लौट आओ नर्मदा ” – डॉ .अनुपमा श्रीवास्तवा

सावन का महीना शुरू होते ही शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इंद्र भगवान जोर शोर से अपने काम में लग गये थे। भोले नाथ पर अभिषेक करने के लिए रात दिन जल बरसा रहे थे । हर ओर हर -हर महादेव का नाद गूंज रहा था। शिवजी की प्रिया “प्रकृति” की छटा देखते ही बन रही थी।

मेहंदी, महावर, रंग- विरंगे फूलों के गजरे से सजी “धरती” धानी चूनर ओढ़े बाग बगीचे पर्वतों और काननों  को लुभा रही थी। सृष्टि मानो सोलह शृंगार किये पूरी तरह दुल्हन लग रही थी। गंगा, जमुना, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा सभी नदियाँ  सावन के रिमझिम बरसात में अपने पवित्र जल से अपने आराध्य  शिव जी को अभिषेक करने के लिए व्याकुल थीं।

ऐसे मनोहारी सावन के विहंगम छवि के बीच

राजकुमार सोनभद्र (सोननदी) अपनी प्रिया नर्मदा (नर्मदा नदी )के इंतजार में  आकूल व्याकुल हो रहे थे। जब से उन्होंने नर्मदा के रूप लावण्य को देखा था तबसे मिलन की आस लिए अमरकंटक की पहाड़ियों के नीचे धूनी रमाय

बैठ गए थे। उन्होंने विहग -वृंद से ,पवन से और न जाने किस -किस से राजकुमारी नर्मदा के पास अपना प्रेम सन्देशा भिजवाया। अब वह काले काले मेघों से विनती कर रहे हैं कि जाकर नर्मदा के पास मेरा प्रेम बरसा दो जिसमें मेरी प्रिया का हृदय मेरे प्रेम में सराबोर हो जाय।

बरसात में अपने प्रियतम से मिलन की कहानी तो सबने सुनी होगी पर विरह की……. !

यह विरह  वेदना की कथा नर्मदा की है। नर्मदा ने घोर तपस्या की थी गंगा जी के समान अपने आराध्य शिव जी का सानिध्य पाने के लिये ।लेकिन ब्रह्मा जी ने  प्रकट होकर  उनकी तपस्या को  यह  कहकर भंग कर दिया था कि…जैसे महादेव के समान कोई देव नहीं हो सकते , जैसे काशी के समान कोई नगरी नहीं हो सकती वैसे ही गंगा के समान कोई शिव प्रिया नदी नहीं हो सकती।



ब्रम्हाजी के वचन से विक्षुब्ध होकर नर्मदा काशी चली आईं और शिवलिंग बनाकर घोर तपस्या करने लगीं। प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें सबसे पवित्र होने का वरदान दिया और स्वयं नर्मदेश्वर महादेव कहलाए। महादेव की कृपा से नर्मदा के एक-एक कंकर में शंकर का वास है ।

कहा जाता है कि  यमुना का जल एक सप्ताह में,सरस्वती का तीन दिन में,गंगा जल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है। एक बार गंगा जी भी नर्मदा के तट पर स्नान करने आई थी ताकि इसी बहाने वह भी उनका स्पर्श कर सकें।

  पौराणिक कथा के अनुसार अमरकंटक की पहाड़ियों  में राजा मेखल की पुत्री बनकर नर्मदा ने नदी के रूप में जन्म लिया था। बचपन से ही वह बहुत ही सुंदर, कोमल, निर्मल हृदय और सुकुमारी थीं। कल-कल करती बहती  रहती और पहाड़ियों,वनों,काननों के साथ अठखेलियाँ करती। नर्मदा की एक प्रिय सहेली थी “रूहिला” वह भी एक नदी ही है । नर्मदा नित्य  अपनी प्यारी सखी रूहिला के साथ शिव जी की पूजा करने अमरकंटक की गुफाओं में जाया करती थी।

