खानदान का नाम – विभा गुप्ता : moral stories in hindi

moral stories in hindi : ” मम्…मी…कहाँ हैं आप!…।इस बार मेरा ट्रांसफर आपके प्रिय शहर बरेली में हुआ है।” चहकते हुए नित्या आई और अपनी माँ के गले में बाँहें डालते हुए बोली तो कपड़ों को तह लगाते हुए रजनी के हाथ एकाएक रुक गये।

   ‘ बरेली….।’ वह धीरे-से बुदबुदाई।

” हाँ मम्मी…ज़्यादा सोचिये मत और पैकिंग शुरु कर दीजिये।इसी सप्ताह निकलना है।” कहकर नित्या अपनी सहेली के यहाँ चली गई।

      रजनी ने ऊपर वाले रैक से खाली बैग निकाले और उसमें अपनी साड़ियाँ रखते हुए सोचने लगी…।

           बरेली शहर से रजनी का बहुत पुराना रिश्ता था।उसी शहर के एक अस्पताल में उसका जन्म हुआ था।उसके पिता चाहते थें कि बेटों की तरह बेटी भी अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ी हो जाये लेकिन दोनों भाइयों के विवाह के बाद दादी उसके पिता पर विवाह के लिये दबाव डालने लगीं।तब वह इंटर में ही थी, पिता ने कहा कि अम्मा…, कम से कम उसे बीए तो कर लेने दो लेकिन दादी नहीं मानी।कहने लगी कि हमारे खानदान में लड़कियाँ स्कूल नहीं जाती…तूने तो उसे कालेज का मुँह दिखा दिया, यही बहुत है।बस..महीने भर के भीतर ही विनोद के साथ उसका विवाह हो गया।

         विनोद सरकारी बैंक में कैशियर थें।परिवार में उनकी माताजी, दो बड़े भाई और दो भाभियाँ थीं।बड़ा भाई सुबोध अपने पिता के व्यवसाय को संभाल रहा था और छोटा प्रमोद सरकारी मुलाज़िम था।उस मध्यमवर्गीय परिवार में ज़रूरत की सारी सुविधाएँ उपलब्ध थीं और सदस्यों के बीच आपसी स्नेह भी था।

      रजनी के विवाह के समय पहली जेठानी श्यामली जीजी के दो लड़के थें और दूसरे नंबर की अनिता जीजी के पहला बेटा और दूसरे के लिये वो तीन माह की गर्भवती थी।छह माह बाद उन्होंने फिर से एक बेटे को ही जन्म दिया तो परिवार में हर्ष की लहर दौड़ गई।साल भर बाद जब रजनी प्रेग्नेंट हुई तब सभी ने उससे एक बेटे की ही उम्मीद लगाई।नौ महीने बाद जब उसने एक कन्या को जनम दिया तो उसकी सास कमला जी का मुँह उतर गया।विनोद से कहने लगी कि हमारे खानदान में तो पहला बच्चा हमेशा बेटा जनने की ही रीत चली आई थी, तेरी बहू ने तो…खैर…,अगला तो बेटा ही होना चाहिए।

         यहीं से रजनी के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाने लगा था।कभी उसकी बेटी के लिये दूध कम पड़ जाता तो कभी उसके खाने के लिये रोटी ही नहीं बचती।सास तो दिनभर यही कहती रहती कि बेटे से ही वंश आगे बढ़ता है और जेठानियाँ उसे ताना कसती कि खानदान का नाम तो बेटे ही रोशन करते हैं।इन सब बातों से उसे दुख तो बहुत होता लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की।

       नित्या स्कूल जाने लगी।उसका रिजल्ट बहुत अच्छा होता और वह क्लास में प्रथम आती तब विनोद खुश होकर अपनी भाभियों को दिखाते तो वे उलाहना देती,” कौन सा तेरी बेटी को कलक्टर बनना है।” सुनकर वो खून का घूँट पीकर रह जाते थे।

        नित्या के प्रति परिवार की उदासिनता देखकर विनोद को बहुत दुख होता।वो पत्नी से कहते,” देख लेना रजनी…एक दिन हमारी बेटी से ही इस खानदान का नाम होगा।” 

