संस्कार अपना अपना -मुकेश कुमार

एक परिवार में 4 देवरानी जेठानी रहती थी । शादी के 15 साल हो गए थे लेकिन अभी भी सबसे बड़ी जेठानी को कोई बच्चा नहीं हुआ था। उस से छोटी तीन देवरानियों के बेटे स्कूल में पढ़ने लगे थे वह भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में क्योंकि तीनों देवर सरकारी नौकरी करते थे।

बड़ी जेठानी का पति किसान था माता-पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था इस वजह से परिवार का सारा बोझ उसी पर आ गया था और वह अपनी पढ़ाई बचपन में ही छोड़ दिया था उसने अपनी मेहनत से अपने तीनों भाइयों को पढ़ा लिखा कर सरकारी नौकरी में भेज दिया था। एक बात अच्छी थी कि परिवार अभी भी एक साथ मिलकर रहता था।

बड़ी जेठानी जब अपनी देवरानीयों के बच्चे को खेलते हुए देखती तो उसका भी मन करता कि उसके गोद में भी उसका खुद का बच्चा होता।



भगवान के घर में देर होता है पर अंधेर नहीं होता है आखिर वह दिन आ ही गया। 16 साल बाद बड़ी जेठानी मां बनने वाली थी। उसके 9 महीने बाद बड़ी जेठानी ने भी एक सुंदर सा प्यारा बच्चे को जन्म दिया जिसको प्यार से उन्होंने कृष्णा नाम दिया।

समय के साथ कृष्णा अब 5 साल का हो गया था अब उसके स्कूल जाने का समय हो गया था बड़ी जेठानी शकुंतला अपने बच्चे को भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहती थी क्योंकि उसकी देवरानियो के बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाई करते थे इसीलिए वह भी सोचती थी कि उसका इकलौता बेटा कृष्णा भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़े । लेकिन बड़ी जेठानी के पति महेश जी अपने बेटे को सरकारी स्कूल में पढ़ाना चाहते थे।

क्योंकि महेश जी जानते थे कि उनकी औकात नहीं है अपने बेटे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने की। जो भी घर की संपत्ति था वह भाइयों की पढ़ाने में बेच दिया अब थोड़ा बहुत जो जमीन बचा हुआ था उसी से घर का खर्चा पानी चलता था। तीनो भाई सरकारी नौकरी करते थे लेकिन घर खर्चे के लिए अपने बड़े भाई को उतना ही देते थे जितना कि घर का खर्चा चल सके।

जब बड़ी जेठानी ने अपने पति महेश से अपने बच्चे के सरकारी स्कूल में एडमिशन के बारे में बात करी तो महेश जी ने साफ मना कर दिया बोला, “शकुंतला हम अपने बेटे को एक-दो साल तो प्राइवेट स्कूल में पढ़ा सकते हैं लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होगा स्कूल की फीस भी बढ़ती जाएगी फिर हमारे पास कमाई का तो कोई जरिया है नहीं खेती के पैसे से अपने बच्चे को कैसे पढ़ा पाऊंगा इस से अच्छा है कि हमारा बच्चा सरकारी स्कूल में ही पढ़े।

और ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूल जो होता है बिल्कुल खराब होता है सरकारी स्कूल से भी पढ़े हुए बच्चे डॉक्टर इंजीनियर और आईएस बनते हैं। लेकिन शकुंतला मानने को तैयार नहीं थी वह अपने बेटे को सरकारी स्कूल में नहीं पड़ना चाहती थी। उसने अपने पति से कहा कि आप अपने भाइयों से पैसे क्यों नहीं मांगते हो आखिर तीनों भाइयों को पढ़ाने में आपने घर की सारी जमीन बेच दी जो भी हमारे पास कुछ जमा पूंजी था

