नई संस्कृति- डेटिंग – कमलेश राणा

क्या बात है विनीत ,,ओये होये कहाँ जा रहा है ऐसे सज संवर के,, परफ्यूम भी बड़ा ही महक रहा है।

अरे कहीं नहीं आंटी एक दोस्त से मिलने जा रहा हूँ , मुस्कुराते हुए विनीत बोला।

हमें तो भई यह स्पेशल सजधज देखकर कुछ अलग सी फीलिंग आ रही है।

आंटी आप तो अब टांग खींच रही हैं मेरी, कहते हुए वह बाइक उठाकर तेजी से निकल गया।

क्या मधु, तू भी बच्चों से इतने फ्रैंकली बात करती है , शर्मा गया बेचारा। आज वह अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ डेटिंग पर गया है।

ओह!!! तुरंत हमारे दिमाग में टी वी का विज्ञापन आ गया जिसमें इसी तरह एक युवा तैयार हो कर निकलता है और सामने से पिता को देखकर झेंप जाता है तब माँ बड़े प्यार से पति से कहती है,, डेटिंग पर जा रहा है कुछ पैसे डाल दो न उसके एकाउंट में और पिताजी तुरंत दो हजार रुपये ट्रांसफर कर देते हैं जिससे बेटा मजे से गर्ल फ्रेंड को घुमाये।

अच्छा डेटिंग मतलब तुमने उसके लिए लड़की पसंद कर ली है क्या??तब तो ठीक है, मॉडर्न जमाना है आजकल। पहले एक दूसरे के विचार जान लें तो अच्छा रहता है।

तुम भी कहाँ की पच्चड़ ले बैठी इसमें शादी वादी का कोई सीन नहीं होता। बस युवा लड़के लड़की मौज मस्ती के लिए एक दूसरे के साथ वक्त बिताते हैं।

अकेले?? 😳😳

और क्या बारात लेकर जायेंगे??

अब हम क्या जाने, हम ठहरे पुराने जमाने के। हमारे पापा ने तो सगाई के बाद मंगेतर का प्रेम पत्र आने पर हंगामा ही खड़ा कर दिया था उसके पिता तक को दिखा आये थे उनके लाडले की करतूत 😄

हाँ तो अगर उसे वो लड़की या कोई और ठीक लगी तो फिर कुछ समय साथ भी रह कर देखेगा?  सब तरह से फिट है या नहीं जैसे हम साग भाजी खरीदने से पहले उलट पलट कर अच्छी तरह देखते हैं फिर लेते हैं।

अब दुनियां बदल रही है मधु हमारा जमाना अलग था। यह नये जमाने की संस्कृति है।

हमारे जीवन में क्या कमी है? कितने प्यार से तो सारा परिवार जोड़ कर रखा है हमने ससुराल और मायके का भी साथ में। जब सब मिलते हैं तो कितना अच्छा लगता है कुछ दिन किसी की खैर खबर न मिले तो बैचेनी होने लगती है और आज की संस्कृति में सबसे विद्रोह करके अकेले रह रहे हैं लिव इन में। फिर चाहे लड़ें या मरें किसी को क्या मतलब। हमारी तो आवाज में जरा सी उदासी भी झलक जाती तो अम्मा दूसरे ही दिन भाई को खबर लेने भेज देतीं।

जरा देख के तो आ, बिट्टो अनमनी सी लग रही थी आज।

अब लिव इन में तो जिम्मेदारी से बचने के लिए रहते हैं, जब तक मन किया,, रहे,, नहीं तो बाय -बाय । तुम किसी और के साथ हम किसी और के।

फिर बच्चों की जिम्मेदारी किसकी होगी और बच्चे नहीं होंगे तो बुढ़ापे में सहारा कौन देगा क्यों कि जो जिम्मेदारी से बचने के लिए शादी ही नहीं कर रहा वह तो हरगिज नहीं देगा।इस समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए ही तो विवाह की व्यवस्था की गई है जिससे किसी भी उम्र के व्यक्ति को मानसिक, आर्थिक और शारीरिक संबल प्राप्त हो। जिसमें बालक, वृद्ध और यहाँ तक कि अगर कोई दुर्भाग्यवश अपाहिज हो जाये तो उसकी भी जीवन नैया आसानी से पार हो जाती है और Else इसमें कहीं कोई ढील दिखती है तो समाज उस व्यक्ति की भर्तस्ना करता है और कई बार तो सामूहिक बहिष्कार भी।

इसका डर इतना अधिक होता है कि गलत कदम उठाने से पहले व्यक्ति सौ बार सोचता है। इसलिए भई अपनी तो समझ के परे है यह नई संस्कृति के चोंचले, कल को कोई मुसीबत आ जाये तो किसी को मुँह दिखाने लायक भी न रहो।

कमलेश राणा

ग्वालियर

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