स्वाभिमान – गीतांजलि गुप्ता

सीमा अधिकतर चुप रहती है कम बोलती है काम ज़्यादा करती है सभी लोग उससे उम्मीद रखते हैं कि समय से काम करे। क्या बाहर का, क्या घर का हरेक काम निपटा ही लेती है। घर में शांति बनी रहती है और सभी लोग अपने अपने काम में मस्त रहते हैं।

खाने की टेबल पर रोज़ तीनों की पसंद का खाना तीनों टाइम परोसना कोई माजक नहीं पति कहते कि दो बच्चे और दो हम बस चार लोगों के काम भी तुमसे नहीं संभलते, बेटे कहते मां बस  दो चार साल ही आपको और हम जंगलियों को झेलना है फिर हम आपको कष्ट नहीं देंगें। शादी के बाद प्रेम विवाह और अरेंज मैरिज में कोई अंतर नहीं होता विवाह बस विवाह है जिसमें दो व्यक्ति अलग अलग विचार लिये जुड़ जाते हैं।

परिवार की गर्ज है पूरी तो करनी ही होगी फिर ये परिवार ही तो उनकी धरोहर है। बाकी उसकी पढ़ाई लिखाई पिता का लाड़ प्यार, माँ की स्नेहहिल बातें सहेलियों के हँसी ठठा सब कुछ दिल की पिटारी में कैद हो चुका है।



सब कुछ दिया भगवान ने पर चैन नहीं है सीमा को। आखिर क्यों अपने भाग्य को कोसती रहती है। पति विशाल बहुत अच्छा कमाते हैं नामी व्यापारी हैं सोसाइटी में नाम है उनका, अक़्सर सीमा को भी साथ ले जाते हैं पार्टी में वहाँ भी सीमा अनमनी सी रहती है। कभी खुशी महसूस क्यों नहीं कर पाती। पति ने कई बार ये कह उसे टोका भी है वो कहते हैं कि सीमा एक बेचैन आत्मा है जो सिर्फ़ भटकती ही रहती है। उनका कहना है कि सीमा को खुश करना नामुमकिन है। हाँ उसे खुश रखना किसी की जिम्मेदारी कैसे हो सकती है ये काम तो सीमा का है सब को खुशियां बाँटना।

बचपन में पापा, मम्मी ने लाड़ प्यार से पाला, पढ़ाया सारे सुख दिए परन्तु शादी करते समय सीमा ख़ुद ही ग़लती कर बैठी। उसने डेंटिस्ट की शिक्षा प्राप्त की और शादी से पहले बड़ी मेहनत से क्लीनिक खोली वहीं एक दिन उसकी मुलाकात विशाल से हुई वो अपने पिता को इलाज़ के लियें लाये थे इलाज़ के दौरान विशाल से हुई मुलाकात में सीमा कब विशाल से आकर्षित हो गई पता ही नहीं चला विशाल भी सीमा को बार बार मिलने को ललायित रहते थे और दोनों ने विवाह करना तय किया।

बस उसी प्रेम विवाह का परिणाम है उसकी उदासी।

करीब दो वर्ष ही सीमा अपनी क्लिनिक चला पाई पहले बेटे आशीष के जन्म के बाद क्लिनिक बंद बराबर हो गई सीमा वहाँ कभी जाती कभी नहीं जाती। विशाल से जब भी बच्चे को कुछ समय देने की बात कहती ताकि खुद क्लीनिक ठीक से संभाल पाए विशाल सीधे ही मना कर देते साथ ताना भी मार देते कि “डेंटिस्ट” का काम बहुत ही बेकार काम है उसमें कमाई कम मेहनत अधिक लगती है। इससे तो घर रहना ही अच्छा है”

मन मसोस कर दूसरे बेटे मयंक के जन्म के बाद क्लीनिक पर सदा के लियें ताला जड़ दिया और पूरी तरह गृहस्थी सँभालने लगी। आज तक यही दुःख उसे कचोटता रहता हैं पढ़ लिख कर भी एक अनपढ़ ही रह गई। मम्मी पापा उसका दुःख समझते थे पर वो इस गहरी चोट को नासूर बनने से रोक नहीं सके।