वह भी हमने इनकी पढ़ाई में लगा दिया अपने बच्चों की तरह इनको पाला पोसा तो क्या जब हमें जरूरत होगी तो वो हमारी मदद नहीं करेंगे । महेश जी ने अपनी पत्नी से कहा, “देखो शकुंतला मुझे अच्छा नहीं लगता है कि छोटे भाइयों से मैं अपने बेटे की पढ़ाई के लिए पैसे मांगू और मुझे विश्वास है कि अगर मैं मांग लूंगा तो वह मना नहीं करेंगे।”



शकुंतला बोली कि अगर आप में हिम्मत नहीं है तो मैं बोलूंगी मैं अपने बच्चों के जिंदगी को खराब नहीं करूंगी आखिर हमने भी उनके लिए बहुत किया है तो क्या उनका फर्ज नहीं बनता है कि वह हमारे बच्चे के लिए करें आज अगर वह सरकारी नौकरी कर रहे हैं तो उसके पीछे हमने अपनी मेहनत और पैसा खर्च किया है।

रात के खाने के समय सभी भाई एक साथ ही बैठ कर खाते थे। जब सब लोग खाने के लिए बैठे तभी शकुंतला ने अपने तीनों छोटे देवर से कहा कि आपका भतीजा कृष्णा अब स्कूल जाने लायक हो गया है और मैं चाहती हूं कि जैसे आप लोगों के बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाई करते हैं वैसे कृष्णा भी इंग्लिश स्कूल में पढ़ाई लेकिन आपके भैया के पास इतने पैसे नहीं हैं कि उसके फीस भर सकें इसलिए आप लोगों को थोड़ा थोड़ा मदद करना होगा क्योंकि कृष्णा भी आप लोगों का भतीजा है इसी परिवार का बेटा है जब सारे बच्चे इंग्लिश स्कूल में पढ़ेंगे तो वह सरकारी स्कूल में क्यों पड़ेगा।

पैसे की बात सुनकर तीनो भाई चुप हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे उनके मुंह पर सांप सूंघ गया हो। शकुंतला ने जब दोबारा कहा कि तुम तीनो भाई जवाब क्यों नहीं देते हो हां या ना जो भी कहना है कह दो।

तभी सबसे छोटी देवरानी बोल उठी, “दीदी माफ करना छोटा मुंह बड़ी बात होगी कहना लेकिन आपको तो पता है कि जितनी कमाई होता है उतना ही खर्चा है अभी हाल ही में हमने शहर में लोन पर जमीन लिया है और फिर हमारे छोटे बेटे गट्टू के पढ़ाई में भी इतना खर्च होता है।

यह तो खुद ही बड़े भैया से कुछ पैसे के लिए बात करने वाले थे कि अगर कुछ पैसे हो जाए तो वह उनको दे दे और वह अपने भैया को कुछ दिनों में लौटा देंगे अभी के लिए दीदी माफ करना जब पैसे होंगे तो हम जरूर आपके बेटे के लिए मदद करेंगे। ऐसे कर कर के दोनों और देवरानीयों ने भी पैसे देने से मना कर दिया। महेश जी चुपचाप सुनते रहे वह कुछ नहीं बोले और खाना खाकर अपने कमरे में चले गए।

महेश जी जब अपने कमरे में चले गए तो बड़ी जेठानी अपने पति से जाकर बोली, “आपको तो बड़ा विश्वास था आपने भाइयों पर आपको लग रहा था कि वह आपको मना नहीं करेंगे देख लिया। भाई तो आखिर भाई होते हैं उन्होंने अपना रंग दिखा दिया, हमने तो उनको अपने बेटे से कभी भी कम नहीं माना लेकिन उन्होंने क्या किया।

महेश जी धीरे से बोले देखो शकुंतला इसीलिए मैं तुमसे कह रहा था कि हम अपने बेटे को सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं क्योंकि समय दूसरा चल रहा है आजकल कोई किसी का साथ नहीं देता है यहां तक बेटा बाप का साथ नहीं देता है तो वह तो भाई हैं उनसे क्या गिला शिकवा।



