वक्त – संजु झा

वक्त की वक्र और कुटिल चाल को आजतक कोई नहीं समझ सका है।यही वक्त जब उसपर मेहरबान होता है तो अनगिनत खुशियाँउसकी झोलियों में उड़ेल देता है और नाराज होने पर उन खुशियों को सूद समेत वसूल भी लेता है।यही हाल मोनिका के साथ भी घटित हुआ है।वक्त की मार से उसके सारे सपने रेत के घरौंदे की तरह सागर में एकसार हो गए। जिन लहरों से उसने कभी बेपनाह मुहब्बत की थी,उन्हीं लहरों ने उसे मझधार में गम के सागर में डुबो दिया।उसकी आँखों से मूसलाधार बारिश हो रही है।मोनिका की जिन्दगी की तरह उसके घर में भी सन्नाटा छाया हुआ है।उसकी खुशहाल जिन्दगी का निरंतर भागता वक्त का पहिया अचानक से थम-सा गया है।अचानक से पति आनंद की मौत ने उसकी हर आकांक्षा,हर उम्मीद का गला घोंट दिया।उसका मनोबल ,धैर्य भी साथ छोड़ दिया है।अचानक टीसने लगा था उसका अंतर्मन।दोनों मासूम बेटे को कलेजे से लगाए सुबकती-सिसकती वह एक चीत्कार के साथ रो पड़ी।उसने खुद से पूछा -“मोनिका!इन मासूम को पिता का प्यार कैसे दे पाएगी?इनके सर पर जबतक पिता का साया था,

तबतक ये मासूम बेचारे नहीं लग रहे थे।आज इनकी मासूम आँखों में पिता के खालीपन का एहसास स्पष्ट नजर आ रहा है।पति आनंद के बगैर कैसे जिऐगी?” एकाकी पल पाकर मोनिका के दिल में पति आनंद के साथ बिताए पल की यादें पन्नों की तरह फड़फड़ाने लगीं।साधारण परिवार की मोनिका ने कब ख्वाब देखा था कि आनंद जैसे सुदर्शन और बड़े परिवार के लड़के से उसकी शादी होगी!कितनी यादें,कितनी स्मृतियाँ उसके मन के पृष्ठों पर उतर आईं!शायद उस अनूठी हस्ती के प्रति उसकी अशेष श्रद्धा-सुमन अर्पित हो जाएँ!आनंद का साथ जीवन में बरगद की छाँव-सा था।विधाता ने उसे अपनी पूरी लगन से गढ़कर, पूर्ण संस्कारित करके धरा पर भेजा था।नामानुसार वह जहाँ भी रहता ,वहाँ का वातावरण भी आनन्दमय हो जाता था।उसके गुनगुनाने और हँसी-मजाक से मानो वहाँ का वातावरण खिलखिलाहटों से भर जाता! अचानक से एक दिन आनंद से हुई मुलाकात ने उसकी जिन्दगी बदलकर रख दी।

आनंद बहुत दिनों से उसे दिल-ही-दिल में पसंद करता था।संयोगवश एकांत में दोनों की मुलाकात हो गई। उसे सामने पाकर आनंद मानो खुशी से पागल हो उठा। मोनिका को सामने पाकर आनंद ने न तो वसंत का इंतजार किया,न ही फूलों के खिलने का,न तो चाँदनी रात का ही।उसने सीधे-सीधे कह डाला -” मोनिका!तुम्हारी आँखों में एक अनोखी कशिश है,जो मुझे हमेशा अपनी तरफ आकर्षित करती है।तुम मुझे बहुत खुबसूरत लगती हो।तुम्हारी आवाज मेरे मन में मधुर संगीत घोलती है।




