रेड ड्रीम्स – ईशा मृदुल

“मुझे पता है लड़कियों को अलग तरीके से रखा जाता है, उन्हें सिर्फ परवरिश ही नहीं उन्हें एक तयशुदा जिंदगी सिखाई जाती है। बहुत शुरू से ही उस औहदे पर तैयार होती है लड़कियाँ जहां उन्हें दूसरों के सपने, दुसरों का घर, उनकी इज्ज़त, मान मर्यादा का ख्याल रखना पड़ता है। हमने लड़कियों को कभी बहुत जरूरी नहीं माना किसी चीज के लिए पर हमारे घर का ऐसा एक कोना भी नहीं है जहां उनके बगैर कुछ काम आसान हो सके। हां क्योंकि काम तो हम सब फिर भी कर लेंगे पर, करने के तरीक़े लड़कियों से ही मिलते है।

हमने उनके लिए दो ही विकल्प सामने रखे हैं, एक अच्छी गृहिणी का या एक रौबदार पद पर कार्यरत आफिसर का। इसके बीच में झूल रही लड़कियाँ संघर्ष कर रहीं है। संघर्ष या तो अच्छी बेटी, शादी रेडी बेटी, अच्छी बहू, अच्छी पत्नी, औसत दर पर काम करने वाली सुंदर लड़की या काॅमन पालिटिक्स में यूं ही नजरअंदाज हो जाने वाली लड़की के रूप में। और बाहर हमें एक चमत्कारिक रूप से दिखाई देती है सशक्त लड़कियाँ। स्टाईल और श्रृंगार में मशगूल लड़कियाँ। इन यर ही मज़ाक होगा और इनसे ही होगा इस समाज को प्यार भी। लड़कियों की स्थिती सिर्फ भाषण से नहीं सुधरेगी, ये तब सुधरेगी जब लड़कियाँ खुद इस हालात को ठीक करना चाहेंगी।”

काव्या के स्टेज पर खड़ी ये सारी बातें सुन रही थी और एक टक अपनी बनाई रेड ड्रेस को देखे जा रही थी। एक प्रतियोगिता में उसकी बनाई ड्रेस दूसरे स्थान पर आई। उसे उम्मीद नहीं थी की ड्रेस सिलेक्ट होगी, पर अभी वो विजेता मंडली में आश्चर्यजनक खुशी और खोई हुई नजरों के साथ वहां खड़ी थी। तालियों की आवाज से उसका सारा सपना एक विराम पर आ गया। भाषण के बाद कालेज की डीन स्टेज से नीचे उतरी, बारी बारी से बाकी लड़कियाँ अपना ड्रेस लेकर भी नीचे आ गई। काव्या अंत में उतरी और जान बूझकर उसने अपनी बनाई ड्रेस छोड़ दी, ताकि उसका नाम दुबारा पुकारा जाए और सबका ध्यान, ड्रेस और ड्रेस बनाने वाले पर जा सके। ये तरकीब काम कर गई, स्टेज से होस्ट ने काव्या को आवाज लगाई,  ड्रेस की तारीफ करते हुए उसने काव्या को स्टेज से अपना सामान ले जाने का आग्रह किया। नहीं चाहते हुए भी काफी लोगों ने देखा और सुना भी।

कार्यक्रम अपने नियमानुसार और दिए गए समय पर संपन्न हुआ। फैशन क्लब के सारे लोग अपना अपना सामान लेकर वापस हॉस्टल लौट गए। काव्या हॉस्टल के छत पर चली गई। बहुत देर तक हवाओं को, बादलों को , उभरते तारें और डूबते सूरज को देखती रही। शाम का वक्त पूरे शहर को चूमता हुआ अलविदा कहकर चला गया। दिनभर का सारा किस्सा रात के कानों में बुदबुदाते हुए उसने रात के अंधेरेपन में भी काफी रौनक कर दी थी। बाकी लड़कियाँ भी छत पर आने लगी, हवाओं में सिगरेट और स्लो गानों ने पूरा माहौल इतवार सा कर दिया। एक लम्बे अर्से बाद इस हॉस्टल में सूकून था, जश्न था और कहीं सपनों से शिकायतें भी थीं।



इस बीच काव्या को हर कोई बधाई

दे रहा था। काव्या वेस्टर्न तौर तरीके वाली लड़की है, उसने इंडियन ब्राइडल लुक डिजाइन किया, पूरा एक ड्रेस! ये उसके साथ साथ इंडियन वेयर की जीत भी थी। दरअसल काव्या को यही सिखाया गया था की चूड़ी बिंदी साड़ी पहनने वाली लड़कियाँ सिर्फ मनोरंजन के लिए होतीं है। उनपर गानें लिखे जाएगें, उनकी सुंदर तस्वीर निकाली जाएगीं और बाकी लड़कियों को श्रृंगार की अंधी दौड़ में शामिल होने के  लिए छोड़ दिया जाएगा।

ऐसी लड़कियां कहानियों में भी अस्तित्वहीन होती हैं। यही सब बसा था काव्या के दिमाग में इसलिए ही भी वो चाहकर भी ट्रेडिशनल कुछ नहीं पहनती ना खरीदती थी। लेकिन उसे ये सब काफी पसंद था। उसने अपने मन की सारी कल्पना इस रेड ड्रेस में उकेर कर रख दी।

काव्य सिंगल शेयर रूम में रहती थी, वजह वही, की कहीं बाकी लड़कियां उसे अपने जैसा ना बना दे। देकर रात जब लगभग सारे लोग सो गए, काव्य अपना ड्रेस और मेकअप का सारा सामान लेकर कमरे से बाहर आई और छत की तरह गई। सीढ़ीघर में उसने अपना ड्रेस पहना, बहुत गहरा मेकअप, और बाकी जेवर पहनकर वो छत पर चली गई। ठंडी हवाएं, कुछ तारें और आधा चांद वाला आसमान के नीचे काव्या पूरी सजकर खड़ी थी। उसने छत के दो तीन चक्कर काटे, छत पर स्थित नीचे कैम्पस के देखा और हाथ हिलाने लगी। उसे पहली बार खुबसूरत महसूस हो रहा था। वो किसी सुपरस्टार की तरह एक्टिंग करने लगी। भरी नजाकत, अदाएं और शाही रोआब लिए वो पूरे अंधेरेपन और खालीपन को बड़े ही ईमानदारी के साथ एड्रेस किया।

कहने को रात था मगर ये सुर्ख रंग लिए काव्या ने चांद की भी रौशनी आधी कर दी थी। काव्या इस माहौल में हर एक क्षण जी रही थी। उसके ड्रेस पर लगा सितारा भी जगमगा रहा था और एक रंगहीन रौशनी में वो कोहिनूर लग रही थी, ऐसा उसे मालूम था। अपने अंदाज में मग्न काव्या ने तभी कांच के ग्लास लुढ़कने की आवाज़ आई। वो थोड़ी हरबड़ा गई और पहले अपने ड्रेस का चेन खोला, जूता खोला और दुपट्टा भी हटा लिया। वो जल्दी से सीढ़ीघर में आई। इससे पहले कोई देखता वो रगड़कर मेकअप हटाने लगी।

इसी हरबड़ी में उसकी नींद खुल गई। काव्या अपने बिस्तर पर अपना रेड ड्रेस के साथ लेटी हुई थी। हवा के बहाव से उसका ग्लास गिर गया था, सुबह के चार बजे थे और नज़ारा उसी शाम का था जब ये सपना शुरू हुआ।

-ईशा मृदुल

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