शकुंतला गुस्से में बोली अब हमारा चूल्हा अलग होगा अब हम उनके साथ नहीं रहेंगे जब हमें सब कुछ अपना अपना ही करना है तो उनके साथ किस लिए रहेंगे। महेश जी ने अपनी पत्नी को समझाया देखो शकुंतला हम घर में सबसे बड़े हैं और इस तरह का निर्णय लेना समाज के लिए अच्छा संदेश नहीं है।

लेकिन शकुंतला नहीं मानी और अगले दिन से ही उसने अपने तीनों देवरो से कह दिया कि हम अब अपना खर्चा खुद चलाएंगे और हमारा चूल्हा भी अलग होगा।

यह सुन तीनों देवरानिया बहुत खुश हुई क्योंकि वह तीनों आपस में बहुत मिलकर रहती थी वह तो कब से सोच रही थी कि तीनों अलग होकर रहे। उन्होंने एक स्वर में शकुंतला से कहा दीदी आपकी जैसी इच्छा है कीजिए हमने तो कभी नहीं कहा है कि हम आपसे अलग रहेंगे अगर आपकी इच्छा यही है तो फिर यही ठीक है।

अब क्या था चारों भाइयों का चूल्हा अलग हो चुका था।

शकुंतला भी अपनी मजबूरी समझ चुकी थी और वह अपने बेटे को सरकारी स्कूल में भेजने लगी थी। समय के साथ चारों भाइयों के बच्चे बड़े हो गए सब शहर में जाकर नौकरी करने लगे लेकिन बड़ी जेठानी का बेटा गांव में ही स्कूल में शिक्षक की नौकरी करने लगा।

बड़ी जेठानी का बेटा कृष्णा अपनी मां बाप का बहुत सेवा करता था अगर हम कृष्णा को श्रवण कह दे तो अती नहीं होगी ।

देवरानियों के बच्चे शहर में रहते थे और वह अब गांव आना पसंद नहीं करते थे अगर कोई गांव में आता भी था 1 दिन से ज्यादा नहीं रुकता था।

तीनों देवरानिया जब अपनी जेठानी को देखती तो खूब ताने मारती यह देखो दीदी का लड़का सरकारी स्कूल में पढ़ा और सरकारी स्कूल में ही टीचर बन गया गांव में रहकर गांव का ही गवार बन गया। हमारे बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़े और आज शहर में जाकर कोई सीए बन गया है तो कोई इंजीनियर बन गया है सब के पास अपनी कार है फ्लैट है।

ऐसे रोज रोज के ताने सुन सुनकर बड़ी जेठानी ऊब चुकी थी आखिर उसने एक दिन अपनी देवरानियों से कह दिया। कि मैं एक कंपटीशन कराना चाहती हूं और देखती हूं कि कौन उसमें से पास होता है हम चारों में से किसके बच्चे उसमें पास होते हैं किसके बच्चे में सबसे ज्यादा संस्कार है वह निर्णय हो जाएगा कि सरकारी स्कूल में पढ़ा वाला बच्चे के पास संस्कार है या इंग्लिश मीडियम पढ़ा हुआ बच्चे के पास। देवरानीयो ने यह चैलेंज एक्सेप्ट कर लिया।

बड़ी जेठानी ने कहा कि हम सबको बारी बारी से अपने बेटे को फोन करके यह यहां बुलाना होगा और कहना होगा कि बहुत इमरजेंसी है जल्दी से गांव आ जाओ।

सबसे पहले छोटी जेठानी ने अपने बेटे को फोन किया और कहा बेटा जल्दी से गांव आ जाओ तुम्हारे बाबूजी का एक्सीडेंट हो चुका है। देवरानी के बेटे ने कहा मां ज्यादा चोट तो नहीं आई है ना आपको पता है दो-तीन सालों से मैं ट्राई कर रहा हूं अमेरिका जाने का और वह सपना पूरा होने जा रहा है कंपनी ने मेरी ट्रांसफर अमेरिका कर दी है और आज ही मेरी फ्लाइट है आप मम्मी ऐसा करो पापा को किसी की मदद से हॉस्पिटल में इलाज करा दो जितने पैसे की जरूरत है मैं पैसा भेज दिया करूंगा सॉरी मम्मी मैं नहीं आ पाऊंगा।

