बेमेल (भाग 5) – श्वेत कुमार सिन्हा : Moral Stories in Hindi

“देख न श्यामा, लगता है आज बड़े और मंझले भईया की बातों में आकर कुछ ज्यादा ही पी ली मैने! सिर दर्द से फटा जा रहा है! बर्दाश्त न हुआ तो मजबूरी में तुझे आवाज देना पड़ा। बंशी और बाकी नौकर-चाकर भी सो गए हैं! हाय…मेरा सिर!!” – संझले ननदोई ने कराहते हुए कहा और अपनी ललाट मलने लगा।

कर्तव्यपरायण श्यामा, जो अबतक सिर झुंकाकर लज्जा से खड़ी थी, झिझक के पर्दे को हटाकर आगे बढ़ी और ननदोई के सिराहने आकर उसका सिर दबाने लगी।

“अब कैसा लग रहा है भईया जी! आंखें मूंदकर आप सोने का प्रयास करो! सुबह तक दर्द चला जाएगा।”- श्यामा ने कहा और पूरी तन्मयता से उसका सिर मलने लगी। अनायास ही उसकी नज़रें बिस्तर पर लेटे संझले ननदोई की चौड़ी छाती से जा टकराती फिर भीतर तक सिहरकर वह अपनी नज़रें परे कर लेती। वहीं संझला ननदोई जो आंखें मूंदे सोने का बहाना कर रहा था, वह मन ही मन प्रसन्न था क्योंकि उसे उसकी तरकीब पूरी होती दिख रही थी। श्यामा के हाथो का स्पर्श पाकर उसके बदन में खून के संचार बढ़ने लगा था।

“श्यामा?”- बिस्तर पर आंखें मूंदकर लेटे संझले ननदोई ने पुछा।

“जी, भईया जी!”

“एक बात पुछूं?”

“हाँ…पुछिए!”

नहीं, तुम मुझे गलत समझोगी!”

“गलत क्यूं समझुंगी! आप कोई पराए घर के थोड़े ही हैं! अपने ही हैं न! आप बेझिझक होकर पुछिए!”

“नहीं..मैं सोच रहा था मनोहर तो ठहरा मंदबुद्धिवाला, पागल!…. देखो तुम मेरी बातों को दिल पे मत लेना!” – आंखें मूंदे संझले ननदोई ने बड़ी चपलता से कहा।

“नहीं भईया जी! जो बात सच है उसमें बुरा मानने वाली कौन सी बात है भला! पर हाँ….ये जरुर है कि वो जैसे भी हैं मेरे आराध्य है।” – पतिव्रता श्यामा ने वर्णहीन होते हुए कहा।

“तुम्हारी यही बात न मेरे दिल को छू जाती है, श्यामा! काश तुम्हारी दीदी भी तुम्हारे जैसी ही होती!”- संझले ननदोई ने कहा जिसपर श्यामा की तरफ से कोई उत्तर नहीं आया।

“हाँ तो मैं कह रहा था कि क्या…म म मनोहर तुम्हारे….शरीर के अग्नि की ज्वाला को…..त त तृप्त कर पाता है?” – संझले ननदोई ने झिझकते हुए पुछा। उसकी बातें सुन श्यामा ने अपने हाथ उसके सिर से पीछे खींच लिये।

“क्या हुआ? थोड़ा और दबाओ न! तुम्हारे हाथों में तो जादू है! तुम्हारी छुअन पाने से मुझे बड़ा आराम मिल रहा है, श्यामा! पर…तुमने मेरे सवालों का जवाब नहीं दिया!” – अपनी एक आंख खोलकर संझले ननदोई ने सिर के ऊपर निगाह फेरी जहाँ श्याम बिल्कुल मूर्त अवस्था में खड़ी दिखी।

“श्यामा? क्या हुआ? मेरी बातें बुरी लगी तुम्हे? लेकिन ये तो सच है न! ठीक है उससे तुम्हे तीन बच्चे हैं पर तुम्हारा जी नहीं करता कि एक पूर्ण मस्तिस्क वाला मेरे जैसा बलशाली मर्द तुम्हे दैहिक सुख दे पाता जो मनोहर भईया से तुम्हे कभी भी प्राप्त नहीं हुआ?” – संझले ननदोई ने कहा और सिर के पीछे खड़ी श्यामा की अंगुलियां थाम उसे अपने सामने लाया। श्यामा का हृदय जैसे समुद्र-सा हिलोड़े मारने लगा था और वह पसीने से तर-बतर हो चुकी थी।

