सहारा – करुणा मालिक Moral Stories in Hindi

शिखा, ज़रा जल्दी से मेरे क़मीज़ में बटन तो टाँक दे , आज तो इसी शर्ट को पहनना है, ऑफिस में बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं ।

जी.. भैया …बस दो सेकेंड, बड़े भैया ने यह कुर्ता पजामा प्रेस के लिये दिया है, उन्हें पार्टी की किसी मीटिंग में जाना है ।

शिखा….ओ शिखा…. प्लीज़ मेरी साड़ी पर प्रेस कर दे । हाय राम ! तू तो सुई धागा लेकर बैठी है । ये काम बाद में कर लेना।

शिखा….. गैस बंद कर जल्दी से…. सब्ज़ी जलने की बू आ रही  है…. तेरा भी ध्यान न जाने कहाँ रहता है?

ये किसी एक सुबह  का काम नहीं बल्कि शिखा के साथ हर रोज़ ऐसा ही होता है । पूरे दस साल हो चुके हैं-माँ और बाबूजी को गए और घर भर की चहेती लाड़ली शिखा को भी अवैतनिक नौकरी करते हुए । 

इंटर पास करते ही शीला बुआ ने अपनी तीन भाइयों की लाड़ली इकलौती  भतीजी  शिखा के लिए रिश्ता भेजा तो पूरा घर ख़ुशी से झूम उठा था ।

बाबूजी चहक कर बोले थे  —-अरे , मेरी लाडो इतनी बड़ी हो गई कि रिश्ता भी आ गया , मुझे तो ऐसा लगता है कि ये वही तुतलाती छोटी सी शिखा है ।

माँ-बाप के लिए तो बच्चे छोटे ही रहते हैं , भइया! भाभी से बात करके एक-दो दिन में बता दो । राजसी सुख भोगेंगी हमारी शिखा , देखेभाले सीधे लोग हैं, जैसा चाहोगे वैसा करेंगे । 

फ़ोन रखने के बाद बाबूजी ने जैसे ही बाकियों को बताया तो वे सीधे विवाह की योजनाओं में खो गए । 

माँ, मैं तो कोट-पैंट बनवाऊँगा । उसी की मैंचिग टाई भी लगाऊँगा …….

टाई बाँधनी आती है क्या तुझे ……

अरे , बँधवा लूँगा किसी से …… वो मदन भैया आएँगे उनसे…..

अगर वो न आएँ तो….. भई , मैं तो लाल शेरवानी और सफ़ेद पजामा ख़रीदूँगा….बड़े भैया, आप क्या पहनोगे?

पहन लूँगा कुछ भी….. मेरी शादी थोड़े ही है …. जब मेरी शादी होगी तब देखना मेरे ठाठ…

मेरा तो दिल बैठा जा रहा है, तुम्हारी बात सुनकर…. इतनी जल्दी…. मेरी लाडो के जाने का भी समय आ गया , माँ थोड़ी उदास होकर बोली थी ।

अरे ! जिसका रिश्ता आया है उससे भी तो पूछो उसके मन की बात , बोल शिखा?

मैं शादी नहीं करूँगी । पढ़ूँगी, आगे बढ़ूँगी । कह दो बाबूजी, बुआ को । क्या ये बाल- विवाह का ज़माना है? मैं आपको और माँ को छोड़कर कभी नहीं जाऊँगी । 

बेटी की बात सुनकर माँ और बाबूजी दोनों ही हँस पड़े—- हाँ, वैसे तो शीला ने कुछ जल्दी रिश्ता बता दिया । इंटर किया है, अभी उम्र ही क्या है? 

बस शीला को कह दिया कि अभी कुछ साल नहीं ।उसके बाद बी०ए० , एम० ए० करते-करते भी बहुत से रिश्ते आए पर  शिखा ने साफ़ कह दिया कि वो विवाह नहीं करेगी । 

पहले तो माँ-बाबूजी ने इसे शिखा का बचपना ही समझा  था पर जब उन्होंने देखा कि शिखा तो कभी विवाह करना ही नहीं चाहती तो उनका दिल बैठ गया । क्यों …. आख़िर ऐसी कौन सी बात उसके मन में बैठ गई?

ना बेटा, ऐसे पूरा जीवन कैसे कटेगा । अब तो नहीं पर एक उम्र के बाद जीवनसाथी की ज़रूरत पड़ती है । 

हाँ बेटा , अभी महसूस नहीं होगा पर माँ-बाप के जाने के बाद बिल्कुल अकेली पड़ जाओगी । भाई तो सब अपने-अपने परिवार में व्यस्त हो जाएँगे ।

 

मुझे किसी की ज़रूरत नहीं, नौकरी है , आज नहीं तो कल सरकारी नौकरी लग जाएगी । किसी के अंडर रहना मुझे पसंद नहीं…..

