एक सबक – पुष्पा जोशी : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : बेटा जुगल आज दिल बहुत घबरा रहा है, किसी काम में मन नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है कि कोई अपना मुसीबत में है।’ विश्वनाथ बाबू ने अपने बेटे से कहा तो वह बोला – ‘बाबा आप यूहीं चिन्ता कर रहे हैं। हम सब ठीक है, कल ही दीदी को फोन लगाया था। वहाँ भी सब ठीक है, आप‌ कहै तो मैं अभी फिर फोन लगा देता हूँ।’ ‘नहीं बेटा तुम कह रहे हो तो जानकी के यहाँ कुशल मंगल ही होगा।

बेटा कहीं गाँव में दादा के यहाँ तो कोई परेशानी में नहीं है, मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।’ जुगल ने कहा- बाबा अब उनसे हमारा क्या संबंध है, सब संबंध तो तोड़ दिए उन्होंने हमसे, धोखे से सारा मकान और जमीन अपने नाम करवा लिए। सालभर का अनाज भेजते थे वह भेजना भी बंद कर दिया। साल भर से तो चिट्ठी पत्री का संबंध भी नहीं रहा।’     ‘बेटा वे कुछ समझे ना समझे, मेरा उनके साथ खून का रिश्ता है, मैं गाँव जाना चाहता हूँ, तू मुझे बस में बिठा दे।’  ‘बाबा मैं आपको अकेले गाँव नहीं जाने दूंगा।

बस से उतरने के बात भी बहुत‌ पैदल चलना पढ़ता है। कल की छुट्टी ले लेता हूँ और कल गाड़ी से आपके साथ गाँव  चलूँगा। अब मैं जाऊँ? ‘वह पुलिस कान्सटेबल की नौकरी करता था। ‘ठीक है बेटा कल मुझे गाँव ले चलना।’ विश्वनाथ जी ने रात बहुत बैचेनी में काटी,सुबह वे जुगल के साथ गाँव गए। घर जाकर देखा तो वहाँ का दृश्य देखकर कांप गए। यह क्या भुवन की अर्थी घर के आंगन में रखी थी, भीड़ जमा थी और पुलिस पूरण के हाथों में हथकड़ी डाले खड़ी हुई थी। विश्वनाथ जी के दादा रामेश्वर और भाभी लीला देवी का रो-रो कर बुरा हाल था। 

विश्वनाथ बाबू अपने दादा के पास गए तो वे उनके कंधे पर ढुलक गए बोले – मैं बरबाद हो गया विशू ! अच्छा हुआ तू आ गया भाई, मैं किस मुँह से तुझे बुलाता, वे रोते जा रहै थे और कह रहै थे, मैंने तेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया भाई, मुझे माफ करना, मेरे बुरे कर्मो की सजा ईश्वर मुझे दे रहा है।’   ‘दादा! अभी यह बात करने का समय नहीं है, आप मुझे बताओं हुआ क्या है? ‘ ‘कल रात को खेत से आते समय किसी ने भुवन की हत्या कर दी और साजिश रच कर पूरण का नाम फंसा दिया।

भुवन और पूरण का आपस में किसी बात को लेकर झगड़ा जरूर होता था, मगर पूरण उसकी हत्या नहीं कर सकता, इतना तो मुझे अपने खून पर विश्वास है। तुम्हीं बताओ एक भाई दूसरे भाई का खून कैसे कर सकता है?’ ‘आप चिन्ता न करें ताऊजी,मैं थाने में जाकर सारी स्थिति समझता हूँ,और पूरण  की बेल करवाता हूँ।  वो निर्दोष हैं तो मैं उन्हें सजा नहीं होने दूंगा।

बाबा आपके पास रहेंगे आप जरा भी चिन्ता ना करो, मैं माँ को भी गाँव भेज देता हूँ।आप हिम्मत रखो ताऊजी हम सब आपके साथ हैं। तारा दीदी को खबर‌ की या नहीं ?’ ‘बेटा !वो भी शाम तक गाँव आ जाएगी।’  विश्वनाथ जी के आने से रामेश्वर जी को कुछ हिम्मत आ गई थी। भारी मन से भुवन का अंतिम संस्कार किया गया। पूरण को पुलिस पकड़ कर ले गई थी। जुगल ने थाने में जाकर तलाश की बड़ी मुश्किल से उसकी जमानत कराई। थाने में कैस‌ फाइल हुआ।  खोज खबर की गई । सबसे पूछताछ की।

