स्नेह बंधन – रश्मि प्रकाश

“ कहाँ ख़्यालों में खोई हुई हो.. कब से रज्जो चाय रख कर गई वो भी ठंडी हो गई होगी ।” नरेंद्र ने मान्या को ख़्यालों में खोया देख कर कहा

“ कुछ नहीं जी दोनों बच्चों को यूँ बारिश में भीगता देख कुहू और पीहू की याद आ गई , ये चारों साथ में कितना भीगते थे और हम बुला बुला कर थक जाते पर बच्चे नहीं थकते थे । आज ये दोनो भाई-बहन अकेले ही छपाक छपाक कर रहें … काश हमें वो घर छोड़ना ना पड़ता…।” लंबी साँस छोड़ते हुए मान्या ने कहा

“ अब उन बातों को सोचकर दिल दुखाने का क्या फ़ायदा? जो होना था हो गया… सबने रज़ामंदी से ही ये फ़ैसला लिया था ना… तो हम और तुम क्या कर सकते थे बोलों….।” पत्नी के हाथों पर सांत्वना के हाथ रखते नरेंद्रजी ने कहा

तभी उनके बच्चे कुश और ख़ुशी दौड़ कर आए और ख़ुशी (सात साल)बोली,“मम्मी हमें कुहू और पीहू दी की याद आ रही… हम बारिश में कितना मजा करते थे ना आप परेशान हो जाती हैं पर हम नहीं सुनते थे।” पाँच साल का कुश भी मुँह बना कर अपनीं दीदियों को याद करने लगा ।

दोनों की बात सुनकर मान्या की आँखों में आँसू आ गए ।वो नरेंद्र के भरोसे बच्चों को छोड़ कर कमरे में चली गई ।

अपने कमरे में आकर वो उस मनहूस दिन को याद करने लगी जब उसके जेठानी जेठ जी और अपनी पाँच साल की जुड़वां बेटियों के साथ मायके जा रही थी… रास्ते में कार असंतुलित होकर पुलिया से जा टकराया.. जेठ जी और बच्चियाँ बच गई पर जेठानी जी नहीं बच पाई। जेठ जी तो पत्नी की मृत्यु से टूट से गए । तब मान्या की बेटी तीन साल और बेटा दो साल का था । उसने पूरे दिल से कुहू और पीहू को अपनी बेटी समझ कर पाला … दो साल तक वो चारों बच्चों को बराबर अपना प्यार दुलार देती रहीं । सब मान्या की तारीफ़ करते क्योंकि वो बिना भेदभाव बच्चों का ख़याल रख रही थी ।




एक दिन मान्या की ताई सास उनके घर आई। मान्या की कुहू और पीहू के साथ उसकी घनिष्ठता उन्हें अच्छी नहीं लगी । वो चाहती थी कि मान्या के जेठ जी फिर से अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए शादी कर ले ताकि एक बेटा हो जाए।पर जेठ जी तैयार नहीं हो रहें थे क्योंकि उनको अपनी बेटियों की ज़्यादा परवाह थी और वो मान्या के हाथों में सुरक्षित भी थी और परवरिश भी अच्छे से हो रही थी ।

ताई सास जितने दिन रही सास के कान भरती रही ।

वो कहने लगी की मान्या की नियत में खोट है उसके तो एक बेटा है ही तो सारी ज़मीन जायदाद का वो अकेला वारिस बनेगा… बेटियाँ तो ब्याह कर दूसरे घर चली जाएगी ।

मान्या ये सब सुन कर भी कुछ नहीं बोलती थी क्योंकि वो सच्चे मन से बच्चों की देखभाल कर रही थी ।

एक दिन ऐसी ही ज़ोरदार बारिश हो रही थी.. चारों बच्चे खूब मस्ती कर रहे थे… तीनों बहने मिल कर कुश को परेशान करने लगी तो मान्या ने बस इतना ही कहा,“ कुहू पीहू आप दोनों बड़ी हो ना कुश को परेशान क्यों कर रही हो… आपका छोटा भाई है ना प्यार से खेलों…..। “

ये बात सुनकर ताई सास ने मान्या को दमभर सुना दिया,“ इन दोनों को ही बोल रही ..ख़ुशी को क्यों नहीं बोल रही.. देखो कर दिया ना भेद अपने और पराये में… माना वो तेरा बेटा है इसलिए ज़्यादा फ़िक्र कर रही.. तुम यहाँ हो इसलिए ही तो महेश ( जेठ) शादी नहीं कर रहा… बेटी की फ़िक्र करने वाली नहीं होती तो ज़रूर शादी कर लेता । तुमलोग यहाँ से जाओगी तो महेश पक्का शादी कर लेगा पर तुम तो सारी जायदाद चाहती हो इसलिए ना महेश शादी कर रहा ना अब उसके बच्चे होंगे ।”

सुनकर मान्या के पैरों तले ज़मीन खिसकती महसूस हुई । वो तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि ताई जी इस हद तक बोल जाएगी । सासू माँ ने भी हाँ में हाँ मिला दी।

