मेरी भी तो शादी करा दे….(हास्य)  – विनोद प्रसाद

शादी-ब्याह का सीजन शुरू होते ही मेेेरे सपनों को भी पंंख लग जाते हैं और मैं परियों की कल्पना में खो जाता हूँ। बैंड-बाजा का शोर पिघले शीशे की तरह मेरे कानों में उतरता है। ऐसा लगता है कि मैं बरसों से भूखा हूँ और मेरी आंखों के सामने कोई हलवा-पूरी खा रहा है। ज्योंहि सीजन समाप्त होता है, मेेेरे जख्म हरे हो जाते हैं और मैं अवसाद से घिर जाता हूँ।

अपने जन्मदिन का स्वर्ण जयंती वर्ष मनाने में अब कुछ वर्ष ही शेष रह गए, परन्तु मैं बदनसीब अब तक कुआरा बैठा हूँ। मेरे साथ पढ़ने वाली सारी लड़कियां निपट चुकी थीं। कुछ तो दो-चार साल में दादी-नानी भी बनने की पूरी तैयारी कर चुकी थीं। 

जब से मैं 21 वर्ष का हुआ, यानी सरकारी नियमों के मुताबिक शादी करने के लायक हुआ तब से मैं लगभग सभी शादियों में (जिनमें मैं निमंत्रित‌ होता था ) अपनी भागीदारी अवश्य सुनिश्चित करता, क्योंकि बारात में सुंदरियों के खूबसूरत जलवे देखने के लिए मिलते हैं और किसी से आंखें चार होने की भी प्रबल संभावना रहती है। अब तक मैंने अपने जीवन में कुल 53 शादियों में उपस्थिति दर्ज किया और संभवतः मैं यह 54वीं बारात में शामिल हो रहा था।

बैंड बाजा की धुन “आज मेरे यार की शादी है” पर औरतें और लड़कियां ठुमके लगा रही थीं। बच्चे, बूढ़े और जवान, यहां तक कि दूल्हे के पिताजी भी अपने ढंग से थिरक रहे थे। दो चार शर्मीले लोगों को छोड़कर लगभग सारे बाराती मस्ती में नाच रहे थे।


अच्छा, बारात में नाचने का भी अलग ही मजा होता है। जिसने कभी जिंदगी में अपनी कमर नहीं लचकाई होगी, वह भी इस भीड़ में नाचने का शौक पूरा कर लेना चाहता है। बारातियों में शायद ही किसी को नृत्य की थोड़ी बहुत जानकारी होगी, जो बैंड की धुन पर अपने हाव-भाव को मिलाने की कोशिश कर रहा था। बाकी सारे लोग तो बस यूं ही उछल-कूद कर अपनी भड़ास निकालते हैं। बैंड की धुन कुछ भी हो पर वे नाचेंगे अपने तरीके से ही। मजा तो तब आता है जब भांगड़े की धुन पर कोई नागिन डांस करता है तो कोई बीन की धुन पर भांगड़ा। 

कुछ मनचले देवर अपनी भाभियों के साथ नाचने की जुगाड़ कर रहे होते, तो कोई कुंआरा इस भीड़ में अपनी माशूका के साथ थिरकने का मजा ले लेना चाहता था। कोई पाबंदी नहीं, चाहे उछल-कूद करो या सड़क पर लेट कर डांस करो….सब चलता है। कुछ चालाक लड़के खुद को रिजर्व इसलिए रखते हैं कि लड़की वाले के घर के पास झूमकर नागिन डांस कर सकें और लड़कियों पर डोरे डाल सकें। 

भीड़ से अलग होकर कुछ उत्साही युवकों ने सड़क के किनारे ही अस्थाई मधुशाला बना डाला और जोश लाने के लिए एक-दो पैग हलक के नीचे उतार लिया। 

इधर घोड़ी पर सवार दूल्हे राजा अलग ही अंदाज में मुस्करा रहे थे जैसे कहीं विजय पताका फहराने जा रहे हों। मैं चूकि दूल्हे का सबसे सीनियर और करीबी दोस्त था इसलिए दूल्हे के साथ ही घोड़ी से सटकर चल रहा था। 

उधर बैंड-बाजे की धुन पर बाराती झूमकर नाच रहे होते और इधर मेरे दिल में हूक सी उठती। कभी-कभी तो मुझे दूल्हे से जलन होने लगती थी। मन में आता कि दूल्हे को घोड़ी पर से खींचकर उतार दूं और खुद सेहरा बांधकर घोड़ी पर बैठ जाऊं। लेकिन अपने अरमानों को दिल में ही दफन कर देता था, यह सोचकर कि कभी तो मेरी किस्मत का सितारा भी चमकेगा…कभी तो मुझे भी सेहरा बांधकर घोड़ी पर बैठने का सौभाग्य मिलेगा। 

बैंड वाला पूरी मस्ती में वही धुन बजा रहा था। मैं परेशान होकर कातर दृष्टि से बैंड मास्टर की ओर इस निवेदन के साथ देखता था कि यार, इस धुन को बजाकर क्यों मेरे जले पर नमक छिड़कते हो। पर बेवकूफ, कोई बैंड मास्टर मेरे दिल के दर्द को समझ ही नहीं सका…कमबख्त और जोश में बैंड बजाने लगता। अब उसे क्या मालूम कि यारों की शादी में भाग लेते हुए, मेरी जवानी भी अब अलविदा कहने के कगार पर पहुंच रही थी। साल-दो साल के अंदर यदि मेरी शादी नहीं हुई तो फिर सेहरा बंधने की मेरी उम्र भी शायद न बचे और जिंदगी यूं ही बारात में शामिल होते ही न गुजर जाए। 