बड़े बेटे ने विशाल के विरोध के बाबजूद डॉक्टर की पढ़ाई की और अगले वर्ष खुद की क्लीनिक खोलने की उसकी योजना है। तीन चार दिन से सीमा से कह रहा है कि हम एक बड़ी सी जगह लेंगें वहाँ तीन डॉक्टर प्रेक्टिस करेंगें एक डॉ आशीष, दूसरी डॉ सीमा व तीसरी उसकी होने वाली पत्नी डॉ रुबिका जिसने स्त्रीरोग विशेषज्ञ की शिक्षा पाई है। डॉ रुबिका का जिक्र आते ही सीमा थोड़ा सकपकाई बेटे ने शादी करने का निश्चय भी ले लिया और उसे पता भी नहीं।

वैसे ऊपरी तौर पर सीमा ने आशीष के इस निर्णय से खुशी जताई परन्तु क्लीनिक में साथ काम करने से साफ मना कर दिया क्योंकि वो ख़ूब समझ रही थी कि बेटा क्लीनिक के काम की जिम्मेदारी सीमा पर छोड़ना चाहता है जिसके लियें वो कभी तैयार नहीं होगी इतने वर्षो में तो कभी नहीं कहा कि माँ आप अपना क्लिनिक खोलो अब अचानक माँ को सम्मानित किया जा रहा है और भला बनने का ड्रामा किया जा रहा है सीमा ने रोम रोम में एक झनझनाहट  महसूस की। आह.. स्वार्थ कितना कठोर होता है…..

सीमा को अंदाजा था कि एक न एक दिन आशीष की योजना पर घर में मीटिंग अवश्य होगी। उसका सोंचा सही निकला। मीटिंग में सीमा, विशाल , आशीष और रुबिका शामिल थे। छोटा बेटा मयंक अमेरिका पढ़ाई करने गया हुआ है। उसे पिता के काम को लार्ज स्केल पर बढ़ना है।

वैसे भी इंग्लैंड में ही सेटल होने का शौक है।

मीटिंग में रुबिका की उपस्थिति से सीमा बहुत अटपटा महसूस कर रही थी। घरेलू मसले में उसका क्या काम परन्तु बेटा और पति जो चाहें वही उचित होगा। सीमा कुछ कहती ही नहीं हमेशा अपने टूटे हुए सपने के कारण बुझी बुझी रहती । सब अपने मंसूबे बना रहे थे। विशाल ने भी खुशी खुशी पैसा लगाने को पूरी तरह तैयारी कर ली।

प्लान पूरा सीमा के सामने था न उसने किसी से कुछ पूछा न किसी ने उसकी राय जाननी चाही। हमेशा की तरह उसकी चुप्पी को हाँ माना जाने लगा।

अचानक सीमा अपनी बात कहने लगी “डॉक्टर का काम कोई रोटी बेलने जैसा नहीं आशीष जब चाहे आटा छोड़ दो जब चाहे आटे की रोटी बनाने लगो। पच्चीस वर्ष से घरेलू जिंदगी बिता रही हूँ डॉक्टरी की ए बी सी भी भूल चुकी हूँ तुम और रुबिका डॉक्टर होते हुए भी ये कैसे सोंच सकते हो कि मैं क्लिनिक चला लूंगी। अखबार में विज्ञापन देकर कोई अच्छी सहायक तलाश लो…..

सबके चेहरों के भाव देखने को एक पल भी वहां नहीं रुकी अपने कमरे में जा दरवाज़ा बंद कर शान्ति से लेट गई। आत्मा से सारे बोझ उतर गए स्वार्थ को आईना जो दिखा आई थी। निश्चय किया परिवार के स्नेह में अब और अंधी नहीं रहेगी। स्वाभिमान अभी मरा नहीं।

गीतांजलि गुप्ता

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