नरेंद्र और मान्या को भी लगने लगा अगर जेठ जी शादी ही करना चाहते तो वो यहाँ से चले जाएँगे ।




सबको यहीं सही लग रहा है तो यही सही ।

नरेंद्र जी अपनी नौकरी के तबादले की अर्ज़ी देकर दूसरे शहर आने को तैयार हो गए।

जब वे चारों आ रहे थे तो कुहू और पीहू बहुत रो रही थी ।महेश जी को ये बताया गया कि तबादला हो गया है इसलिए जाना पड़ेगा ।

इस तरह मान्या उन बच्चियों को छोड़कर आ तो गई पर दिल हमेशा वहीं पर अटका रहता था ।

तभी दोनों बच्चे आकर कपड़े बदलने को कहने लगे,मान्या अतीत से यथार्थ में लौट आई।

“ आप कुहू और पीहू दी को याद कर रही थी ना मम्मी….. हम उनके पास कब जाएँगे… ! ” कुश ने पूछा

“ जल्दी जाएँगे बेटा ।” कहकर मान्या उनके कपड़े बदलने लगी

सप्ताह भर बाद एक दिन जेठ जी दोनों बेटियों के साथ मान्या के घर आए।

“ क्यों नरेंद्र और मान्या दोनों बच्चियों की परवरिश करने में परेशानी हो रही थी तुम दोनों को… जो तबादला करवा कर आ गए? ” महेश जी ने सवाल किया

“ ऐसी कोई बात नहीं है भाई साहब… तबादला हो गया तो आना ही था… बस आ गए। हमें तो दोनों की बहुत याद आती हैं बच्चे भी अपनी दीदियों को याद करते रहते हैं ।” नरेंद्र जी ने कहा

“तो फिर तुम्हें क्या लगा…. तुम दोनों आ जाओगे तो दूसरी शादी कर लूँगा….ये सोच भी कैसे लिया ? ” महेश जी ने कहा

“ जी ऽऽऽ वोऽऽऽ ” इसके आगे दोनों कुछ कह नहीं पाए

“ देखो मान्या मुझे बस इतना बताओ क्या तुम इन दोनों की ज़िम्मेदारी उठा सकती हो? उसके बाद की बात बाद में करेंगे ।” महेश जी ने कहा

“ जी भाई साहब मैं तो जीजी के जाने के बाद से इन्हें अपनी बेटी समझ कर ही देखभाल कर रही थी, लगता है मुझसे ठीक से इनका ध्यान नहीं रखा जा रहा होगा इसलिए….।“ इतनी कह मान्या चुप हो गई

“ फिर ठीक है आज से ये दोनों तुम्हारे साथ रहेंगी जब तक नरेंद्र घर वापसी का तबादला नहीं करवा लेता । वो तो कुछ दिन पहले समझ आया जब ताई जी अपने किसी रिश्तेदारी में मेरा दूजा ब्याह रचाने जा रही थी.. उस लड़की का एक बेटा भी है वो चाहती थी कि मेरे से ब्याह हो जाए बेटियाँ तो पहले से ही है ….उसका बेटा है ही परिवार पूरा हो जाएगा… पर मैं कैसे भरोसा कर सकता हूँ किसी और पर जब कुहू और पीहू को माँ की ज़रूरत ही नहीं है.. उन्हें तो अपनी छोटी माँ ही चाहिए और मैं उन्हें सौतेली माँ देना भी नहीं चाहता।”महेश जी ने पूरे विश्वास के साथ कहा

पास ही ख़ुशी और कुश के साथ कुहू और पीहू हुररे कर के उछल पड़े “ अब हम साथ साथ रहेंगे!”

मान्या ने बच्चों की ख़ुशी देख कर महेश जी से कहा,“ भाई साहब आप चाहें तो शादी कर सकते हैं पर ये दोनों पहले भी मेरे ही बेटियाँ थी आज भी मेरी ही रहेगी…. किसी के कहने से हमारा रिश्ता नहीं बदल सकता ।” कहते हुए उसने चारों बच्चों को सीने से लगा लिया

उनका प्यार देख कर महेश जी ने मान्या के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा,” मुझे माफ करना मान्या मुझे ये बात पहले पता होती तो मैं तुम्हें कभी इनसे दूर जाने ही नहीं देता।अब बस घर आ जाओ … ताई जी को तो मैं समझाता हूँ आगे से कभी जो हमारे घर आ कर इस तरह की बकवास करें ।”

कुछ महीने बाद नरेंद्र और मान्या अपने चारों बच्चों के साथ फिर से घर चलें गए। चारों बच्चों के स्नेह के आगे उनकी दादी भी हार गई… समझ आ गया कोई और कुहू और पीहू को मान्या जैसा प्यार दे ही नहीं पाएगी ।

कुछ रिश्ते ऐसे बँधन में भी बँधे होते हैं जिन्हें चाहकर भी कोई अलग नहीं कर सकता… वो बँधन है बच्चों के साथ स्नेह और प्यार का….।

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धन्यवाद

रश्मि प्रकाश

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