अब उसके बाद वाली जेठानी ने अपने बेटे को फोन किया और कहा कि बेटा जल्दी से आ जाओ तुम्हारे पापा को हार्ट अटैक आया है बेटे ने सुना और कहा मम्मी जल्दी से उनके को शहर के डॉक्टर के पास ले चलो मैं कंपनी के किसी काम से दूसरे शहर आया हूं जैसे ही काम खत्म होता है मैं भी आ जाऊंगा।

ऐसे करके 4 से 5 दिन हो गए फिर भी बेटा नहीं आया है दोबारा फोन किया गया उसने फिर बहाना कर दिया कि बहुत अर्जेंट काम है मैं बहुत जल्द आऊंगा। लेकिन वह आया नहीं।



तीसरी देवनानी ने भी अपने बेटे से कहा बेटे तुम्हारे पिताजी का हार्ट अटैक आया है जल्दी से तुम गांव आ जाओ। तीसरी देवरानी का बेटा बोला मम्मी तुम्हें तो पता ही है कि मार्च का महीना चल रहा है और यह फाइनेंसियल महीना होता है इस महीने में तो सीए को पास बिल्कुल ही समय नहीं होता है मैं तुम्हारी बहू को भेज देता हूं और जैसे ही मुझे फुर्सत मिलता है मैं भी आ जाऊंगा।

अब बारी थी जेठानी को अपने बेटे के पास फोन करने की जेठानी ने भी यही सवाल अपने बच्चे से किया और कहा कृष्णा तुम्हारे पिताजी का हार्ट अटैक आया है तुम जल्दी से घर पहुँचो। कृष्णा स्कूल की तरफ से ट्रेनिंग लेने के लिए लखनऊ गया हुआ था लेकिन उसको जैसे ही अपने पिता के अटैक के खबर मिली वह तुरंत वहां से एक रिजर्व गाड़ी किया और डेढ़ घंटे के अंदर अपने गांव पहुंच चुका था और उसी गाड़ी में जल्दबाजी में अपने पापा को बिठाया और शहर इलाज कराने के लिए चल दिया जैसे ही चलने को हुआ। सब ने कृष्णा से एक स्वर में कहा रुको बेटा तुम्हारे पापा को कुछ नहीं हुआ है।

फिर कृष्णा को सब कुछ सच-सच बता दिया गया कि हम चारों अपने बेटों की परीक्षा ले रहे थे कौन सबसे ज्यादा अपने माता-पिता से प्यार करता है।कृष्णा, इसके बाद हमें यह पता चला कि हमने अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में तो जरूर पढ़ाया लेकिन हम उसे अच्छे संस्कार नहीं दे पाए तुम सरकारी विद्यालय में जरूर पढ़े हो लेकिन तुम्हारे मां-बाप ने संस्कार दिए हैं वह हम से कहीं ज्यादा बड़े हैं माना कि हमारे बेटे तुम्हारे से ज्यादा पैसे कमाते हैं लेकिन वह पैसे किस काम के जो मां-बाप के काम ना पाए जो मां बाप के मुश्किल घड़ी में बच्चे साथ ना दे पाए।

आज बड़ी जेठानी को अपने कृष्णा पर गर्व महसूस हो रहा था आज उसे लग रहा था कि शायद मैं भी अगर अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाती तो मेरा बच्चा भी वैसे ही हो जाता लेकिन मैंने अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाया और एक अच्छा संस्कार दिया।

दोस्तों इस काल्पनिक कहानी के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि कई माता-पिता आज भी उन्हें लगता है कि हमारे बच्चे प्राइवेट स्कूल में पड़ेंगे तो बहुत होनहार और काबिल हो जाएगी लेकिन ऐसा नहीं होता है आप पैसे से अपने बच्चे का जीवन नहीं बदल सकते हैं आप उसे इंटेलिजेंट नहीं बना सकते हैं उसके लिए आप अपने बच्चे पर कितनी मेहनत करते हैं संस्कार देते हैं यह महत्वपूर्ण होता है।

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