कान्हा – जयसिंह भारद्वाज

डॉक्टर्स हैरान थे कि यह कैसा चमत्कार है वर्षों से शहर की सड़कों पर घूम रही एक पगली  को कूड़े के ढेर में एक नवजात शिशु क्या मिला, उसके सूख चले स्तनों से पयधार बह चली है।

तेईस वर्षीया मिथिला जब अस्पताल में अपने प्रथम प्रसव के लिए भर्ती हुई थी तब बहुत सी आशाओं, अपेक्षाओं और सपनों को भी सिरहाने रख लिया था।

अपरिहार्य कारणों से बच्चे के न बचाये जाने की बात जब मिथिला को पता चली तो उसे गहरा सदमा लगा और वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गयी। यह विक्षिप्तता इतनी भारी पड़ी कि उसके मायके और ससुराल दोनों से ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

मिथिला अगले दस वर्षों तक शहर की गलियों-सड़कों में नग्न-अर्धनग्न अवस्था में घूमती हुई नजर आती रही। इस बीच किसी महिला की गोद में उसके बच्चे को देख कर वह झपट पड़ती और ‘मेरा कान्हा’ ‘मेरा कन्हैया’  कह कर उसे छीनने का प्रयत्न करने लगती थी।

पिछली रात मनोचिकित्सक डॉ माथुर को अपने घर की बाउंड्री के बाहर से आ रही एक नवजात शिशु के रोने की आवाज जब सहन न हुई तो उसे देखने के लिए बाहर आये। रिमझिम बारिश में घर के बाहर आम के पेड़ के मोटे तने पर पीठ टिकाये मिथिला बैठी थी

और उसकी गोद में गंदगी से लिपटा हुआ एक शिशु था। डॉ माथुर हैरान थे यह देख कर कि मिथिला बार बार शिशु का मुँह कभी अपने एक स्तन से लगा रही थी तो कभी दूसरे से किन्तु दूध न निकलने के कारण बच्चा बिलख रहा था। 

डॉ माथुर के घर से प्रायः वस्त्र व भोजन-पानी मिलने के कारण मिथिला न केवल उन्हें पहचानती थी बल्कि उनकी बात का उत्तर भी देती थी। बातों बातों में उन्होंने उसका नाम जान लिया था। समीप जाकर डॉ माथुर ने कहा, “मिथिला”

चौंक कर मिथिला ने बच्चे को अपने से चिपटा लिया और उठ कर जाने लगी। तब डॉ माथुर ने कहा, “मिथिला, आओ अंदर आओ, बच्चे के लिए दूध और कुछ कपड़े ले लो नहीं तो सर्दी से तुम्हारा बच्चा मर जायेगा।



“तुम्हारा बच्चा” एवं “मरना” शब्द सुनकर झटका सा लगा मिथिला के मस्तिष्क में इसलिए जबतक डॉ माथुर गेट बंद करते तबतक वह बच्चे को गोद में उठा कर उनके बरामदे में पहुँच गयी।

डॉ माथुर घर कर अंदर गए और कुछ ही पलों में पत्नी के साथ बाहर आ गये। पत्नी ने बड़ी मुश्किल से मिथिला से बच्चे को लिया, साफ किया, कपड़े कपड़े पहनाये, एक कम्बल में लपेट कर निपल वाली बोतल में गुनगुना दूध भर कर बच्चे को लिटा कर उसके मुँह में लगा दिया और अपने पति को संकेत किया कि बोतल को पकड़ लें।

अब उन्होंने थरथरा रही मिथिला को पोछा, कपड़े पहनाये, उसे भी दूध व रोटी दी खाने के लिए फिर बच्चा उसे देकर पीछे बने सर्वेंट्स क्वार्टर में लेटने के लिए व्यवस्थित कर दिया।

जब चारपाई में बैठ कर मिथिला उस बच्चे के मुँह में लगी बोतल को एक हाथ से पकड़े हुए थी तब पास में बैठे डॉ माथुर उससे कुछ पूछते जा रहे थे। मिथिला ने रुक रुक कर जो बताया उसका सारांश यह था कि शाम को हुई तेज बारिश के समय जब वह बाहर आम के पेड़ के नीचे बैठी थी

