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क्या आपके घर मे बाप भाई नही –  संगीता अग्ग्र्वाल

” जल्दी चल यार पिक्चर मिस हो गई ना तो तुझे छोडूंगी नही , हर बार इतना समय लगा देती है तैयार होने मे !” बस मे चढ़ती कृतिका अपनी दोस्त शानवी से बोली। ” अरे यार नही निकलेगी क्यो टेंशन ले रही है !” शानवी बोली और दोनो दोस्त बस मे चढ़ गई अपना गुलाबी टिकट ले कंडक्टर से शान से चलती हुई जा रही थी। पर ये क्या बस तो पूरी भरी हुई है …अब क्या …? ” यार क्या खड़े हुए जाना होगा इतनी दूर ..इतना तैयार होने का फायदा क्या फिर !” शानवी मुंह बनाती हुई बोली। ” अरे खड़े होकर क्यो आखिर हम लेडीज सवारी है हमारा हक है सीट पाना !” कृतिका ने कहा और सच मे लेडीज सवारी होने का फायदा उठा सीट खाली करा ली। क्या हुआ जो कॉलेज मे बराबरी का झंडा सबसे ज्यादा बुलंद करती है कृतिका जब जरूरत हो तब तो लेडीज होने का फायदा लिया ही जा सकता है ना। दोनो सहेलियाँ हँसते हुए सीट पर बैठ गई और ठहाके लगा हँसने लगी ।

पूरी बस उनके ठहाको से गूँज रही थी। जिन लड़को को उठा कर उन्होंने सीट हथियाई थी वो वही पास खड़े बतिया रहे थे कि अचानक सभी को जोर का झटका लगा शायद बस किसी पत्थर से टकराई थी। जो लड़के कृतिका , शानवी के पास खड़े बात कर रहे थे उनमे से एक का हाथ कृतिका की फ़टी जीन्स (थी तो डेमेज़ पर घुटनो से ऊपर तक काफी हिस्से से गायब थी तो उसे फ़टी कहना ज्यादा सही होगा) मे से झांकती उसकी टांग से टकरा गया। ” माफ़ करना मैडम वो झटका इतना तेज था कि !” उस लड़के ने तुरंत माफ़ी भी मांग ली। ” तड़ाक…. बहुत अच्छे से समझती हूँ तुम जैसे लड़को को छूने का बहाना चाहिए तुम्हे …तुम्हारे घर मे माँ बहन नही है क्या जो यूँ बसों मे लड़कियों को छेड़ने को चढ़ते हो !” कृतिका उसे थप्पड़ मारती हुई जोर से गुर्राई। अब क्योकि कृतिका लड़की थी और ऐसी परिस्थिति मे हमारे समाज़ मे गलती भले लड़की की हो तब भी आसपास के लोग लड़की के पक्ष मे कूद पड़ते है यहाँ भी वही हुआ पूरी बस कृतिका के समर्थन मे बोल पड़ी और उस लड़के प्रशांत को भला बुरा कहने लगी एक दो ने तो हाथ भी साफ कर दिया प्रशांत पर।

” बस कीजिये आप लोग आप सबको दिखाई नही दे रहा क्या कि बस ने कितनी जोर से झटका खाया ऐसे मे हाथ लग गया फिर भी मैने माफ़ी मांग ली पर आप लोग …आप लोगो को हमेशा गलती लड़के की नज़र आती है …क्या लड़के ही गलत होते है …लड़कियां हर जगह लड़की होने का फायदा उठा जाती है फिर भले बस , ट्रैन मे सीट की बात हो या किसी लड़के को गलत साबित करना हो …गलती से भी हम लड़को का हाथ किसी लड़की को छू जाये यही कहा जाता तुम्हारे घर मे माँ बहन नही …अरे पक गये हम ये बात सुनते सुनते हमारे घर मे तो माँ बहन सब है और हम औरत की इज़्ज़त भी करना जानते है पर शायद आपके घर मे बाप भाई नही तभी आपको हर लड़का गलत लगता है वरना उन लोगो के साथ भी ऐसा होता होगा ना तब आप क्या करती है और आप सब जो मैडम के बोलने भर से मुझपर टूट पड़े आपके सामने ऐसी सिचुएशन आती तो आप क्या करते ।



