रंगो की आड़ में.. – रश्मि प्रकाश : Moral stories in hindi

“ भाभी रसोई से निकलो और बाहर चलो ना… देखो सब रंग खेलने आए हुए हैं आप बाहर नहीं जाएगी तो वो रसोई में आ जाएँगे फिर माँ नाराज़ अलग होगी और हमारी मेहनत डबल… प्लीज़ भाभी चलो ना..।” अपनी भाभी कौशांबी से मनुहार करती तृप्ति कहे जा रही थी 

“ आप देख रही है ना तृप्ति… कितना काम बाकी है…. ये पकवान दोपहर तक नहीं बने तो सब क्या खाएँगे… आप जाकर खेलिए… मैं बाद में आऊँगी ।” कौशांबी जिसे रंग खेलना इतना पसंद था पर वो इन रंगों से खुद को बेरंग रखना ज़्यादा पसंद कर रही थी 

ससुराल में ये उसकी दूसरी होली थी और होली के रंग का डर चेहरे से अब तक नहीं गया था जो रंग रिश्तों में एक अलग ही उल्लास भर देते कौशांबी उनसे दूर छिटक रही थी।

तृप्ति भाभी को मना कर थक गई थी और कौशांबी बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी…. 

तभी उसे आवाज़ आई,“ अरे भाभी बाहर आ जाइए कब तक रसोई में छिप कर बैठी रहेगी….. हम तो आज आपको बिना रंग लगाए जाने वाले नहीं हैं… या तो आप बाहर आइए नहीं तो हम आ जाएँगे ।” 

“ अरे मोहना… घर के भीतर पैर ना धरियों… खेले के होई तो बाहर …. और ई का रे सुबह सुबह तोहरा कुछ मिलल नहीं जो शराब पी के चला आया है… चल जा यहाँ से अभी तोहार भौजी के बहुत कुछ बनावे के हैं बाद में अईहां तोहनी सब..।” दरवाज़े पर हाथ रोककर खड़ी गंगा जी बोली

ये सुनते ही कौशांबी को चैन पड़ गया चलो अब कोई अंदर तो नहीं आएगा पर आख़िर कब तक…. इन लोगों से बचूँगी…. मोहित भी तो दोस्तों और छोटे भाइयों को देख बावले हो जाते…. रंग लगाते तो ठीक था पर वो सब… सोच कर ही कौशांबी घबरा गई।

रसोई में वो एक एक कर के पूआ बना रही थी और अतीत के साएँ से खुद को बचाने की भरसक कोशिश कर रही थी पर कामयाब कहाँ हो पा रही थी…..

“ ये शादी के बाद हमारी पहली होली है यहाँ….तुम्हें खूब रंग लगाऊँगा… नखरे नहीं करना पहली होली पर तो तुम मायके में थी तो ज़्यादा रंग भी नहीं लगाया पर इस बार छोड़ूँगा नहीं…. ।”कहते कहते मोहित भर हाथ अबीर कौशांबी के चेहरे पर लगा दिया 

“ अच्छा तो ये तरीक़ा है आपका बातों बातों में रंग लगा दिए …. रूकिए आपको भी नहीं छोड़ने वाली…।” कह कर कौशांबी ने भी मोहित को जमकर रंग लगाया

तभी मोहित के चचेरे भाइयों की टोली अपनी नई भाभी के साथ रंग खेलने पहुँच गई….

कौशांबी को तो रंग खेलना वैसे भी बहुत पसंद था फिर ननद तृप्ति भी माहिर थी दोनो बाहर रंग खेलने निकल आई…

कौशांबी सबको सलीके से सँभल सँभल कर रंग लगा रही थी एक तो नई उपर से देवरों की टोली कोई ऊँच नीच ना हो जाए ये माँ ने समझाया हुआ था…. पर कौशांबी को क्या पता था वो जिन के साथ रंग खेलने गई है वो लोग सिर्फ़ चेहरे पर रंग नहीं लगा रहे थे …. उसे अपने बदन पर इधर-उधर लगते हाथों से डर लगने लगा…. वो जल्दी से भाग कर अंदर चली गई….

फिर बाहर आने के नाम पर बहाने बनाने लगी….. थोड़ी देर बाद मोहित के चार दोस्त भी रंग खेलने पहुँच गए…

मोहित कौशांबी को बाहर आने बोला तब कौशांबी वो दोस्त है ये सोच कर बाहर आ गई…. एक दोस्त ने तो कमर पकड़ लिया और लगे पूरे बालों में रंग लगाने चेहरे पर रंग मलते हाथ से अब कौशांबी डर गई थी…. खैर उस दिन होली गुजर गई और सबके साथ कौशांबी ने देखा मोहित भी दोस्त की पत्नियों और भाभियों के साथ पूरा फ़्री हो कर रंग लगा रहे थे और भाभियाँ भी मज़े कर रही थी….. कौशांबी के लिए ये सब नया और अजीब था वो इस तरह की होली ना कभी खेली थी ना खेल सकती थी बस आज उसी पुराने डर की वजह से वो बाहर नहीं आना चाह रही थी।

“ अरे बहू और कितना बाकी रह गया…. ऐसा कर तू जा रंग खेल बाकी का मैं देख लूँगी..।” गंगा जी की आवाज़ सुन कौशांबी वर्तमान में आ गई 

” मैं कर लूँगी माँ आप बाहर देखें ।” कौशांबी बोल चावल चढ़ाने लगी बहुत वक़्त हो चला था कुछ देर में सब खाने की माँग करेंगे 