किसी के अंडर रहने की बात कहाँ से आ गई ? आजकल तो लड़कियों को भी बराबर का दर्जा दिया जाता है । आदमी की पूर्ति कभी पैसों से नहीं की जा सकती है । आदमी कम में गुज़ारा कर ले पर पैसा हर चीज़ नहीं ख़रीद सकता । 

माता-पिता ने , सहेलियों ने , रिश्तेदारों ने और पड़ोसियों ने भी शिखा को दुनिया की ऊँच-नीच समझाने की बहुत कोशिश की पर शिखा विवाह के लिए तैयार नहीं हुई । धीरे-धीरे तीनों भाइयों के विवाह हो गए । परिवार बढ़ने लगा तो रोज़ की कलह- लड़ाई भी होने लगी । 

तीनों भाइयों के विवाह के बाद शिखा और माँ- बाबूजी एक ही कमरे में रहते थे । दो बड़े भाई और भाभियाँ तो बैंक में अच्छी नौकरी पर लगे थे । छोटा भाई और उसकी पत्नी एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत थे । ऐसे में अक्सर वे शिखा को  कहते—-

कहाँ प्राइवेट स्कूल में धक्के खाती हो …. सैलरी भी कोई ख़ास नहीं….. अच्छा होगा कि घर के बच्चों को  ही पढ़ा लिया करो और सबको गर्म खाना भी मिल ज़ाया करेगा । 

माँ अब भी कहती—-

शिखा, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा…. हमारे सामने ही जब तेरे साथ ऐसा सुलूक करने लगे हैं तो बाद में क्या करेंगे…. वो तेरी मौसी एक लड़के के…..

माँ… मुझे नहीं करनी शादी….. करनी होती तो पहले ही ना कर लेती …. वैसे  शादी के बाद भी कौन सा कोई बैठाकर खिलाता है? 

शिखा की दलीलों के सामने माँ हार जाती थी । और एक दिन माँ-बाबूजी शिखा की चिंता मन में लिए संसार से चले गए । जब तक माँ-बाबूजी थे …. शिखा  के  चारों ओर एक सुरक्षा कवच था पर अब वह  अपनों के बीच अकेली और असुरक्षित हो गई । भाई- भाभियों को ऐसा लगता कि वह तो स्कूल में आराम करने जाती हैं….. घर में कदम रखते ही सबकी फ़रमाइशें शुरू हो जाती ——

शिखा बुआ, मेरा प्रोजेक्ट बना देना , कल लास्ट डेट है ।

शिखा, कब से तुम्हारे भइया भरवाँ करेले बनाने को कह रहे हैं…. तुम दो बजे स्कूल से आ जाती हो …. उसके बाद ख़ाली ही तो रहती हो …

बुआ … टीचर ने चार्ट मँगवाएँ है… दिलवा लाओ ना ।

शिखा….. बच्चों के पेपर आ रहे हैं…. क्लास में फ़र्स्ट आने चाहिए….  वरना तुम्हारा फ़ायदा ही क्या है? सारा दिन स्कूल में  आराम ही तो करती हो … छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाने में लगता ही क्या है ?

शिखा स्कूल से आते-आते सब्ज़ी- फल आदि ले आया करो , मंडी के सामने से गुजरती हो .. लाने को तो हम भी ले आएँ पर घूमकर जाने में जाम में फँसने का डर रहता है ….. ऊपर से गाड़ी पार्किंग की अलग समस्या…।

शिखा को न इधर चैन था न उधर । अब उसे माँ- बाबूजी और दूसरे लोगों की कही बातें याद आती —-

जवानी में नहीं पर जब बुढ़ापे की तरफ़ चलेगी… तब तुम्हें अहसास होगा कि अपना घर , अपने बच्चे और अपना पति कैसा भी हो…. उसमें अलग ही संतोष होता है । 

देखते ही देखते तीनों भाइयों ने अपने-अपने फ़्लैट ख़रीद लिए….. पर शिखा के लिए किसी भी भाई के घर में एक भी कमरा नहीं था । शिखा को याद आ रहा था कि बड़ी भाभी नए मकान के हवन के दिन कैसे चहक-चहक कर घर दिखाते हुए कह रही थी——

ये हमारा बेडरूम है और ये दोनों बच्चों के कमरे ….नीचे के हिस्से में सर्वेंटरूम भी है…

सुनकर शिखा को धक्का सा लगा था कि मुझसे अच्छा तो वो सर्वेंट ही है, जिसका अभी वजूद भी नहीं…. पर उसके रूम को कितने फक्र के साथ दिखाया जा रहा है ।

भतीजे-भतीजी भी उस बुआ को अनदेखा करने लगे जिसके बिना उनका कोई काम होता ही नहीं था । उस समय शिखा कितनी ग़लतफ़हमी में जी रही थी पर अब चाहते हुए भी मुँह खोलने में शर्म आती थी कि—-

मैं भी अपना परिवार चाहती हूँ । सचमुच मुझसे गलती हो गई । 

दोनों बड़े भाई तो अपने-अपने फ्लैटस में जा चुके थे । जाते समय किसी के मुँह से झूठ को भी नहीं निकला कि शिखा, चलो … हमारे साथ रहना । बस कह दिया —- आते रहेंगे, तुम भी चक्कर लगा दिया करना ।