बहुत दिनों से तुमसे मिलने को मेरा मन बेचैन था।क्या यही प्यार है?” धीरे-धीरे आनंद के प्यार की शिद्दत से मोनिका पिघलने लगी।हर सप्ताह मुलाकातें होने लगीं और दोनों चुम्बक की तरह एक-दूसरे को अपनी तरफ खींच रहे थे।आनंद के बेशुमार प्यार के सामने सामाजिक स्तर का भेदभाव भी न टिक सका। उसने घर में बेबाक निर्णय सुनाते हुए अपने माता-पिता से कहा -” मैं मोनिका से बेइंतहा प्यार करता हूँ,उसी से शादी करुँगा।” कुछ विरोध के बाद उसने अपने माता-पिता को मोनिका से शादी के लिए मना ही लिया। वक्त अचानक से मोनिका पर मेहरबान हो उठा।संपन्न परिवार और सुदर्शन पति पाकर वह खुशी से झूम उठी।सास-ससुर भी उसके आचरण और व्यवहारकुशलता से खुश थे।वक्त ने दो चाँद से खुबसूरत बेटे देकर उसकी खुशियों में चार चाँद लगा दिया।लोग उसकी किस्मत पर रश्क करते थे और वह खुद अपनी किस्मत पर,परन्तु उसे कहाँ पता था कि उसकी खुशियाँ चंद दिनों की मेहमान हैं,उसपर शीघ्र ही ग्रहण लगनेवाले हैं।कितनी खुशी-खुशी आनंद कहकर गए थे-“मोनिका!आज हमें दोस्त की शादी की रिसेप्शन पार्टी में चलना है।

तुम बच्चों के साथ तैयार रहना।मैं एक घंटा बैडमिंटन खेलकर आता हूँ।” मोनिका ने कहा भी था-“आनंद!एक दिन बैडमिंटन खेलने नहीं जाओगे,तो क्या हो जाएगा?” जबाव देते हुए आनंद ने कहा -“मोनिका!तुम जानती हो कि बैडमिंटन खेलना मेरा जुनून है।अगर एक दिन भी नहीं खेलूँ,तो खाली-खाली सा लगता है।” वक्त तो अपनी क्रूर दृष्टि लगाएँ बैठा था,तो आनंद खेलने जाने से कैसे रुकता! खेलते-खेलते बैडमिंटन कोर्ट में ही उसे चक्कर आ गया और वह धम्म से जमीन पर बैठ गया।जबतक उसके दोस्त उसे डाॅक्टर तक पहुँचाते ,तबतक उसने दुनियाँ को अलविदा कह दिया।डाॅक्टर पास पहुँचने तक तो निर्मम वक्त उसे कुछ साँसे उधार दे देता!वक्त को उसके परिवार पर जरा भी तरस नहीं आई।जो आनंद हर पल सबके लिए खुशियाँ बाँटता था,वही आनंद ने जाते-जाते एक बार भी अपने बूढ़े माता-पिता ,पत्नी और बच्चों के बारे में एक पल के लिए भी नहीं सोचा।निर्दयी होकर आँखें मूंदकर चुपचाप दूसरी दुनियाँ में चला गया।

सचमुच कभी-कभी वक्त बहुत जालिम हो उठता है।जीवन भी कैसे-कैसे रंग दिखाता है!जब हम खुशी की चरमसीमा पर होते हैं,तभी उसी के समानांतर ऐसा आघात लगता है कि हम हिल उठते हैं और हमारे जीवन के पर्दें पर मंजर बदल जाते हैं। मोनिका मन-ही-मन सोच रही है-” कैसे ढ़ोऊँगी इस उद्देश्यहीन जिन्दगी का भार?” अपनी मनोव्यथा को वह स्वंय भी नहीं समझ पा रही है।जितना सोचती है उतना ही उलझती जा रही है।अचानक से उसे आसमान में मुस्कराता हुआ चाँद नजर आता है।मानो चाँद रुपी आनंद उसे सान्त्वना देते हुए कहता है -” मोनिका!वक्त अभी ठहरा नहीं है,बस एक दुखद पड़ाव से गुजरा है।तुम्हारी जिन्दगी निरुदेश्य नहीं है।अभी तो तुम्हें बच्चों के साथ लम्बे रास्ते तय करने हैं,बहुत दूर तक जाना है।हमारा सुखद साथ बस इतना ही था!” मोनिका अपने आँसू पोंछते हुए दोनों बच्चों का सुखद भविष्य बनाने का संकल्प लेती है।
#वक्त
समाप्त

(स्वलिखित)

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा।

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