फिर से – सुधा शर्मा

  आज अपने को बार बार बहला रही थी वसुधा ।’ठीक किया मैने , यह कोई समय है प्यार मुहब्बत में पडने का ?कितनी पागल हूँ न मै ? कैसे इतनी जल्दी भावनाओं में बह जाती हूँ ।

     बस खूबसूरत शब्दों के मोह जाल में भूल जाती हूँ कि जीवन के इस मोड पर क्या हक बनता है मुझे भावनाओं के सैलाब में डूब जाने का।’

         सारी उम्र बीत गई  थी उसकी अकेले अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए ।पिता की असमय मृत्यु

असहाय माँ दो छोटी बहने , उसके ही तो सहारे पर थीं ।पिता की सर्विस मिल गई थी उसे , तो पिता बन कर ही सारी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया ।सच में ही वह पिता का स्वरूप बन सारे कर्तव्यों को पूरा करती चली गई।

      कभी अपने बारे में सोचने का न तो समय मिला , न ही कभी इच्छा हुई ।सब की जिंदगी सँवार कर सब को विदा कर चैन की साँस ली उसने।

जिस दिन माँ ने अंतिम साँस ली उस दिन लगा कि सच में अब कितनी अकेली हो गई हूँ ।

             कितना बडा घर , कितना सन्नाटा , बहुत कहने पर ऊपर का हिस्सा किराये पर दे दिया , अपने आफिस के राजकमल   को। पत्नी कुछ वर्ष पहले चली गई थी , फिर दुबारा शादी करने का मन नहीं बना।

        जाने कब कैसे उनका अपना पन , उनका हँसमुख स्वाभाव, उनकी स्नेह पूर्ण बातें , पूरे समय उसको खुश रखने की कोशिश उसके मन को छूने लगी थी ।यह एहसास होते ही कल उसने कह दिया था कि वे अपने लिये दूसरा घर तलाश कर ले ।

    अगली सुबह की चाय पर आये ,काफी गम्भीर लग रहे थे राज कहने लगे ,” अच्छा एक बात बताओं, किससे डर रही हो तुम, मुझसे , या खुद  से ?”



       ” किसी से नहीं  , बस ऐसे ही, अकेले रहने की आदत है न ।वैसे ही रहना चाहती हूँ बस ,” नीचे सिर झुका कर बोली वसुधा ।

     ” अच्छा  सच कहो वसुधा तुम मेरे जाने से खुश होगी क्या ?”

          ” हाँ ” , अब उसकी आवाज रुँधने लगी थी ।

      ” मेरी तरफ देख कर कहो ।”

        अब वह अपनी रुलाई नही रोक पाई , जल्दी से उठ कर अंदर चली गई और बिस्तर पर गिरकर फूट फूट कर रोने लगी ।

         अपनी पीठ पर किसी के हाथ का स्पर्श पाकर एक दम उठ कर बैठ गई ।

       ‘ जानती हो वसुधा इसको ही प्यार कहते है।जब किसी का वजूद बेचैन करने लगे , जब मन किसी से दूर जाने की कोशिश करे , पर दूर जाने की कल्पना ही चूर चूर करने लगे मन को , इसी का नाम ही तो प्यार है ।तुम खुद भी नही जानती वसुधा ।”

      ” नहीं नही, अब नहीं ।इस सब का समय अब नहीं  बचा।” उसकी आँखें भीग रही थी।

       ” किसने कहा? जीवन की सांध्य बेला में भी सारे जीवन की खुशियों को ज़ीने का हक है तुमको ।”

” और वो मै दूँगा तुम को , वायदा है मेरा ।’उन्होने आगे बढकर वसुधा के आँसू पोंछ दिये।

      ‘ केवल मुस्कुराहट पर हक है तुम्हारा ।हम कल ही चलकर अपने रिश्ते को नाम देंगे वसुधा ।”

           वसुधा को लग रहा था जैसे कि वह कोई खूबसूरत सपना देख रही है बहुत खूबसूरत ।

सुधा शर्मा

मौलिक स्वरचित

 

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