“ तू जा ना सब तेरा कब से राह ताक रहे हैं…. जा रंग खेल ले फिर नहा कर सब खाना खाएँगे ।” गंगा जी कह कर कौशांबी के हाथ से चावल का बरतन ले ली

“ माँ मुझे नहीं खेलना रंग…।” कौशांबी ने कहा 

“ काहे बहू तू तो पिछले साल खूब खेले रहें फिर ई साल का भईल.. तबियत तो ठीक है ना तोहार ..।” गंगा जी परेशान हो कर कौशांबी के सिर पर हाथ रख कर पूछी

“ हाँ माँ सब ठीक है पर ये सब जो …. रंग लगाते मुझे वो पसंद नहीं…।” डरते डरते कौशांबी ने कह

“ काहे बहू का बात भईल रहे तनिक बताओ..।” गंगा जी बहू से प्यार से पूछी 

कौशांबी ने डरते झिझकते सब कह दिया 

“ अच्छा चल तू बाहर आ मेरे साथ…।” उसका हाथ पकड़ कर गंगा जी बाहर ले आई

“ मोहित देख सब ठीक से बहू को रंग लगाना इसकी तबियत थोड़ी ठीक नहीं हैं…. बस गाल पर गुलाल लगाकर होली मना लो…. ज़्यादा तमाशा करने की ज़रूरत नहीं है..।” गंगा जी ने कहा 

मोहित आश्चर्य से कभी माँ तो कभी कौशांबी को देख रहा था… आँखों के इशारे से कौशांबी से सवाल कर रहा था ।

सबने गंगा जी के डर से कौशांबी को थोड़ा ही रंग लगाया….सब के चले जाने के बाद मोहित ने पूछा,“ क्या हुआ तबियत तो ठीक है…. तुम्हें रंग खेलना भी पसंद है फिर आज ये सब क्यों ?”

“ मोहित आप सब जैसे रंग खेलते हो इधर-उधर छूकर वे लोग रंग लगाते मुझे वैसी होली नहीं पसंद…. आप लगाओ ना जहाँ लगाना पर दूसरे क्यों….. उपर से कितनी बेशर्मी से कहते हैं एक ही दिन तो मौक़ा मिलता है आपको छूने का वो कैसे छोड़ दें…. सभ्य लोग ऐसे होली खेलते हैं क्या… मस्ती मज़ाक़ रंग सब ठीक है पर मर्यादा भी तो कुछ होती है ना वो सब पार कर जाते … ऐसी होली खेलने से बेहतर है मैं रंगो से ही दूर रहूँ ।” कौशांबी की आवाज़ भर्रा गई थी 

“ यार ये तो मैंने सोचा ही नहीं कभी …. सबको देखते हुए ऐसा लगा कि ऐसे ही खेलते हैं और सब मज़े भी लेते हैं पर हाँ कुछ महिलाओं ने रंग खेलना बंद कर दिया इसकी वजह शायद यही रही होगी…… कोई बात नहीं जब मेरे दोस्त आएँगे तुम आना ज़रूर पर जैसे तुम रंग लगवाना चाहो वैसे बोल देना।” मोहित ने कहा 

थोड़ी देर बाद मोहित के दोस्त भी आ गए इस बार कौशांबी ने ही पहल कर सबके गालों पर रंग लगा “ हैप्पी होली ” कह कर पीछे हट गई

जब किसी ने ग़लत तरीक़े से लगाने की कोशिश की अपना चेहरा आगे करते हुए बोली रंग चेहरे पर लगाइए ज़्यादा अच्छा लगेगा ।

इस तरह की बातें सुन कर सब शर्मिंदगी महसूस करने लगे और फिर सही तरीक़े से रंग लगाकर होली मना कर अपने घर चल दिए पर सब समझ गए थे कि वो रंग लगाने की आड़ में कुछ तो गलत कर रहे थे जिससे दोस्ती के रिश्ते शायद बेरंग हो सकते थे पर सबने कौशांबी के साथ सलीके से होली खेल कर पुनः अपने रिश्ते की अमर्यादित होने से बचा लिया था ।

कौशांबी भी समझ गई थी कि डर कर अगर वो चुप रहती तो लोग उसकी मर्ज़ी समझने की भूल कर बैठते  और दोस्ती का जो गहरा रिश्ता होता है वो उसकी नज़रों में तो गलत ही रह जाता ….अच्छा हुआ माँ ने हिम्मत दिखाते हुए मुझे रंगो में रंगना सीखा दिया।

पिछले साल के बुरे अनुभवों ने कौशांबी की रंगीन दुनिया को बेरंग कर दिया था पर इस बार उसकी सास की बातों ने उसे हिम्मत दी और उसके बेरंग से रिश्तों में फिर से रंग भर दिए ।

 

पता नहीं आप मेरी कहानी से कहाँ तक सहमत होंगे पर आज भी कुछ लोग रंग खेलने के नाम पर बदतमीज़ी करने से बाज नहीं आते ऐसे लोगों को वक़्त पर ही रोक देना चाहिए नहीं तो वो आपकी चुप्पी को आपकी रज़ामंदी समझ कर ऐसा व्यवहार करने से बाज़ नहीं आएँगे ।

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धन्यवाद 

रश्मि प्रकाश 

#वाक्यकहानीप्रतियोगिता 

# “बेरंग सी रिश्तों में रंग भरने का समय आ गया है “

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