दलाल – विनय कुमार मिश्रा

दो जरूरतमंद लोगों को आपस में मिलाकर उनके बीच का कमीशन कमाता हूँ। दलाल शब्द मुझे अच्छा नहीं लगता मगर पेशे से दलाल ही हूँ। इसी कमीशन से मेरा घर चलता है। मोहल्ले की एक ताई को एक किराएदार चाहिए। मगर परिवार वाला। और एक परिवार को किराए पर घर चाहिए जहाँ किचकिच ना हो.. कम पैसे में सेपरेट। दोनों को आज मिला दिया। किराएदार घर देखने अपने परिवार के साथ आया है। पूरा परिवार घूम घूम कर घर देख रहा है और ताई पूरे परिवार को घूर घूर कर।

“जी घर तो अच्छा है.. पानी तो बराबर रहता है ना?”

“ताई के घर में बिजली और पानी की कोई दिक्कत नहीं” मैंने अपने चिरपरिचित अंदाज में बोला

“जी बाकी सब तो ठीक है पर दस हजार ज्यादा है।घर भी थोड़ा पुराना है.. मैं आठ हजार दे पाऊँगा इसका और एडवांस भी दो महीने का ही” मुझे पता था ताई मानेंगी नहीं और मानना भी नहीं चाहिए, आखिर ये घर का किराया उनका बड़ा सहारा है और मेरा कमीशन भी तो कम हो जाता।

“ठीक है” ताई थोड़ी उदास हो बोली। ताई की हामी सुन मैं आश्चर्य से उनके पास गया और धीरे से बोला

“क्या बोल रही हैं ताई? मैं कल दूसरा किराएदार देखता हूँ”

“अरे तू देख नहीं रहा है,कितने प्यारे बच्चे हैं, लग रहा है मेरे बेटे का परिवार आ गया है, समझूँगी दो हज़ार बच्चों पर खर्च कर रही हूँ” ताई अब भी प्यार से परिवार को देखे जा रही थी..जैसे सच में उनका..! मैं समझ गया आज मेरा घाटे का दिन है

“मैं क्या बोल रहा हूँ माँ जी, आप उदास ना होइए दस हज़ार उतना भी ज्यादा नहीं.. किचेन एरिया बहुत अच्छा लगा पत्नी को..हम कल शिफ्ट हो जायेंगे” वो दस हजार के हिसाब से दो महीनें का एडवांस दे जाने लगे। मैं भी उनके साथ निकल गया

“ताई तो आठ हजार पर मान गई थी..फिर आपने..!” मुझ जैसे दलाल को इनकी बात समझ नहीं आ रही थी

“जी किराये के घर में  माँ कहा मिलती हैं..”

आज पहली बार दो जरूरतमंदों को मिलाकर खुशियां कमाई हैं मैंने..!

विनय कुमार मिश्रा

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