पिंड दान – डॉ अंजना गर्ग

“हेलो , हेलो राकेश कल सुबह नो साढ़े नो के बीच जरूर आ जाना। मोनू को तो लाना ही है इस बार बहू को भी लाना। काम है।” शीला ने कहा।

” ठीक है मां।” राकेश ने कहा।  इतने में मां शीला ने फोन रख दिया। राकेश ने महसूस किया है अब काफी दिनों से मां ज्यादा बात नहीं करती। टू द प्वाइंट रहती है। फोन रख कर  राकेश ने मोनिका से कहा, “मोनिका सुबह मां के पास जाना है । तुम्हारे को भी बुलाया है।”

” मुझे किस लिए? मेरे से क्या काम है?” मोनिका ने थोड़ी गंदी सी शक्ल बनाकर कहा।

” पता नहीं कह रही थी सुबह नो साढ़े नो बजे तक आ जाना ,काम है।” राकेश ने वैसा ही बोला जैसा मां ने बोला था।

” कहीं पैसे वैसे तो नहीं चाहिए या सोच रही हो कि कहती हूं । मुझे घर ले चलो। राकेश दोनों ही बातों के लिए साफ न है। सुन लो कान खोल कर।” लास्ट की लाइन कुछ ज्यादा गुस्से में मोनिका ने कही ।

“तुम चल तो पडना। मां ने कहा है।” राकेश ने मनाने से वाले अंदाज में कहा।

“उनकी फिर वही नौटंकी चालू हो जाएगी ।” मोनिका फिर तुनकी । “बाबा तुम चल पड़ना। बाकी मैं संभाल लूंगा ।”राकेश ने फिर उसी अंदाज में कहा ।

” ओ . के.”

अगले दिन जैसे ही तीनों गाड़ी से उतरे, मां सामने गेट पर ही खड़ी थी। शायद उनका ही इंतजार कर रही थी। मोनू भाग के जाकर दादी से चिपट गया। शीला बोली , “राकेश,   मोनिका जल्दी जल्दी आ जाओ। पंडित जी आए बैठे हैं।”

” पंडित जी ,क्या है मां आज?” राकेश ने थोड़ी हैरानी से पूछा।

“आज मैं अपने पिंडदान करवा रही हूं ।आज सोमवती अमावस्या है। श्राद्धो में यह बड़ी मुश्किल से आती है। “शीला बताते बताते आगे-आगे चल रही थी।

” पर मां आप तो अभी जिंदा हो।” राकेश एकदम बोला।

“जिंदा ——-“बाकी शब्दों को मुंह में ही दबा कर शीला बोली ,” बैठो तीनों यहां, पंडित जी शुरू करो। फिर आपको इन्हें प्रवाहित करने के लिए फल्गु भी पहुंचना है।”

पंडित जी ने सब कर्मकांड करवा दिया । शीला ने सब सामान बांधकर पंडित जी को विदा किया ।पंडित जी के जाते ही राकेश एकदम जैसे फट पड़ा ।”मां यह सब क्या है? “

“बेटा ,कुछ नहीं। पिंडदान हो जाए तो हर साल श्राद्ध नहीं करना पड़ता। मोनिका यह सब कहां कर पाती। तुम्हारे परिवार को कोई पित्र दोष न लग जाए इसलिए मैंने यह सब किया।” शीला ने आराम से कहा। इतने में आश्रम के आचार्य आ गए बोले,” शीला धन्य हो तुम ।यहां आकर भी अपने बेटे, बहू की चिंता करनी नहीं छोड़ी।”

राकेश का मन चित्कार कर रहा था कि कहो मां अब घर चलो। पर रात वाली मोनिका की बात याद आते ही वह भारी ह्रदय से गाड़ी की तरफ बढ़ गया।

डॉ अंजना गर्ग

 

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