मन का मिलन (भाग 2) – सीमा वर्मा : Moral Stories in Hindi

फेसबुक बन्द कर के  गहरी उधेड़बुन में डूबी हुई शिवानी स्मृतियों के उलझे हुए संसार में जा पँहुची है।

यह कैसा मोह ? कैसी अपेक्षा ? है इस उम्र में एक शादीशुदा स्त्री का किसी गैर मर्द के साथ दोस्ती … का आग्रह  ?

सन्न रह गई वह अपनी इस हरकत पर बिल्कुल चुप … या यों कंहे जड़वत सी।

उसने अपनी आंखो को दोनों हथेलियों से ढ़क लिया जैसे अपने-आप से ही छिपना चाह रही हो…।

क्या सच में छिप पाई ?  शिवानी खुद अपनी ही प्रतिबिंब से… ‘नहीं …नहीं ना’।

आखिर उसने गलत क्या किया शादी से बहुत पहले कॉलेज में जब वह अपने आप में ही सिमटी- सकुचाई सी रहती थी।

तब सुशांत ने ही तो दोस्ती का हाथ बढ़ा कर उसके सपनों के ‘ प्रथम पुरुष ‘ के रूप में मन के दरवाजे पर हौले से  दस्तक दी थी।

जिन्दगी ने उसे चुनाव का अधिकार ही नहीं दिया था।

अगर वक्त ने अवसर दिया होता तो उसने सुशांत ही को तो चुना होता ! 

फिर अब ऐसा क्या बीत गया इस दर्मियान ?

कि पुनः उसकी अपेक्षा करना भी अपराध है ?

इस सोच के साथ ही वह कॉलेज के दिनों में चली गई…

कॉलेज में उससे एक साल सीनियर था।

हाँ बनर्जी हुआ करता था ‘सुशांत बनर्जी ‘

तब शिवानी नई-नई को एड कॉलेज में आई थी सहमी हुई रहती थी। 

लड़के-लड़कियों के एक साथ पढ़ने का उसका नया और पहला रोमांच था।

अपनी वेशभूषा और सहमेपन से भीड़ से बिल्कुल अलग थलग दिखती थी।  

ऐसे  में एक दिन सुशांत ने ही आगे बढ़कर अपनी स्वच्छ मुस्कान बिखेरते हुए पूछा था ,

” आइ एम सुशांत बनर्जी तुम्हारा नाम ?”

” ‘ शिवानी… शिवानी मेहरा ‘ लगभग हकलाते हुए कहा था।

” तुम बहुत अच्छी हिन्दी बोलती हो जब कभी जरूरत हो मुझसे बेझिझक नोट्स ले लिया करना तुम्हारा सीनियर हूँ “

“ओके ! और कह कर उसने हौले से मुस्कुरा भर दिया था।

सुशांत से नोट्स लेने और बातें करने के लिए क्लास की लड़कियों में होड़ सी मची रहती थी।

जबकि शिवानी इतने में ही खुद को कोसने लगी थी ,

” क्या जरूरत थी उसे इतना आगे बढ़कर बातचीत करने की ?”

” क्यूँ नहीं अनदेखा करके आगे बढ़ गई “

अगर शिवानी सच कहे तो उसे भी लुत्फ़ आने लगा था।

यह तो वह आज इतने दिनों बाद समझ पाई है।

कि वो भी कंही दिल के कोने में सुशांत के प्रति वही भावना रखती थी। एक -एक करके अतीत के पन्ने पृष्ठ दर पृष्ठ खुलते गये…।

उन दिनो कैसे उन दोनों की दोस्ती जंगली घांस की तरह पनपती चली गयी थी ?

” मुझे लाईब्रेरी जाने से बचाने के लिए वह किताबों की लाइन लगा देता मेरे सामने “

मैं  हैरान हो उससे कहती ,

” सुशांत तुम तो वाकई दूसरों से अलग हो “

वह मुस्कुरा देता ,

” हाँ जहाँ बाकी के सारे फिल्मी गॉसिप, गानों और मौज मस्ती की बातें करते हैं वहाँ मैं राजनीति, सामाजिक चिंतन की बातें किया करता हूँ क्यों यही ना ? “

” हाँ… ” और शिवानी पलट कर चल देती।

घर से निकलने समय भाई के दिए इन्ट्रक्शन याद आ जाते उसे ,

” कॉलेज में किसी लड़के से बात की तो देख लेना टाँगें तोड़ दूंगा “

फिलहाल … आज तो वह सोच कर ही हठात् होठो पर मुस्कान आ गई… है।

फिर न जाने कब सुशांत ने दोस्ती की सीमा से आगे अपनी हद को बढ़ाते हुए प्रेम की ज़द में आने की कोशिश करता हुआ एक दिन बोल उठा… ,

” देखो शिवानी मैं सब साफ-साफ कहता हूँ और शायद  तुम्हें इसका अंदाजा भी हो,

” मेरी आंखे तो क्या रोम-रोम में तुम्हारे लिए जो भरा है उसे अगर सिर्फ और सिर्फ एक लफ्जों में बयाँ करना हो तो वह है ‘ प्यार ‘ ” ।

उस क्षण शिवानी अंदर ही अंदर सुलग… उठी थी सुशांत को एक वफादार दोस्त से प्रेमी बनते देख कर।

फिर उसने क्या जबाब दिया था ?

यह याद करने का प्रयास कर ही रही थी कि…

अचानक फोन की घंटी बज उठी।

जिसके साथ ही शिवानी एक झटके से वर्तमान में आ गई।

फोन शायद सुधीर का हो ?

तत्परता से उसने फोन उठाया देखा बिटिया  का है ,

” हैलो … ममा… “

             क्रमशः

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सीमा वर्मा /नोएडा

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