स्वाभिमान ‘ – विभा गुप्ता

  ” आपने मेरा गिफ़्ट लौटा कर मेरी इंसल्ट की है।आपसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।” आकाश ने गुस्से से अपनी बड़ी बहन अंजू से कहा तो अंजू भी उसी लहज़े में बोली,” हाँ, मेरा किया तो तुम्हें इंसल्ट लगेगा ही।याद करो, पाँच साल पहले मैंने तुमसे एक छोटी-सी मदद माँगी थी,पैसे नहीं माँगे थे तुमसे,थोड़ा समय माँगा था, तब तुमने कहा था, ” अब समय निकल चुका है।” उस वक्त मैं मानसिक रुप से टूट चुकी थी, निराश और हताश होकर ही अपने भाई के पास अपने साथ खड़े होने की उम्मीद लेकर आई थी पर तुमने साफ़ शब्दों में मना कर दिया था।मैंने तुम पर कोई दबाव नहीं डाला।तुमने कभी भी एक फ़ोन तो क्या कभी मैसेज करके भी नहीं पूछा कि  आप कैसी हैं? यहाँ तक कि साल-डेढ साल में माँ के पास आती तो तुम्हारे पास भी मिठाई देने आती थी और तुम नौकर के हाथ से लिवा लेते थे, कभी मुझे अपने घर के भीतर बुलाया नहीं।शायद तुम्हें डर था कि ये गरीब बहन तुमसे पैसे न माँग ले।यही नहीं, जन्मदिन-त्योहारों पर तुम्हें मैसेज करके विश करती तो सिर्फ़ थैंक्स कह दे देते।कभी दीदी नहीं कहा।क्या मुझे दुख नहीं होगा?” कहकर अंजू ने एक लम्बी साँस ली।




फिर बोली,” पिछले साल आने से पहले मैंने तुम्हें फ़ोन करके कहा कि प्लीज़ बाहर आकर गिफ़्ट ले लेना।नौकर के हाथ देना ठीक नहीं है तब तुम आये,मुझे अपने घर के अंदर भी ले गये।मुझे अच्छा लगा लेकिन ड्राइंग रूम के सोफ़े पर बिठाकर बस एक कप चाय पिला दी।चेहरे पर मुस्कान तो छोड़ो कोई भाव ही नहीं था।मैं माँ के पास चली आई, करीब एक घंटे बाद आकर तुमने यह कहकर मुझे एक पैकेट पकड़ा दिया कि किसी को देना नहीं और चले गए।खोलने पर एक हार देखा तो खुशी हुई और थैंक्स बोलने के लिए जब तुम्हें फ़ोन किया तो तुमने नहीं उठाया।दो-तीन बार करने पर भी नो रिप्लाई,तब मैं समझ गई।तुमने मेरे गिफ़्ट की प्राइस देखकर मुझे रिटर्न गिफ़्ट देकर मेरा नंबर ब्लाॅक कर दिया था।क्या ड्राइंग रूम में बिठाकर चाय पिलाने वाले सभी मेहमानों को तुम इतना ही कीमती उपहार देते हो?”

“आप तो मेरी बहन है ना ” आकाश ने कहा तो अंजू बोली,” तो घर में ही देते।बहन हूँ, इसीलिए मेरा नंबर ब्लाॅक कर दिये।”




आकाश चुप था।अंजू बोली, ” खैर,आज मैं कहती हूँ कि समय निकल गया है।तुम्हारा दिया सोने का हार न लौटाती तो तुम सोचते कि मैंने बेच दिए हैं।माना कि मैं गरीब हूँ, अकेली-बेसहारा हूँ लेकिन आत्मसम्मान तो मेरा भी है।तुमने बार-बार मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुँचाई,मैं सहन करती रही।आज तुम्हारे अहंकार को चोट पहुंची तो तुम तिलमिला उठे। फ़ोन करके मुझसे एटीट्यूड की बात कर रहे हो।यही सही,लेकिन तुम्हारा दिया यह हार मेरे लिए एक बोझ था जो मैंने उतार दिया।न देते तो चलता,बस एक बार इतना ही कह देते कि दीदी, मैं आपके साथ हूँ।अब तुम चाहे जिससे भी, जो मर्ज़ी कहो,सुनने वाला यही कहेगा कि तुम्हारी दीदी खुदगर्ज़ नहीं, खुद्दार है।” कहकर अंजू ने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया।
विभा गुप्ता

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