         होनी-अनहोनी पर किसी का वश नहीं होता। एक दिन विनोद बैंक से लौट रहें थे कि पीछे से आती एक ट्रक उनके स्कूटर को टक्कर मारकर निकल गई।उन्हें तुरन्त अस्पताल ले जाया गया।पत्नी का हाथ पकड़कर वे इतना ही कह पाये,” रजनी…बेटी को खूब पढ़ाना।” पति की साँस बंद होते ही रजनी चीख पड़ी थी।

बैंक वालों ने रजनी को ज़ाॅब ऑफ़र किया लेकिन वह तो इंटर भी पास नहीं थी, कैसे स्वीकार करती।उसी दिन उसने निश्चय किया कि अपनी बेटी को शिक्षित करके अपने पैरों पर खड़े करके ही वह दम लेगी।

       आठवीं के बाद दोनों जेठ रजनी पर दबाव डालने  लगे कि दसवीं के बाद नित्या की पढ़ाई बंद करवाकर उसे घर के काम सिखाये और विवाह करके उसे शीघ्र ही विदा कर दे।सास ने भी उसे यही समझाया कि अपने बड़ों की बात मान ले, समय पर बेटी को ठिकाने लगाने में ही खानदान की भलाई है।

        रजनी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे..,खानदान के नाम पर अपनी बेटी की बलि चढ़ाने के लिये वह कतई तैयार नहीं थी।उसने अपने जब पिता से कहा तब उसके पिता ने कहा,” अम्मा की वजह से मैंने तेरी पढ़ाई छुड़वा दी लेकिन नित्या के साथ ऐसा नहीं होगा।” वे तुरंत आकर बेटी और नातिन को अपने साथ ले गये।बारहवीं की परीक्षा देने के बाद नित्या ने अपने नाना से पुलिस में भर्ती होने की इच्छा ज़ाहिर की है।नाना के सहयोग और अपनी मेहनत से नित्या ने प्रवेश-परीक्षा पास कर ली।

       प्रशिक्षण-प्रक्रिया पूरी होने के बाद महिला कांस्टेबल के रूप में नित्या की पहली नियुक्ति सहारनपुर थाने में हुई और माँ के साथ वह सहारनपुर आ गई।शहर छोड़ते समय रजनी बहुत रोई थी।पिता के देहांत पर वह दो दिनों के लिये बरेली गई थी और….।अब नित्या की पदोन्नति हो गई है और हेड कांस्टेबल बनकर उसका तबादला बरेली हो गया है।पूरे पाँच बरस बाद बरेली जाना…..।

    ” क्या मम्मी…आप अभी तक बैग खोलकर ही बैठी हैं।कहाँ खो गई थी…।” नित्या ने मुस्कुरा कर पूछा तो रजनी वर्तमान में लौटी।

  ” कुछ नहीं…पैकिंग कैसे करनी है…यही सोच रही थी कि तू आ गई।” कहते हुए वे दोनों बैग में कपड़े और अन्य ज़रूरी सामान रखने लगीं।

        उधर रजनी के ससुराल से चले जाने के बाद उसकी सास कुछ दिनों की ही मेहमान रहीं।उनकी मृत्यु का समाचार भी रजनी को दूसरों से मिला।कहते हैं ना कि सब दिन होत न एक समान।जेठ- जिठानियों को अपने बेटों पर जितना घमंड था,वो सब अब चूर होने लगा था।खानदान को रोशन करने वाले चिरागों की स्थिति डाँवाडोल होने लगी थी।सुबोध का बड़ा बेटा मोटापे का शिकार होकर अस्वस्थ रहने लगा।तंग आकर उसकी पत्नी ने भी साथ उसका छोड़ दिया।छोटे को जुए की लत लग गई जिसके कारण व्यापार में भी नुकसान में होने लगा।

   प्रमोद का बड़ा बेटा एक प्राइवेट फ़र्म में काम करता था।अपने ही सहकर्मी के साथ विवाह करके उसने माता-पिता को छोड़कर अपनी अलग गृहस्थी बसा ली थी और छोटा बेटा बुरी संगति में पढ़कर ड्रग्स का आदि हो गया था।एक दिन पहले पुलिस ने उसे बीच सड़क पर नशे ही हालत में देखा तो पकड़कर जेल में डाल दिया था।प्रमोद दौड़कर थाने पहुँचे।

