औरत हूं , मुश्किलों मैं जीना जानती हूं – अनुपमा 

आदरणीय मां ,

क्या कह रही हो आप मम्मी , निभाना पड़ेगा ? कर क्या रही थी मैं इतने सालों तक , समाज और बच्चों की खातिर ही तो निभाया सब । फिर भी आप मुझे ही बोल रहे हो । आप कभी नही समझ सकती हो मम्मी , आपने भी तो निभाया ही ,हर गलत बात को , सरे आम तमाशा बना देते थे

पिता जी पर आप पर कभी कोई असर नहीं हुआ , कभी मुंह खोल कर आप उन्हे गलत नहीं कह पायी, जब चाहे जैसे बोल देना , गाली दे देना , हाथ उठा देना , सबकुछ उनके हिसाब से किया बस … अब मेरे साथ भी यही सब हो रहा है पर मैं आप नही हूं मम्मी।

जानती हूं दो बच्चे है मेरे , और अपनी खुशी के लिए उनकी जिंदगी बर्बाद कर दू अभी इतनी भी आधुनिक नही हूं मैं , वैसे भी वो आदमी हर चीज के लिए तरसा देता है बच्चों को भी , पढ़ लिख जाए बच्चे मेरे  , मुझे तो लड़की समझ कर आपने इतना पढ़ाया

नही की अपने पैरों पर खड़ी हो सकू , और भाई भाभी के ऊपर बोझ बन नही सकती , जानती हूं की कोई करने वाला नही है , जब पति ही साथ नही देता तब दुनिया मैं कोई नही पूछता है । ऐसे ही तो चलता है ना आप लोगो का बनाया हुआ ये समाज । 

लेकिन मम्मी मैं आप नही हूं , बर्दाश्त कर लूंगी , रह भी लूंगी , अपने सारे फर्ज निभाऊंगी , उसके प्रति भी और अपने बच्चों के प्रति भी पर जो भी करूंगी अपने हिसाब से करूंगी … आपकी पीढ़ी मैं तो औरत जाने अपना सम्मान कहां दबा कर रखती थी पर मैं अपने आत्मसम्मान को नही दबा सकती मां … 

वो गाली देगा तो जब बर्दाश्त के बाहर होगा तो सुनेगा भी , फिर चाहे परिवार समाज कहता रहे की मां बाप ने संस्कार नहीं दिए ,,, अरे आदमी जब गाली देता है तब उसके मां बाप को नहीं बोला जाता की संस्कार नहीं दिए ? 


वो हाथ उठाएगा तो भले ही मैं उतने स्तर तक न गिर पाऊं और शारीरिक क्षमता मैं कम होने के कारण मुकाबला न कर पाऊं पर एक ही घर मैं अलग कमरे मैं रह कर मैं विरोध करूंगी मां क्योंकि मेरे मां बाप ने मुझे इसलिए नही पैदा किया की कोई बस नशे मैं है इसलिए मुझे पीट देगा ,, या उसका मूड खराब है तो मुझे मार देगा ,,, मैं नही सहूंगी मां , मैं भी इंसान हूं मुझे भी अपना आत्मसम्मान प्यारा है मां । 

वो मेरी जरुरते पूरी नहीं करेगा तो मैं एक रोटी कम खा कर रह लूंगी मां पर अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करूंगी ।

मैं रहूंगी उसके साथ ही क्योंकि समाज हमेशा औरत को ही गलत ठहराता है ना मां ? औरत मैं ही कमी होगी , निभाना पड़ता है , हमने नही निभाया क्या , बच्चों का क्या होगा ,कभी आदमी को कोई नही समझाता न ,,, 

वो चाहे गाली दे , पीटे, दारू पिए , आम जरूरतें भी पूरी न करे ,फिर भी वो ही सही है ।

औरत सबकुछ छोड़ कर उसको और उसके घर को अपना बना ले , अपनी इक्षाएं मार के रहे , तिनका तिनका जोड़ कर गृहस्थी बसाए फिर भी उसका कुछ नही है ना .?

आपके समाज मैं आपको शर्मिंदा नहीं करूंगी मां , पर उसके साथ होकर भी उसके साथ नही रहूंगी मैं , जैसे उसने मेरा साथ मेरे किसी भी जरूरत के वक्त नहीं दिया था मां , मैने तो फिर भी सारे फर्ज निभाएं थे , पर अब नही मां .. उसको लेना और देना ही समझ आता है ना ,,, तो अब जितना मिलेगा उतना ही लौटाऊंगी मां ,, मैं खुद अपने तरीके से कर लूंगी अपने आत्मसम्मान की रक्षा मां ,,, औरत हूं ,, मुश्किलों मैं जीना जानती हूं ।

आपकी बेटी

अनुपमा

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!