बस , ट्रेन मे ये नॉर्मल है की झटका लगे और हम किसी से छू जाये ये किसी लड़की के साथ भी हो जाता है पर हम लड़के तो नही कहते की आपके घर मे बाप भाई नही है क्या फिर हमसे क्यो हमेशा यही कहा जाता है कि तुम्हारे घर मे माँ बहन नही क्या अरे हमारा स्वाभिमान नही है क्या जो कोई भी कुछ भी बोल दे और हम बर्दाश्त करे !” आखिरकार प्रशांत फट पड़ा क्योकि अक्सर वो ऐसी परिस्थिति का सामना करता था ज्यादातर सभी लड़के करते है पर अफ़सोस किसी को ये दिखाई नही देता कि उन लड़को पर क्या बीतती होगी। ” चल यार शांत हो जा !” प्रशांत के साथ के लड़के ने उसे शांत कराते हुए कहा।

” क्या शांत हो जाऊं मैं यार नीरज …और कब तक शांत रहूँ क्या हम इंसान नही , क्या हमें दर्द नही होता , क्या हमारी इज़्ज़त नही क्या हममे स्वाभिमान नही ? बस ट्रेन मे हमें झट से उठा दिया जाता है वो भी इतना रुडली । वैसे हर जगह बराबरी का झंडा बुलंद होता है पर जहाँ महिला होने का फायदा उठाया जा सके ये लोग झट से उठा लेती है । यहां बस मे पैसे देकर चढ़ने पर भी बेइज़्ज़त कर सीट से उठा दिया जाता है क्यो ? जब बात बराबरी की है तो ये खड़े हो सफर क्यो नही कर सकती जरूरत मंद के लिए हम लड़के खुद सीट छोड़ देते है इतने संस्कार है हममे । लड़की की इज़्ज़त करना हम भी जानते है पर लड़के होने का नुकसान कब तक सहेंगे हम कब तक बेइज़्ज़ती सहेंगे हम ?” प्रशांत के इतना बोलते ही पूरी बस के साथ साथ कृतिका और शानवी की निगाह भी झुक गई। सभी अपनी अपनी सीट पर वापिस बैठ गये। ” चल अपना स्टॉप आ गया !” उस लड़के नीरज ने प्रशांत से कहा।

” मैडम अगली बार किसी लड़के को गलत ठहराने से पहले ये जरूर सोचियेगा उसके घर मे माँ बहन हो ना हो आपके घर मे बाप भाई जरूर होंगे और ये जो थप्पड़ आज आपने मुझे मारा है ना वो कल आपके बाप भाई को भी पड़ सकता है !” प्रशांत ये बोल बस से उतर गया । कृतिका को अपने किये पर अफ़सोस हो रहा था अब क्योकि कहीं ना कहीं उसे भी प्रशांत का गुस्सा सही लगा था । वो शानवी के साथ वहीं उतर गई क्योकि अब फिल्म देखने का उत्साह खत्म हो चुका था इसलिए उन दोनो ने वापसी की बस पकड़ ली। दोस्तों ऐसा अक्सर होता है चलती बस ट्रेन मे किसी लड़के का हाथ अनजाने मे छू जाये तो उसे बेइज़्ज़त किया जाता है भले वो माफ़ी मांग ले । क्या ये सही है अनजाने मे तो ये किसी के साथ भी हो सकता है लड़की के साथ भी बल्कि होता है तब कोई लड़का उसे बेइज़्ज़त नही करता । यहां मैं ये नही कह रही हर लड़का सही होता है पर हर लड़की सही हो ये भी तो जरूरी नही। अनजाने मे हुई गलती के लिए किसी लड़के को शर्मिंदा करना कहाँ तक सही है । मेरी कहानी को ले आपकी क्या राय है बताइयेगा जरूर?

आपकी दोस्त

संगीता अग्ग्र्वाल

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