       नित्या के थाने में ही प्रमोद का बेटा गिरफ़्तार हुआ था।प्रमोद जब इंस्पेक्टर से बेटे की रिहाई के लिये विनती कर रहे थे,तब वह वहीं थी।अपने छोटे ताऊ को वह पहचान गई।उसने इंस्पेक्टर से बात की और उसकी गारंटी पर इंस्पेक्टर ने प्रमोद के बेटे की ज़मानत दे दी।

       प्रमोद नित्या को पहचान नहीं पाये थे।वो उसे धन्यवाद देकर जाने लगे तब नित्या उन्हें ड्रग्स रिहैबिटेशन सेंटर का पता देते हुए बोली,” अंकल…आप इस सेंटर पर बेटे को ला जाईये…वह जल्दी ही ठीक हो जायेगा।” फिर उसने प्रमोद के बेटे को भीसमझाया।

        छह महीने के इलाज के बाद जब प्रमोद का बेटा ड्रग्स से फ़्री होकर एक नाॅर्मल ज़िंदगी जीने लगा तब प्रमोद नित्या को धन्यवाद देने थाने पहुँचे तो नित्या के साथ रजनी को देखकर चौंक गये।रजनी ने उन्हें प्रणाम किया और बताया कि नित्या आपकी भतीजी है।सुनकर वे बहुत खुश हुए और अपने व्यवहार के लिये दोनों से माफ़ी माँगी।नित्या को अपने सीने-से लगाते हुए बोले,” हमारे परिवार की शान है।”

          ज़िंदगी के उतार- चढ़ाव ने सुबोध की भी आँखें खोल दी थी।अगले ही दिन उसने भी पत्नी संग रजनी के घर जाकर उससे माफ़ी माँगी।

       पूरा परिवार फिर से एक हो गया था।सुबोध के बेटों  की दशा में भी सुधार होने लगा था।उनके व्यापार में भी नफ़ा होने लगा तब एक दिन प्रमोद रजनी के पास आये और एक निमंत्रण- पत्र देते हुए बोले,” रजनी….नित्या की सफलता और बेटों की खुशियाँ वापस मिलने की खुशी में हम एक पार्टी दे रहें हैं।तुम दोनों को आना है।” रजनी ने ‘ ज़रूर आएँगे ‘ कहकर उन्हें आश्वस्त कर दिया।

          पार्टी में रिश्तेदार-मित्र सभी आमंत्रित थें।उन्हें संबोधित करते हुए सुबोध बोले, ” मैं अब तक एक भ्रम में था कि खानदान का नाम बेटों से ही आगे बढ़ता है लेकिन हमारे परिवार की बेटी नित्या ने मेरे इस भ्रम को तोड़ दिया।अपनी मेहनत से उसने पुलिस-भर्ती परीक्षा को पास किया और शहर के एक थाने में हेड कांस्टेबल बनकर हमारे खानदान का नाम रोशन कर रही है।हम सभी को उस पर गर्व है।बेटियों को पढ़ाने और उसे आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की नहीं है, हम सबकी भी है।नित्या बेटी..यहाँ आओ..।” कहते हुए उन्होंने नित्या को अपने पास बुलाया तो तालियों से पूरा प्रांगण गूँज उठा।

       कल तक जो परिवार रजनी और उसकी बेटी को हिकारत से देखता था, खानदान के नाम पर उसे पीछे ढ़केलने का प्रयास करता रहा था,आज उसी के हाथों इतना सम्मान पाकर रजनी की आँखें खुशी से भर आईं।

                                     विभा गुप्ता

# खानदान                       स्वरचित 

             यह सच कि बेटों से खानदान आगे बढ़ता है लेकिन समय बदल रहा है।बेटियाँ हर क्षेत्र में अपनी सफलता के परचम लहरा रहीं हैं और अपने परिवार व खानदान का नाम रोशन कर रहीं है।इसे कहानी के पात्र सुबोध- प्रमोद ने भी स्वीकार किया।

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