उसी दौरान राजकुमार सोनभद्र ने नर्मदा को देखा था और उनपर आसक्त हो गये। आसक्ति इतनी तीव्र थी कि सोनभद्र ने अन्न जल लेना बंद कर दिया। जब उनके पिता को यह बात पता चली तो राजकुमार सोनभद्र के पिता ने राजा मेखल के पास सोनभद्र और नर्मदा के विवाह का सन्देशा भिजवाया। ऐसे सर्वगुण संपन्न राजकुमार के लिए भला राजा कैसे मना कर सकते था सो उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह सोनभद्र के साथ करने के लिए सहमति दे दी।

नर्मदा सभी पुत्रियों में सबसे प्रिय थीं ।सो पिता के आग्रह को टाल नहीं पाई और  सोनभद्र के साथ पाणिग्रहण स्वीकार कर लिया। वह मन ही मन सोनभद्र  के संग प्रेम करने लगीं

एक बार सावन के सुहावने मौसम में सोनभद्र के हृदय में प्रेम के फूल  खिल उठे। वह अपनी  प्रिया नर्मदा से मिलने को व्याकुल हो उठा। वह अपने को रोक न सका । उसने  नर्मदा से मिलने की इच्छा व्यक्त की। उस वक्त नर्मदा भगवान शंकर की पूजा की तैयारी में लीन थीं। सो उन्होंने अपनी सखी रूहिला को कुछ देर सोनभद्र  को ठहरने का सन्देशा देकर भेजा।


नियति ऐसी थी कि अब तक न सोनभद्र ने नर्मदा को  देखा था और न नर्मदा ने सोनभद्र को ।  राजकुमार सोनभद्र  रूहिला को नर्मदा समझने का भूल कर बैठा। रूहिला ने भी ऐसे सुन्दर और यशस्वी कुमार पहले नहीं देखा था।  सो उसके मन में खोट उत्पन्न हो गई उसने छल का  सहारा लिया और अपना परिचय छुपा लिया।  वह सोनभद्र के प्रणय निवेदन को टाल न सकी ।इस तरह उसने नर्मदा के साथ विश्वासघात किया।

जब बहुत देर तक सखी वापस नहीं लौट कर आई तब चिंतित होकर नर्मदा उसे ढूंढने चली। वहां पहुंच कर नर्मदा ने रूहिला को सोनभद्र के साथ प्रेम में आलिंगनबद्ध  में देखा।  इस दृश्य को देखते ही वह तिलमिला उठीं । क्रोध और विक्षोभ के कारण नर्मदा ने  चिरकुंवारी  रहने का शपथ  लेकर उल्टी दिशा की ओर चल पड़ी ।

असलियत मालूम चलने पर सोनभद्र बड़ा व्यथित हुआ। उसने सखी रूहिला को धिक्कारा कि तुमने विश्वासघात किया है। इस गलती के कारण रूहिला एक शापित नदी होकर आज भी  मंडला के पास पश्चाताप को लेकर बह रही है।

सोनभद्र नर्मदा के पीछे -पीछे उसे मनाने दूर तक गया लेकिन नर्मदा  वापस नहीं लौटी। अपमान के कारण 

नर्मदा ने पलट कर सोनभद्र को देखा तक नहीं। उसकी आंखों से विक्षोभ  की बरसात हो रही थी और वो कभी ना लौटने का प्रण लिए अमरकंटक की पहाड़ियों को चीरते , घने जंगलों को लांघते चली जा रही थी उल्टी दिशा की ओर…..और अंत में अरब सागर में समा जाती हैं ।

यह पौराणिक कथा की सत्यता आज भी देखने को मिलती है। एक बिंदू पर  सोन नदी से नर्मदा अलग  हो  जाती हैं ।।गंगा ,गोदावरी पूर्व की ओर सागर में समाहित होती हैं जबकि नर्मदा ठीक विपरीत दिशा में जाकर अरब सागर में विलीन हो जाती हैं।

स्वरचित एवं मौलिक

डॉ .अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर’ बिहार

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