बुढ़ापे की ज़िद – शिप्पी नारंग : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : “पापा भसीन अंकल आए हैं” बहू युक्ति ने दीपक कोहली, अपने श्वसुर से कहा जो अपने कमरे में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। “अच्छा अच्छा भेज दो यहीं पर ज़रूर घर पर कोई बात हुई होगी।” “जी पापा मूड थोड़ा ऑफ लग तो रहा है अंकल का । ठीक है मैं उन्हें यहीं भेज देती हूं” युक्ति ने कहा। “थोड़ी देर में चाय भी भेज दूंगी तब तक आप अंकल के साथ गप्पें मारें” युक्ति ने हंस कर कहा। “वाह, खुश रहो।”

दीपक जी ने दिल से दुआ दी। अशोक भसीन कमरे में आ गए। दोनों मित्र मिले। पिछले 50 बरसों से दोनों का साथ था तो ज़ाहिर है कि एक दूसरे के साथ अपने सुख दुख बांट लेते थे। दीपक जी ने मित्र को देखते ही पूछा ” क्या हुआ फिर कोई बात हो गई घर में ?” “हां वही रोज़ का झगड़ा आज फिर कपिल मकान का रोना लेकर बैठ गया बस गरमा गरमी हो गई तो मैं गुस्से के मारे उठ कर तेरे पास चला आया।” ‘

अशोक जी ने अपने दोस्त के आगे दुखड़ा रख दिया। अभी आगे और कुछ कहते कि युक्ति चाय और स्नैक्स ले आयी। अशोक जी ने युक्ति को देख कर कहा ” थैंक्यू बेटा, चाय की सच्ची में बहुत तलब हो रही थी तुमने मेरे दिल की आवाज़ सुन ली।” युक्ति मुस्करा दी फिर अपने श्वसुर कि तरफ देख कर बोली “पापा मैं बाहर ही हूं कुछ जरुरत हो तो आवाज दे दीजिएगा।” दीपक जी ने मुस्कराते हुए ‘हां’ में सिर हिला दिया।

“अब बता क्या हुआ …. अच्छा रुक मैं अंदाज़ा लगाता हूं, कपिल ने फिर मकान बनवाने के लिए कहा होगा और तूने मना कर दिया होगा… यही ना ?” “हां, यही बात है अब तू बता भला अच्छे भले मकान को तुड़वा कर दोबारा बनवाने की क्या ज़रूरत है। बस नए डिजाइन का चाहिए। हर कमरे में अटैचड बाथरूम चाहिए,

किचन ओपन होनी चाहिए, फाल्स सीलिंग होनी चाहिए भई क्यों ये शुक्र नहीं करते कि मकान है, अपना है पर नहीं जी बिल्डर को देना है, चार मंजिला बनवाना है, चाटेंगे क्या चार मंज़िल को ? पर रो़ज रोज़ वही बात लेकर बैठ जाएंगे। उनको लगता है बुड्डा पागल हो गया है। मैंने भी कह दिया जब तक मैं जिंदा हूं एक कील भी ठोकने नहीं दूंगा।”

गुस्से से अशोक जी के नथुने फूल गए। दीपक जी शांति से सुनते रहे । जानते थे अभी ये कुछ नहीं सुनेगा उसे बोलने दो यही सोच कर वो चुप रहे। दोनों ने चाय पी ली। अशोक जी दोस्त के सामने दिल की भड़ास निकाल कर चुप हो गए। जब दीपक जी ने देखा कि वो थोड़ा शांत हो गए हैं तो उन्होंने दोस्त को बोलना शुरू किया “ये बता पचास साल तो हो गए होंगे ये मकान बने हुए, तूने और मैंने इकठ्ठा ही शुरू किया था बनवाना। क्यों ठीक है ना ?” “हां तो….?”

“तो भई अब पचास साल से तू इस मकान में रह चुका है, मकान भी मरम्मत मांगता है…” “तो….हर पांच साल के बाद सफेदी भी करवाता हूं” बीच में ही अशोकजी ने कहा। “तो बहुत बड़ा पहाड़ तोड़ लेता है क्या – अरे अब बच्चे बड़े हो गए हैं उन्हें उनके हिसाब से चलने दे न, बनवाने दे न उनको उनकी पसंद से, गलत क्या कहते हैं वो ?

