चलो अब जाने भी दो :  डोली पाठक : Moral Stories in Hindi

अनु को जाने क्यों बुआ के बेटे का आना बिल्कुल पसंद नहीं था। कहने को तो अभय अनु से तीन साल छोटा था परंतु उसकी हरकतें बचपन से हीं बड़ों जैसी थी,उस पर अभय का अनु को बार बार बहाने से छूना उसे विचलित कर देता.. 

अनु उसे हर बार टोक देती परंतु फिर भी उस पत्र कोई असर नहीं होता।

अनु ने हर बार मां को बताना चाहा पर मां सुने तब तो.. 

मां पापा के लिए तो उनका एकलौता भांजा जैसे आंखों का तारा था, मां हर बार कहा करती एक भांजा सौ ब्राह्मणों के

समान होता है।

इस परिस्थिति में मां भला क्यों कर भांजे की बुराई सुनने लगी.. 

घर के हर छोटे बड़े समारोहों में बुआ का आना लगभग तय हुआ करता और बुआ के साथ आता उनका बेशर्म बेटा… 

अनु को जितना गुस्सा अभय पर आता उससे दस गुना अपने घर वालों पर आता.. 

वो समझ नहीं पा रही थी कि जो अनुभव अभय के लिए वो करती है बाकि लोग क्यों नहीं करते.. 

सभ्य समाज की असली खुशी या दिखावा – गीतू महाजन

अभय का एक खास तरीके से छूना हर बार अनु के अंदर गुस्से का एक ज्वार-भाटा उठा जाता।

समय बीतता गया इस बार अभय की पढ़ाई और फूफा जी की तबियत बिजनेस में घाटे अनेकों कारणों से बुआ तीन चार साल मायके नहीं आ पाई.. 

अनु अभय के बुरे कारनामे भूल चुकी थी।

अनु अब वो पहले वाली छुईमुई सी लड़की से बदल कर एक जवान सुंदर सी लड़की बन चुकी थी।

घर के गृहप्रवेश में अभय समेत बुआ और फूफा जी सबका आगमन हुआ,अभय ने अनु को देखते हीं उसे कसकर पकड़ लिया और उसके कपोलों पर चुंबन करने लगा।

अनु का मन एक वितृष्णा से भर उठा उसने तुरंत अभय को स्वयं से दूर कर दिया और एक चांटा उसके गाल पर रसीद कर दिया.. 

ये सब इतना अप्रत्याशित ढंग से हुआ कि सब हैरान रह गए.. 

मां ने अनु को एक चपत लगाते हुए कहा – बेवकूफ क्या कर डाला तूने???

अरे!! वो तेरा भाई है क्या हुआ जो गले लगा लिया?? 

अनु बिफर पड़ी और दहकते चेहरे से बोलना शुरू किया,, बस किजिए मां!! ये कोई भाई वाई नहीं है मेरा.. 

अरे इतने सालों से कितनी बार बताना चाहा मैंने इसके बारे में मगर हर बार आपने मुझे चुप करा दिया.. 

अपने लाडले भांजे के प्यार में इतनी अंधी थी कि, आपने मेरी बात तक सुनना जरूरी नहीं समझा लेकिन बस मां अब नहीं,आप क्या जानें इसका छूना एक भाई के स्पर्श सा कभी भी नहीं था.. 

छल – कमलेश राणा

और पापा आप तो कहते हैं कि आप लोगों को खूब पहचानते हैं फिर भी आप इसे नहीं पहचान सकें।

पापा ने अनु को समझाते हुए कहा – चलों अब जाने दो बेटा बात को बतंगड़ नाम बनाओं बहुत सारे मेहमान आएं हैं घर में अब चुप हो जाओ।

अनु लगभग रोज पड़ी – पापा हर बार लड़कियों को हीं क्यों कहा जाता है कि चलो अब जाने दो अभय जैसे छिछोरे लड़कों को क्यों नहीं… 

जो अपनी हरकतों से एक हंसती मुस्कुराती लड़की को एक डरी सहमी गुड़िया बना देते हैं,हर लड़के के लिए एक अविश्वास भर देते हैं।

 अनु अपने रौ में जाने कब तक और क्या क्या बोलती गई उसे खुद भी नहीं पता था।

 सारे रिश्तेदार हक्के बक्के से उसे देखते रह गए।

 एक बरसों पुराना दर्द और ग्लानि शब्दों से निकल कर बहता चला गया।

 स्वरचित – 

 डोली पाठक

 पटना बिहार

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