तो रह पायेंगे,, यहाँ तो एक कील भी ठोक लो तो गज़ब हो जाये,, 

राघव भी कई दिनों से यही सोच रहा था पर समस्या थी कि इतना पैसा आयेगा कहाँ से,, 




राधा एक फ्लैट लिया है मेरे दोस्त ने,, लोकेशन भी बहुत अच्छी है,, पर हमारे बज़ट से बाहर है,, सोचता हूँ कुछ लोन ले लूंगा,, पर तुम्हें भी खर्चों में कटौती करना पड़ेगी,, तभी लोन चुका पायेंगे हम,, 

राधा खुश होते हुए बोली,, मेरे पास बहुत से गहने ऐसे हैं जिन्हें मैं पहनती ही नहीं,, उन्हें बेचकर कुछ पैसे मिल जायेंगे तो लोन कम लेना पड़ेगा,, 

तो फिर ठीक है,, कल तुम चलकर देख लो,, पसंद हो तो कल ही फाइनल कर देंगे,, 

आज राधा की आँखों से नींद कोसों दूर थी,, उसका अपने घर का चिरप्रतीक्षित स्वप्न जो साकार होने जा रहा था,, वो नींद में भी यही सपना देख रही थी,, एक बंगला बने न्यारा,, 

आज उसका फ्लैट में गृहप्रवेश है,, बहुत विधि विधान से पूजा पाठ कराने के बाद कलश ले कर उसने राघव और बेटे के साथ घर में कदम रखे,, बड़े मनोयोग से एक – एक चीज़ सजाई उसने,, ठीक उसी तरह जैसे पंछी एक एक तिनका जोड़ कर घोंसला बनाते हैं,, वह भी अपने आशियाने को संवार रही थी,, 

पांच साल हो गये थे उसे वहां रहते हुए,, पड़ोस भी अच्छा था,,सब ठीक ठाक चल रहा था,, 

 अचानक एक दिन उसने देखा, सोसाइटी में बड़ी हलचल सी है,, सभी के चेहरों के रंग उड़े हुए थे,, पूछने पर पता चला कि यह सोसाइटी बिल्डर ने बिना परमीशन के बनाई थी और अब यह अवैध निर्माण के अंतर्गत आ गयी है और सरकार ने इस बिल्डिंग को गिराने का फैसला किया है,, 

ऐसा कैसे हो सकता है,, हमने तो पूरा पैसा दिया है बिल्डर को,, अब कहाँ जायेंगे हम,, हर चेहरे पर चिंता के साथ ही साथ खौफ़ भी नज़र आ रहा था,, 

बिल्डर का कहीं भी अता -पता नहीं है,, करें तो करें क्या,, जीवन की सारी संचित निधि लुटा दी,, आशियाना बनाने में,, अब वह भी आँखों के सामने जमींदोज हो रहा था,, ऐसा लग रहा था जैसे कोई शरीर में से आत्मा को निकाले लिये जा रहा हो,, 

लोग मुआवज़े की माँग कर रहे थे,, क्या पता ,, कब और कितना मिले,,

 ऐसे लोगों को जो दूसरों के जीवन और भावनाओं के साथ खिलवाड करते हैं,, सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिये,, 

कमलेश राणा

ग्वालियर

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