वो तो शुक्र था कि बाबूजी का बनाया घर था …. नहीं तो कहाँ जाती ? छोटा भाई-भाभी थे … चलो कम से कम… इनमें तो इतनी अक़्ल निकली कि छोटी बहन को अपना समझा पर उस दिन शिखा का भ्रम टूट गया जब छोटे भाई ने कहा ——

शिखा, मुझे और नीलू को कंपनी की ओर से जर्मनी भेजा जा रहा है । असल में, जाना तो पिछले साल था पर काम ही नहीं बना ….. इतना अच्छा मौक़ा मिला है…. तुम किसी एक भाई से पूछ लो ….. अकेली कैसे रहोगी?  वैसे घर की मेंटीनेंस में भी काफ़ी खर्चा होता है तो……

आप जाइए भैया…. मेरी चिंता मत कीजिए…. मैं देख लूँगी । 

कहकर शिखा अपने कमरे में चली गई । माँ- बाबूजी की फ़ोटो  देखकर रोती रही पर अब क्या करे ….. उसे बुढ़ापे की चिंता

सताने लगी….. कोई एक गिलास पानी देने वाला भी नहीं रहा मेरे पास तो …. आँखों पर चश्मा लग गया…. बालों में सफ़ेदी आ गई …. आज उसे अपनी सहेलियों की याद आ रही थी जो क़रीब पाँच साल पहले तक किसी न किसी ज़रूरतमंद का रिश्ता, उसे बताती थीं पर अब किस मुँह से, किसे कहे ? 

अचानक देखा कि बड़ी भाभी का फ़ोन आया था——

हाँ शिखा….. छोटा तो जा रहा है….. तो कल मैं तुम्हें लेने आ जाऊँगी… कैसे रहोगी वहाँ अकेली ? तुम्हें तो पता ही है कि दोनों बच्चों के जाने के बाद हम भी अकेले ही है । 

शिखा को लगा कि वो कितनी ग़लत थी … उसके बड़े भाई-भाभी ने उसके बारे में सोचा । शिखा की जान में जान आई —- मैं भी ना जाने क्या-क्या सोच रही थी । 

वो अपने कमरे से निकलकर छोटी भाभी को बताने जा ही रही थी कि कल बड़ी भाभी उसे लेने आ रही है पर छोटी भाभी की आवाज़ कानों में पड़ी——

नितिन! मान गए तुम्हारी बड़ी भाभी को….. उन्हें पता है कि ये मकान माँ- बाबूजी शिखा के नाम कर गए हैं…. तो हमारे जाने की खबर सुनते ही फ़ोन कर दिया…… अरे , मुझे कहती कि मैं कल शिखा को लेने आ रही हूँ….. जैसे हमें तो पता ही नहीं कि शहर के बीचोंबीच की प्रापर्टी करोड़ों की है और शिखा को लेने क्यों आ रही है ….. अच्छा है कि शिखा को बाबूजी की वसीयत की जानकारी नहीं है…… वरना शेरनी बन जाती …… घर को जल्दी से जल्दी बिकवा देंगी बड़ी भाभी……. एक बार शिखा वहाँ गई …… फिर वो कुछ बोल भी नहीं पाएगी । देखो…. अपने हिस्से के पैसे……

भाभी की बात सुनते ही  शिखा उल्टे पाँव अपने कमरे में चली गई ——

हाय ! मैं तो भुलावे में थी कि भाभी मेरी चिंता करके , मुझे लेने आ रही है पर …… अब तो बस यह मकान ही मेरे बुढ़ापे का सहारा है ।आज उसकी आँखों से आँसू रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे……. क्यों उसने अपने माँ-बाबूजी की बात नहीं मानी? 

सुबह सबसे पहले उठकर शिखा अपनी सहेली मीरा के घर पहुँची क्योंकि  आज शिखा को यक़ीन हो गया था कि  मीरा के वकील पति की सहायता के बिना , उसके बुढ़ापे का सहारा छीनने में उसके भाइयों को ज़रा भी शर्म नहीं आएगी  । 

मीरा और उसके पति के कहने पर ही उसने वन बेडरूम अपने लिए  लिया तथा एक दूसरा फ़्लैट  ख़रीदकर किराए पर चढ़ा दिया ताकि महीने की आमदनी होती रहे  और करोड़ों में बिके घर के  बाक़ी रूपयों की एफ डी करा दी । 

सचमुच शिखा जैसी न जाने कितनी लड़कियाँ , ग़लत फ़ैसला कर लेती हैं और बाद में सिवा पछतावे के कुछ हाथ नहीं लगता। 

मीरा के प्रयासों से विज्ञापन के ज़रिए, एक  ऐसे व्यक्ति से  शिखा ने विवाह कर लिया, जिनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी और बच्चे विदेश में जा बसे थे । सचमुच, जीवनसाथी की ज़रूरत उम्र के एक विशेष पड़ाव पर सबसे अधिक पड़ती है । 

#बुढ़ापा

करुणा मालिक

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!