संझले ननदोई ने सच ही तो कहा था आज तक श्यामा कभी भी अपने विक्षिप्त पति संग तृप्त नहीं हो पायी थी। भीतर के प्रेमप्रवाह को मनोहर संग बुझाने का उसने हर बार प्रयास तो किया, पर अधूरी ही रह गई। लेकिन स्त्री होकर भी वह पुरुषों से ज्यादा बलवान थी। तभी तो कामक्रीड़ा को कभी भी उसने अपनी दहलीज़ नहीं लांघने दिया। आज भी नहीं लांघने देगी। संझला ननदोई जो उसके अधूरेपन को एक नया आकाश देने के सपने संजोए और अपनी पत्नी की अनुपस्थिति को भेदने के फिराक़ में था, श्यामा के पर्वतसमान अडिग विश्वास को लांघ न पाया।

उस दिन के बाद से श्यामा ने फिर कभी भी हवेली का मुंह भी न देखा। बंशी और बाकी नौकरों-चाकरों ने लाख मिन्नते की। ननदों ने भी बुलावा भेजा। पर वह टस से मस न हुई। न ही ननदोईयों के खिलाफ एक शब्द भी मुंह से निकाले। श्यामा के बिना मनोहर भी कभी उस हवेली में दाखिल न हुआ। ननदों ने यहाँ तक खबर फैला दी कि श्यामा ने उसके भाई पर जादूटोना कर रखा है और भाई-बहनों के बीच में वह दीवार बनकर खड़ी हो गई है। पर इन सबका श्यामा पर तनिक भी असर न पड़ा। जीवनयापन के लिए उसने गांव के ही कुछ घरों में कामकाज पकड़ लिया जिससे अपना और अपने परिवार का पेट पाल सके।

धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। धरती ने सीना चीरकर कई नई फसलों को जन्म दिया। देखते ही देखते श्यामा की तीनों बेटियों ने योवन की दहलीज पर कदम रखा। चुंकि श्यामा के माथे पर सिंदूर ने उसके योवन के निखरने से पहले ही दस्तक दे दिया था और तीनों बेटियां भी जल्द ही इस दुनिया में आ गई थी। फलत: श्यामा अगर कभी अपनी बेटियों संग बाजार जाती तो देखने वाले उसे उनकी बड़ी बहन समझने की भूल कर बैठते। फिर चारो को जैसे खीं-खीं करने का बहाना ही मिल जाता।

श्यामा की बड़ी बेटी सुलोचना भी शायद उसी के समान विकृत किस्मत लेकर पैदा हुई थी। मनहुसियत ने कभी भी उसका दामन न छोड़ा। घर हो या बाहर, कभी भी उससे या उसकी मौजुदगी में कुछ अनिष्ट होता तो सारा ठिकरा फिर उसके ही मत्थे फुटता और उसके मनहूस होने का सबूत और पुख्ता होता जाता। पहले-पहल तो इन सब बातों से सुलोचना के ह्रदय पर मानो कटार-से चलते थे पर समय बीतने के साथ उसे इन सबकी आदत-सी पड़ गई। सारी बातें भुलकर वह पूरा दिन अपने पिता और छोटी बहनों का ख्याल रखती।

***

“घो-घो रानी, कितना पानी? सुपली भर पानी, सुपली भर पानी!” श्यामा ने घर में प्रवेश किया तो तीनों लड़कियां खेलने में मग्न थी।

“तुम लड़कियों के पैरों में घिरनी लगी है क्या, जो कभी भी एक जगह नहीं टिकते। जब देखो तब इधर-उधर कुदती फांदती रहती हो! ब्याह करके ससुराल जाओगी तो नाक कटाओगी मायके वालों का! क्या कहेंगे ससुरालवाले कि मां ने कोई सहूर नहीं सीखाया!” – फर्श पर बैठ दीवार के सहारे सिर अड़ाकर श्यामा ने कहा और साड़ी के पल्लू से चेहरे का पसीना पोछने लगी।

मंझली बेटी अभिलाषा अपना खेल छोड़ मां के करीब आयी और उसके गोद में सिर रख आंखें उचकाते हुए पुछा – “लगता है किसी को घर से भगाने की फिराक़ में हो! हूँ? यही बात है न?”