तब एक महिला तेजी से आकर सामने के कूड़े के ढेर पर इस बच्चे को फेंक कर चली गयी थी। इसके रोने की आवाज़ सुनकर मिथिला भागकर उधर गयी औऱ बच्चे को उठा लायी थी।

डॉ माथुर ने उसे वहाँ पर आराम से लेटने की बात कह कर चले आये। अपने कक्ष में आकर उन्होंने अपने कुछ डॉ मित्रों और एडवोकेट से परामर्श किया और निर्णय लिया कि इस विषय की सूचना पुलिस को देकर मानवीय आधार पर मिथिला व बच्चे को एक अस्पताल में भर्ती करा दिया जाये।

अगले दिन सुबह जब मिसेज माथुर फीडिंग बोतल लेने के लिए मिथिला के पास गयीं तो देख कर भौंचक्क रह गईं कि कल तक सूखी लटकी मिथिला की छातियाँ आज दूध से भरी और फूली हुई हैं। मिथिला बड़े प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे पयपान करा रही थी। मिसेज माथुर को देख कर वह तनिक मुस्कुराई और फिर बच्चे को देख कर पूर्ववत उसके सिर पर हाथ फेरने लगी।



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अस्पताल के डॉक्टर व कर्मचारियों में मिथिला कुतूहल का विषय था। बच्चे को पयपान कराता देख कर लोग इसे ईश्वर का चमत्कार मान रहे थे। हैरान तो डॉक्टर भी थे किंतु वे इसे वैज्ञानिक भाषा में डिफाइन कर रहे थे।

डॉ माथुर के घर पर रह रही मिथिला का मानसिक असंतुलन अगले कुछ सालों में क्रमशः ठीक होता रहा और फिर डॉक्टर्स ने उसे नॉर्मल घोषित कर दिया। इसका श्रेय उस चमत्कारी बच्चे को दिया गया जिसे मिथिला कान्हा कहती थी। ठीक होने के समाचार जब अखबारों में छपे तो मिथिला व कान्हा को लेने के लिए ससुराल व मायके से लोग आए किन्तु मिथिला ने डॉ माथुर के घर के अलावा कहीं अन्यत्र जाने से मना कर दिया।

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डॉ माथुर का घर आज बिजली की लड़ियों से झिलमिला रहा है। मनोचिकित्सक डॉ कान्हा का विवाह शहर की कुशल प्रसूत व बाल रोग विशेषज्ञ डॉ अंजलि दवे के साथ हो रहा है। विदेश में बसे डॉ माथुर के बेटे व बेटी भी अपने परिवार के साथ आकर इस विवाह की व्यवस्था में व्यस्त हैं। मिसेज माथुर के बार बार समझाये जाने के बाद भी रेशमी साड़ी में लिपटी मिथिला कान्हा को देख देख कर रोये जा रही हैं। कान्हा के साथ जिये अभीतक के एक एक पल उनकी आँखों के सामने आए जा रहे थे।

सहसा सामने से आ रहे डॉ माथुर को देख कर मिथिला ने अपने आँसू पोछे और उनके पास जाकर उनके कदमों में झुकने लगी तभी बीच में ही उन्हें रोक कर डॉ माथुर ने कहा, “मैं पहले भी कई बार तुम्हें बता चुका हूँ मिथिला कि अपने यहाँ बहने भाई के पैर नहीं छूती हैं। मैं शुक्रगुजार हूँ कान्हा का जिसने मेरी विरासत को यहाँ और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी ले ली है क्योंकि मेरे बच्चे तो यहाँ लौटने से रहे। मेरे क्लिनिक, मेरे घर और हम दोनों पति पत्नी का उत्तरदायित्व भी अब कान्हा का ही है।” कह कर डॉ माथुर ने मिथिला के पैर छुए और विवाह कार्य के प्रबन्धों पर सूक्ष्म दृष्टि डालने लगे।

स्वरचित©जयसिंह भारद्वाज, फतेहपुर (उ.प्र)

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