उनके भी बच्चे हैं, बड़े हो गए हैं । वही पुराने चार कमरे, छोटी सी रसोई, एक ही बाथरूम, एक ही टॉयलेट। परिवार बड़ा ही गया है तो…।” “तो चार कमरे कम हैं क्या ? अभी भी तो चार कमरे ही बनेंगे और वो भी छोटे ही होंगे न अटैचड बाथरूम जो बनेंगे साथ में लिफ्ट भी और पता है तुझे जब चार फ्लोर बनेंगे तो एक तो बिल्डर ले लेगा और जो रसोई आज सबकी इक्कट्ठी है वो दोनों की अलग अलग हो जाएगी यानी मैं उन्हें अपने से अलग कर दूं क्या ।”

अशोक जी गुस्से से बोले।” “मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि अगर दोनों अलग अलग हो भी जाएंगे तो क्या मुसीबत हो जाएगी, रहेंगे तो साथ साथ ही न। अपनी जिम्मेदारी भी सीखेंगे, भाभी अभी तक पिसती रहती है रसोई में, तू अभी भी भागता रहता है, कभी सब्ज़ी लाने तो कभी घर का सामान लाने, क्या आराम मिल रहा है बुढ़ापे में ?

देख भई जरूरी नहीं कि बिल्डर को एक फ्लोर देना ही है खुद बनवा लो पैसे की तेरे पास कोई कमी नहीं है। बेटों को बोल आधा पैसा वो दोनों मिलकर लगाएं और आधा तू लगा ले चार फ्लोर बन जाएंगे। एक एक फ्लोर तीनों का होगा चौथा फ्लोर किराए पर चढ़ा देना और जो किराया आएगा वो जमा करते रहना जब भी जरूरत हो मकान के लिए उसमे से निकालते रहना और वैसे भी पांच सात साल तक जरुरत ही नहीं पड़ेगी।

तेरी और भाभी की पेंशन से तुम लोगों का गुज़ारा हो जाएगा और ये सब तू अगर शांति और सबकी सहमति से करेगा तो तू देखना वो अलग अलग होकर भी तुम्हारे साथ रहेंगे क्योंकि अभी उनके बच्चें भी बड़े हो रहे हैं और तुम सबको एक दूसरे की भी जरुरत है। अलग अलग रहने से भाइयों में अगर प्यार बना रहता है तो क्या बुरा है इसमें ।

अपना समय तू भूल गया जब तूने चाचाजी को कमरे में एक अलमारी बनवाने के लिए कहा तो और उन्होंने मना कर दिया था तो तू कैसे भड़क गया था अलग होने के लिए भी सोच लिया था वो तो चाचीजी ने बात संभाल ली और ये मकान बन गया। आज वही गलती तू कर रहा है। मेरा तो यह मानना है यार कि बाद में भी इनका ही है हमने सिर पर लाद कर तो ले जाना नहीं है इन्हे ही देना है तो खुशी से क्यों ना दें, अपने हाथों से, अपने सामने क्यों ना दें।

ये जरूर कहूंगा कि वसीयत बनवा लो। एक एक फ्लोर दोनों बेटों के नाम से बाकी दो अपने नाम से और तेरे बाद भाभी के नाम से और फिर भाभी के बाद दोनों फ्लोर दोनों बेटों को मिल जाएंगे। तू कोई तीर नहीं मार लेता यह कह कर कि मैं तो कील भी नहीं ठोकने दूंगा। अभी बच्चे तेरे से पूछ रहे हैं, इज्जत दे रहे हैं कल को रोटी भी नहीं देंगे, एक कमरा भी नहीं देंगे या घर ही छोड़कर चले जाएंगे तो तू क्या कर लेगा। उन्हें पता है बाद में उन्हें ही मिलना है।

अब मुझे यह मत बोलना कि तू उन्हें कुछ नहीं देगा, ट्रस्ट को दे देगा ऐसा कुछ नहीं होगा। हम मां बाप की यही एक कमज़ोरी है मोह – ममता में फंसे रहते हैं, दुखी भी होंगे, किलस भी लेंगे, आपे से भी बाहर हो जाएंगे पर ना तो वसीयत बनाएंगे और ना ही बच्चों को उनके हिसाब से चलने देंगे बस मेरा घर मेरा घर रटते रहेंगे।

तू सोच ले, विचार कर ले, भाभी से भी सलाह कर के। शांति से रहना चाहता है तो थोड़ा अपने आप को बदल। शांति हमारे ही हाथ में है। ” ये कह कर दीपक जी चुप हो गए और अशोक जी सोच में डूब गए। आज पता नहीं क्यों मित्र कि बात से वे थोड़ा हिल गए और सोचने लगे कि अगर वो ऐसा कर लें तो….???

शिप्पी नारंग

13/09/2023

नई दिल्ली

(BETIYAN s)

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