“चल परे हट! गर्मी ने हालत खराब कर रखा है और तू कहाँ मेरे गोद में घुसी आ रही है!” –अभिलाषा को अपने से दूर करते हुए श्यामा ने कहा और सभी बहने खिलखिलाकर हंस पड़ी।

मां का पसीने से बुरा हालत देख सुलोचना ने मटके से एक गिलास ठंडा पानी निकाला और उसकी तरफ बढ़ने लगी। पर गिलास उसकी हाथो से जा छूटा और पास बैठी संझली बहन कामना का सलवार गीला हो गया।

“पता नहीं, आगे क्या बुरा होने वाला है इस घर में! तू देखकर कोई काम नहीं कर सकती क्या? हर वक़्त अपनी मनहूसियत का परिचय देती फिरती है! ओह…देखो जरा!! मेरे सारे कपड़े गीले कर दिए इस मनहूस ने!!!”- झुंझलाते हुए कामना ने कहा। उसकी बातों का सुलोचना ने कोई उत्तर न दिया और मुस्कुराकर हंसी में उड़ा दिया। पर सगी बहन के मुंह से अपने लिए ऐसी बातें सुन उसका अन्तर्मन भीतर तक छलनी हो गया।

पास बैठी श्यामा ने अपनी बेटी का मन पढ़ लिया था। आंखें दिखाकर कामना पर बरसते हुए वह बोली- “तू  घरवालों से इस तरह से बात मत किया कर! यही संस्कार दिए हैं मैने तूझे कि जो मन में आएगा बकती रहेगी! खबरदार जो आज के बाद सुलोचना के लिए अपने मुंह से अनर्गल बातें निकाली।”

“मैं कोई गलत थोड़े ही न कह रही हूँ! सब जो कहते हैं वही तो दूहरा रही हूँ! फिर कितनो का मुंह पकड़ोगी?? हाँ?  समूचे गांव में ये बात फैली है कि सुलोचना मनहूस है!” –मां की डांट खाकर बुदबुदाती हुई कामना अपना पैर पटकती हुई भीतर कमरे में चली गई।

“छोड़ो न माँ! जाने दो! क्यूं अपना दिल छोटा करती हो! वो तो बच्ची है, गुस्से में अनाप-शनाप बकते रहती है! देखो मुझे कुछ हुआ क्या! लो, पानी पी लो!”- झुठी मुस्कान चेहरे पर बिखेरते हुए सुलोचना ने कहा। पर उसके आंखो में उभरे अश्रूरूपी मोती उसके व्याकुल हृदय का प्रमाण दे रहे थे।

अपनी माँ के ललाट पर फैले पसीने की बूंदों को पोछते हुए सुलोचना बोली -“तू मेरे लिया इतना परेशान मत हो, मां! मुझे भगाने की इतनी जल्दी क्यूं पड़ी है तूझे! आखिर मैने तेरा क्या बिगाड़ा है? मैं चली जाउंगी तो तुमसब का, इन चंठ लड़कियों, बाबा का ख्याल कौन रखेगा?”- कहते हुए सुलोचना के आंखो से आंसू जमीन पर आ लुढ़के ।

“बेटियां तो होती ही हैं पराया धन! आज नहीं तो कल तेरे हाथ तो पीले करने ही पड़ेंगे! दुनिया भले ही तुझे मनहूस कहे। पर मुझे पता है तेरे गुण तीनों लोकों में मेरा नाम रौशन करेंगे!” – अपनी लाडली के सिर पर हाथ फेरते हुए श्यामा ने कहा। तभी भीतर कमरे से मनोहर की पुकार सुन श्यामा उठकर चली गई। काफी देर वहीं बैठ शून्य को निहारते हुए सुलोचना अपनी ही किसी पारलौकिक दुनिया में खोयी रही।…

क्रमशः…

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बेमेल (भाग 4)

बेमेल (भाग 4) – श्वेत कुमार सिन्हा : Moral Stories in Hindi

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