खानदान की नाक – गीता वाधवानी : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : राशि ने रो रो कर पूरा घर सिर पर उठा रखा था। वह 12वीं के बाद आगे पढ़ना चाहती थी। वह पढ़ाई और खेलकूद में हमेशा फर्स्ट आती थी। 12वीं में भी उसके 98% नंबर आए थे। 

राशि का परिवार एक गांव में रहता था। उसका भाई अविनाश भी पढ़ने में बहुत अच्छा था। वह भी चाहता था कि राशि आगे पढ़ाई जारी रखे। उन दोनों की मां रंजना भी यही चाहती थी। लेकिन राशि के पिता और दादा जी दोनों राशि का विवाह करवाना चाहते थे। 

राशि के दादाजी बहुत कठोर थे और लड़कियों की पढ़ाई के खिलाफ बातें करते थे। वह राशि की मां पर दबाव डालते थे कि जितनी पढ़ाई करनी थी कर ली, अब राशि को घर का कामकाज सिखाओ। मैंने लड़के वालों से बात कर ली है। वे लोग किसी भी दिन उसे देखने आ सकते हैं। 

राशि ने जब यह बात सुनी तो शादी के लिए साफ मना कर दिया। उसे दिन राशि और उसकी मां रंजना की भी खूब पिटाई की गई। दोनों पर थप्पड़ और घूंसो की बरसात की गई। दोनों एक दूसरे को दिलासा देते रात भर रोती रहीं। 

रंजना सोचती थी कि मैं तो पढ़ नहीं पाई, पर राशि को बहुत पढ़ना है। मैं उसका जीवन बर्बाद होने नहीं दूंगी। उसे अपने पैरों पर खड़ा करके ही दम लूंगी। फिर रंजना ने मन ही मन कुछ निर्णय लिया और अगले दिन से सब कुछ नॉर्मल हो गया। 

राशि ने घर का काम सीखना शुरू कर दिया। पिता और दादाजी भी खुश थे कि मां बेटी ने पढ़ाई की जिद छोड़ दी है। 

सप्ताह भर बाद लड़के वाले भी आ गए और राशि को पसंद करके शादी के लिए हां कर दी। 

दादा जी तो राशि की शादी और उसे घर का काम करते देखकर बेहद खुश थे। उन्होंने बहू के हाथ में नोटों की गड्डी देते हुए कहा-“जाओ बहू, दोनों शहर जाकर कपड़ों की खरीदारी कर लो, शादी के लिए। राशि को जो पसंद हो ,दिलवा देना।” 

दोनों ने शॉपिंग की और वापस आने में देर हो गई। पिता और दादा दोनों घर के आंगन में चक्कर काट रहे थे और बार-बार अविनाश से कह रहे थे कि तू भी साथ चला जाता। 

दोनों के वापस आते ही दादाजी उन पर चिल्लाने लगे की देर क्यों हो गई। तब राशि ने बड़ी ही चालाकी और समझदारी से दोनों को सुंदर-सुंदर कुर्ते पायजामे उपहार में देकर उन्हें मना लिया। अब जब भी खरीदारी में उन लोगों को देर होती थी तो बाप बेटा निश्चिंत होकर बैठे रहते थे कि आ जाएंगी, खरीदारी में देर तो हो ही जाती है। 

एक बार रंजना की तबीयत ठीक नहीं थी, तो उसने अविनाश के साथ राशि को बाजार भेज दिया था। धीरे-धीरे शादी की तारीख निकट आती जा रही थी। 

 एक दिन रंजना तबीयत ठीक ना होने के कारण देर तक सोती रही और राशि भी सो रही थी। उसके पिता उसे जगाने के लिए कमरे में गए तब वहां राशि नहीं थी। वहां सिर्फ एक पत्र रखा था-“दादाजी और पिताजी, मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। अभी शादी नहीं करनी मुझे, इसीलिए मैं आगे पढ़ने के लिए इस घर से जा रही हूं 

अब कुछ बनकर ही वापस आऊंगी। 

आपकी बेटी राशि 

अब तो घर में तूफान आ गया। रंजना को सब कुछ पता होगा, यह सोचकर उसे खूब मारा पीटा गया और वाकई में उसे सब कुछ पता था। उसे यह भी पता था कि राशि को चुपचाप यहां से भेजने के बाद, उसकी खुद की हड्डियां  तोड़ी जाएंगी, पर उसने बेटी के भविष्य को संवारने की खातिर सब कुछ सहन करने की ठान ली थी। 