रामेश्वर बाबू ने बताया कि अभी  छह महिने पूर्व गॉंव में दंगल का आयोजन किया गया था। भुवन का बलिष्ठ बदन था, वह रोज कसरत करता था और उसे दंगल का बहुत शोक था। इस वर्ष उसने भी दंगल में भाग लिया गॉंव के सरपंच का बेटा राकेश जो हर वर्ष विजेता का‌ खिताब हॉसिल करता था, उसे इस साल भुवन ने हरा दिया था। अपनी हार राकेश को गंवारा नहीं हुई और वह भुवन से खार खा रहा था।

उससे बदला लेने की सोच रहा था। भुवन और पूरण में किसी बात को लेकर मतभेद चल रहा था। राकेश और उसके साथियों ने इनके झगड़े को हवा दी, और ये बीच सड़क पर मरने मारने‌ को उतावले हो गए। एक दिन मौका देखकर जब भुवन खेत से घर आ रहा था और अकेला था। रात का समय था किसी ने उसकी हत्या कर दी, और छुरे को ले जाकर पूरण के कमरे में छुपा दिया और पुलिस को भुवन के मरने की सूचना दी

कि उसने भुवन की लाश को देखा और पुलिस को सूचना दे रहा है।  कुछ लड़कों ने बताया कि भुवन और उसके भाई का हर समय झगड़ा चलता है।पुलिस ने शक  के आधार पर से पूरण के कमरे की तलाशी ली,जब जांच पड़ताल की तो छुरा पूरण के कमरे से मिला तो उसे गिरफ्तार कर लिया, वह चिल्लाता रहा कि उसने भाई को नहीं मारा मगर किसी ने एक न सुनी। 

जुगल ने अनुरोध किया कि केस की अच्छी तरह छानबीन की जाए, पूरण अपने भाई की हत्या नहीं कर सकता है। पुलिस की कड़ी कार्रवाई से डरकर राकेश के कुछ मित्रों ने सही बात बतला दी। अब राकेश से पूछताछ शुरू हुई, पुलिस की सजा और सख्त कार्यवाही से वह घबरा गया और उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया। पूरण बाइज्जत बरी हो गया। अब रामेश्वर जी को  खून के रिश्ते का महत्व समझ में आ गया था।

उन्होंने  विश्वनाथ जी से कहा ‘भाई! तेरी जमीन और मकान में तेरा हिस्सा तू लेले।’विश्वनाथजी ने  मना कर दिया, बस इतना कहा -‘दादा आगे से कोई भी तकलीफ हो मुझे पराया मत समझना, मुझे जरूर बताना।’ रामेश्वर बाबू फूट-फूट कर रोने लगे, बोले -‘मेरा तुम्हारे सिवा है‌ कौन?’ पूरन ने कहा -‘काका जी !आप उस जमीन को ले या न ले मैंने वह जमीन जुगल के बेटे राजा‌ नाम कर दूंगा।

काकाजी मुझे मालुम हो गया है, कि जरूरत पढ़ने  पर अपना‌ खून  ही काम आता है। आप जब तक गाँव में थे , किसी की हिम्मत नहीं थी, कि हमारी तरफ ऑंख उठाकर देखे। हमारे लालच से हमारा घर बिखर गया था, उस लालच को छोड़कर मैं फिर से साथ रहना चाहता हूँ, काका जी! एक भाई खो चुका हूँ अब जुगल भाई को खोना नहीं चाहता। मुझे इस घटना से एक सबक मिल गया है। कल को मेरी शादी होगी, बच्चे होंगे,मैं बच्चों को यही शिक्षा दूंगा, कि बेटा राजा और तुम हमेशा मिलजुल कर रहना क्योंकि खून का रिश्ता बहुत मजबूत होता है।’ पूरन की बातें सुन सभी के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे थे। 

प्रेषक-

पुष्पा जोशी

स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित

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