लग्न भ्रष्टा – सुधा शर्मा

आते ही शिवनाथ बोले,”क्या बात है इतनी जल्दी में क्यों बुलाया? तबियत तो ठीक है? ”  ‘जल्दी ही तो है समय ही तो नहीं है ‘मन मे कहा गौरी ने।बोली,” सब ठीक है ।आज आप को खाना खिलाने का बहुत मन था।बैठो न।आज मैंने सब कुछ आपकी पसंद का बनाया है ।’

कितना सकूँ मिलता है न अपने प्रिय जन को अपने सामने बिठा कर खिलाने मे ।सोचती जा रही थी  वह। इस सुख से अब मै हमेशा के लिये वंचित होने वाली हूँ ।गले मे जैसे कुछ फंस रहा था ।उनके हाथ धुलाकर साड़ी का पल्लू दे दिया हाथ पोछने को। ‘क्या बात है ? मुझे नहीं बहला  सकतीं तुम झूठी हँसी से। ‘ ‘तुम से अधिक कौन जान सकता है मुझे ।’ मन मे ही बुनती गुनती जा रही थी वह।

चुपचाप जमीन पर उनके पैरों के पास बैठ गयी।उसके सिर पर हाथ रखकर कहा ‘मुझे भी नही बतायेगी ?”

  अब उसके सब्र का बांध टूट गया  उनकी गोदी में सिर रखकर फूट फूट कर रोने लगी ।तुमने भी तो मुझे कहा बताया ।  वे उसके सिर पर हाथ फेरते रहे। ‘अब ठीक है ?बता मुझे।” नही कमजोर नहीं  पडना है। एकदम से चुप हो कर बोली ‘ ऐसे ही दिल भर आया था । आप थोड़ी देर और बैठो न ”   वे बैठे थे वह उनकी गोद में सिर रखे थी।तूफान उठ रहे थे मन मे ।इन मुट्ठी भर  पलों को   जी भर के जीने की कोशिश कर रही थी  और फिर बांध कर रख लेगी अपने आँचल में, इस अनमोल धरोहर को।

  जैसे कुछ याद आया एकाएक उठ कर बोली ‘देर हो गयी ।चलो फिर आप । ‘ ‘फिर मिलता हूँ ।” अलविदा हमेशा के लिये ।आखिरी बार

उन्हें दूर तक जाते हुए देख रही थी ।कलेजा जैसे फटा जा रहा था।

              शिवनाथ का मन जाने कैसा कैसा हो रहा था। अजीब सी मनोदशा जिसे वह खुद भी समझ नहीं  पा रहे थे।

       अचानक उमा पास आकर बैठ गयी ।कयी दिनों से नाराज थी ।पति पत्नी मे बातचीत बंद थी। वह घर छोड़ कर जाने वाली थी हमेशा के लिए ।



            उन्होंने उसकी ओर देखा ।उसने उनके हाथ में एक पत्र पकडा दिया ।बहुत उदास लग रही थी।पत्र मे लिखा था।

          आदरणीय दीदी

     कैसे शुरू करूँ नहीं समझ पा रही जैसे ही

मुझे पता चला कि  मै अभागी  आपके  सुखी जीवन के बिखरने का कारण बन रही है मै चैन नही पा रही ।मर्मान्तक पीड़ा झेल रही हूँ मै।

कहीं कोई गलत है तो मै हूँ   मुझे नही पता कैसे और क्यों मेरा मन उन की ओर खिचता चला गया।पर मेरे मन मे उनका स्थान मंदिर जितना ही पवित्र है।

    उन्होंने तो बस मेरी भावनाओं का सम्मान किया ।मुझ अनाथ असहाय का सुख दुख मे साथ दिया  ।प्यार वे आपसे करते है बेहद करते है।न तो कभी उन्होंने आपकी जगह मुझे  देने के बारे मे सोचा न मैने ।

 कभी उन्होंने मेरी   भावनाओ को  दूषित नहीं किया ।

पर ऐसे पवित्र रिश्ते की कल्पना शायद लोग कर ही नही सकते।इसलिये ही शायद किसी ने  हमारे रिश्ते को आपके सामने गलत रूप मे दर्शाया होगा।

आप लोगों का रिश्ता मेरे कारण टूट रहा है यह सोच कर मै भयानक यन्त्रणा से गुजर रही  हूँ ।मै उनको बिना  कुछ कहे बिना कुछ बताये आप लोगों से दूर जा रही हूँ  मुझे खुद ही पता नहीं कहाँ ।

            मै तो  शायद एक लग्न भ्रष्टा हूँ जिसका किसी जन्म में कहीं कुछ छूट गया था ।  बस  गौरी

        ‘उसे रोक लो ; मुझे माफ करदो शिव।” ” तुम्हे नही पता  यह फैसला लेने मे कितनी मानसिक यंत्रणा से गुजरी है , मैने देखा है ।अब और नहीं ।जाने दो उसे । टूट टूट कर जुड भी जाती है कभी जिंदगी ।” एक गहरी सांस ली उन्होंने ।

मौलिक स्वरचित

सुधा शर्मा

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