लो जी, बातों ही बातों में लड़की वाले का घर भी आ गया। अब फिर वही पुरानी बातें दुहरायी जायेंगी, जैसे दूल्हे का महाराजा सोफे पर विराजमान होना…दुल्हन का स्टेज पर आना…दुल्हन की बहन के हाथों में वरमाला की सजी हुयी थाली…दूल्हा-दुल्हन का एक-दूसरे को वरमाला पहनाना…आदि-आदि। अब मैं इन रस्मों को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था…खामख्वाह मेरे दिल में दर्द पैदा होता था।

सबकी नज़रें बचाते हुए मैं स्टेज पर इठलाती-बलखाती हुयी अप्सराओं को घूरता हूँ, इस ख्याल से नहीं कि मुझे कोई पसन्द आ जाये बल्कि अब तो यह सोचकर कि शायद कोई मुझे पसन्द कर ले और मेरा भी कहीं टांका लग जाये।

पूरे पंडाल में इधर-उधर नज़रें दौड़ाने के बाद किसी कन्या पर नजर पड़ती भी थी तब दुर्भाग्यवश उसका प्रेमी हरदम उसके साथ ही चिपका रहता। कुछ कन्याओं को उनकी माताएं अपने आंचल में इस तरह छुपाए रहतीं कि मेरे जैसे जरूरतमंद कुआरे की बुरी नजर न पड़े। कुछ अपने रोबीले बाप या दबंग भाई के डर से गाय की तरह सीधी-सादी बनी इधर-उधर टुकुर-टुकुर ताकते रहतीं। कुल मिलाकर इन समारोहों में कन्याएं भी अपने जज्बात काबू में रखकर शराफत का लबादा ओढ़ने के लिए मजबूर रहतीं।

बारात में मैं इस बात पर विशेष ध्यान रखता था कि लड़कियों की नजर में मैं ज्यादा से ज्यादा रह सकूं, जिससे किसी जानू के साथ कांटा भिड़ाने में आसानी हो। अमूमन मैं दूल्हे के साथ ही रहता था, क्योंकि लड़कियां तो दूल्हे के पास ही ज्यादा मंडराती हैं। शादी की सभी रस्मों तक मैं कोशिश करता कि दूल्हे के आसपास ही रहूँ ताकि ‘हम आपके हैं कौन’ फिल्म की तरह दुल्हन की कोई जवान बहन से मजाक-मजाक में ही टांका जुड़ जाए। लेकिन आज तक किसी ने इस घोड़े को घास डालने की कृपा नहीं की। यहां तक कि दुल्हन की सखियां भी दूल्हे के ही पास मंडराती रहती। मैं‌ उन्हें कैसे समझाऊं कि जिस दूल्हे के पास वे मंडरा रही हैं वहां अब किसी की दाल नहीं गलने वाली। लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती। 

हद तो पिछली बारात में हो गई। हुआ यूं कि आंटी की उम्र की एक अधेड़ महिला जगह बनाती हुई दूल्हे के करीब पहुंचना चाहती थी, पर रास्ते में मैं खड़ा था। उसने कहा- “अंकल जी, थोड़ा रास्ता देना।” मैं हड़बड़ाकर इधर-उधर देखने लगा। पर उनके अंकल जी जैसा कोई प्राणी वहां मौजूद नहीं दिखा। मैं अंकल शब्द को नजरंदाज कर सभ्यता का परिचय देते हुए थोड़ा किनारे हट गया और वह अपनी ढलती उम्र को छुपाकर जवान लड़कियों की झुंड में जा मिलीं।

मुझे तो अब शक होने लगा कि भगवान ने मेरी जोड़ी बनाई भी है या नहीं। यदि बनाई है तो पता नहीं उसे किस शहर में पैदा कर दिया। अब बिना अता-पता के मैं कहाँ उसे ढूँढता फिरूँ। 


जब मुझे लगता है कि कोई भी कन्या मुझे लाईन देने के लिए तैयार नहीं, तब निराश होकर मैं खाने वाले स्टाल की ओर बढ़ जाता हूं और स्वादिष्ट व्यंजनों पर टूट पड़ता हूँ। इस तरह एक और अवसर मेरे हाथ से निकल जाता और मैं अगली बारात में फिर किस्मत आजमाने की नई तरकीब सोचता हूँ। अब आपलोग ही दुआ कीजिए कि अगली जो 55वीं शादी में मैैं भाग लूं उसमें दूल्हा बनकर घोड़ी पर बैैैेठने का सौभाग्य मुझे ही मिले और आप लोग मेरी बारात में शामिल हों, फिर बैंड पर यही धुन जोर से बजे- “आज मेरे यार की शादी है….”

हालांकि मेरा प्रयास निरंतर जारी है और मुझे पूरा यकीन है कि एक दिन दूल्हा बनने की मेरी तमन्ना भी अवश्य पूरी होगी। बस दिन-रात ऊपर वाले से यही दुआ करता हूँ-

“मेरी भी तो शादी करा दे, दो-चार नहीं बस एक दिला दे….”

-विनोद प्रसाद, पटना

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