दादाजी चिल्ला रहे थे-“हमारे खानदान की नाक कटवा दी, खानदान का नाम मिट्टी में मिला दिया । आज से और अभी से राशि मर गई हमारे लिए। पढ़ाई करे या कहीं भी जाकर मरे, हमारा उससे अब कोई लेना-देना नहीं। इस घर के दरवाजे उसके लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं वह अब यहां नहीं आ सकती।” 

सुबह से अविनाश कहीं नजर नहीं आ रहा था। जब वह आया तो मां की हालत देखकर गुस्से में फूट पड़ा-“पिताजी, अपने मन को कितनी बुरी तरह मारा है, जगह-जगह उसके शरीर से खून बह रहा है। आपको शर्म नहीं आती।” 

पिता-“अपनी मां की साइड ले रहे हो अविनाश, तुम्हें पता भी है कि इसने राशि को घर से भागने में उसकी मदद की है। और राशि कहां है यह सब कुछ जानती है पर बता नहीं रही।” 

अविनाश-“सच जानना है आपको, मैं सब सच बताता हूं आपको क्योंकि मैं भी इसमें शामिल हूं। आइये मारिये, मुझे भी।”(रंजना ने अविनाश को चुप रहने का इशारा किया) 

अविनाश ने कहा-“नहीं मां, अब मैं चुप नहीं रहूंगा अब बहुत हो गई इनकी मनमानी, राशि ने किसी गलत बात के लिए थोड़ी ना जिद की थी। हां पिताजी, मैं खुद छोड़कर आया हूं उसे दूर शहर हॉस्टल में। शादी के शॉपिंग के बहाने हॉस्टल की तैयारी शुरू हो गई थी। कहिए क्या कहना है आपको। वह घर से भागी नहीं है पढ़ने के लिए गई है। कुछ बनकर ही वापस आएगी।” 

दादाजी-“कुछ बने या ना बने, अब उसे हमारा कोई रिश्ता नहीं, उसे हम इस घर में नहीं आने देंगे। हमारे खानदान की नाक कटवा दी उसने।” 

अविनाश-“अगर आप प्यार से उसे पढ़ाई के लिए इजाजत दे देते,तो हम ऐसा कदम उठाते ही क्यों? गलती आपकी है उसकी नहीं।” 

उधर राशि मन लगाकर पढ़ाई करती रही और अविनाश उसे पैसे भेजता रहता था। कभी-कभी उससे मिलने भी जाता था और उसका पूरा हाल-चाल अपनी मां को बताता था। रंजना उसके लिए बहुत खुश थी। पिता जी और दादा जी उसके बारे में कभी कोई बात नहीं करते थे और ना ही उसका हाल-चाल पूछते थे। उनके लिए राशि से बढ़कर खानदान की नाक थी।

साल पर साल बीतने लगे। 

एक दिन अचानक खबर आई की गांव की  नई कलेक्टर साहिबा रंजना से मिलना चाहती है। बाप बेटा(पिताजी और दादाजी) बहुत हैरान थे और खुश भी थे। हैरान इसीलिए थे कि इतनी ऊंची पोस्ट वाली औरत रंजना से क्यों मिलना चाहती है। खैर , फिर भी उन्होंने कलेक्टर साहिबा के स्वागत की तैयारी की और जैसे ही वे अपनी गाड़ी से उतरीं उन पर फूल बरसने लगे , उनका चेहरा देखते ही दोनों के हाथ रुक गए। अरे! यह तो राशि है, हाथ रुकते रुकते फिर फूल बरसने लगे। सब लोग राशि का बहुत सम्मान कर रहे थे। राशि गाड़ी से उतरकर अपनी मां से मिली। दोनों की आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। मां का त्याग, हिम्मत और बेटी की लगन रंग लाई और अब पिताजी और दादाजी आगे बढ़  बढ़ कर लोगों से कह रहे थे-“हमारी बिटिया है, हमारी लाडो, कलेक्टर बनकर इसने तो हमारे खानदान का नाम रोशन कर दिया। खानदान की नाक ऊंची कर दी इसने। बहुत मेहनती है हमारी लाडो। शाबाश बिटिया शाबाश, जुग जुग जियो।” 

गांव के जान पहचान वाले लोग, जिन्हें पूरी बात का पता था, वे सब मुस्कुरा रहे थे। 

स्वरचित अप्रकाशित गीता वाधवानी दिल्ली

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