जीते जी माँ बाप को अतृप्त रखने वालों को उनके श्राद्ध का हक नही ( भाग 1)- संगीता अग्रवाल

” दीदी कल पापा का पहला श्राद्ध है आपको याद है ना हमने बड़ी पूजा रखवाई है उनकी आत्मा की शांति के लिए तो आपको सपरिवार आना है!” नेहा अपनी ननद मानसी से फोन पर बोली।

“नहीं भाभी मैं नहीं आ पाऊंगी आपकी तो पता है इनको छुट्टी नहीं मिलेगी!” मानसी ने कसैले मन से कहा।

” अरे दीदी ऐसे कैसे उनके बेटी जमाई नहीं होंगे तो उनकी आत्मा कहां चैन पाएगी पापा के लिए आपको आना ही होगा मैं कुछ नहीं जानती बस !”  कह नेहा ने फोन रख दिया।

इधर मानसी खो गई पुरानी यादों में जब माँ की मृत्यु पर वो अपने पीहर गई थी…

” बेटा तेरी माँ चली गई मुझे अकेला छोड़ जाने किसके सहारे!”  पापा नम आँखों से बोले।

” पापा सब तो हैं यहां भाई भाभी बच्चे क्यों चिंता करते हो आप!” मानसी ने रोते हुए पिता से कहा। 

कुछ दिन मानसी पिता के साथ रहकर वापिस लौट आईं थीं। पर अक्सर फोन पर बात होती रहती थी। कभी कॉल तो कभी वीडियो कॉल।

” बेटा क्या बनाया है आज तूने!” एक दिन ऐसे ही वीडियो कॉल पर पापा ने पूछा।

” पापा गट्टे की सब्जी और जीरा आलू !” मानसी ने जवाब दिया।

” अरे वाह!” खाने का नाम सुन पापा की आंख में अनोखी चमक आ गई जिसे मानसी ने महसूस किया।

” आपका मन है तो भाभी को बोल दो वो बना देगी!” मानसी हंसते हुए बोली।

” नहीं नहीं इस उम्र में कहा बेसन झिलता है मैं तो बस वैसे ही बोल रहा था जब तेरी माँ जिंदा थी तब बहुत बनाती थी वो!” भाभी का नाम सुन पापा की आंखो से चमक गायब हो गई और उन्होंने  फोन रख दिया।

” पापा को क्या हुआ है क्यों ऐसा बोल रहे वो वहां सब ठीक तो है ना!” मानसी खुद से ही बोली।

ऐसे ही कितनी बार मानसी ने खाने की बात होने पर पापा की आंखों में चमक देखी पर कुछ समझ कर भी समझ ना पाई। 

लेकिन इसका राज भी जल्द ही खुल गया जब मानसी छुट्टियों में दो दिन के लिए मायके गई अपने।

“दीदी चल कर खाना खा लीजिये !” मानसी की भाभी नेहा मानसी से बोली मानसी उस वक़्त पापा के कमरे मे ही थी।
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आपकी दोस्त

संगीता

 

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