एक पिता ऐसे भी –  लतिका श्रीवास्तव #लघुकथा

……शादी की धूम धाम समाप्ति पर थी,मुझको  दो दिन हो गए थे ससुराल में आए हुए सुबह से लेकर शाम रात तक बहु देखने और मिलने वालों का तांता लगा हुआ था…अभी तक तो मैं अपने इस नए घर अपनी ससुराल के सभी कक्षों से ही परिचित नहीं हो पाई थी तो फिर घर के सदस्यों को भली भांति कैसे समझ पाती ….

चाहे कितनी भी पढ़ाई लिखाई कर लो पर ससुराल में तो नर्सरी के बच्चे जैसी ही फीलिंग आती है,डर,घबराहट,रैगिंग होने का खतरा…..और ससुराल मतलब सास ससुर!! सासूजी का स्वभाव तो मेरी समझ में काफी कुछ आ गया था,मेरी हर छोटी बड़ी जरूरत का ख्याल वही तो रख रही थी सुबह से ….

ननद कोई है नहीं और फिर मैं सबसे बड़ी बहू भी सबसे पहली भी…. लाड़ भी बहुत पर कायदा भी बहुत …हां तो ससुरजी मतलब मेरे पापाजी के नाम से ही मुझे बहुत डर लगता रहता था,सभी उनसे डरते थे….उनसे अभी तक मेरी ना तो ठीक से मुलाकात और ना ही कोई बात हुई थी……..शाम का समय था आने जाने वालो का तांता लगभग समाप्त हो चुका था,मैं थोड़ी देर आंख बंद करके लेटने ही वाली थी कि मम्मीजी ने आकर कहा,

  “पापाजी के ऑफिस का पूरा स्टाफ आया हैं,पापाजी ने तुम्हे मिलवाने के लिए तुरंत बुलवाया है,ठीक से तैयार होकर जाओ….”

मेरी हालत खराब हो गई ये सुनते ही…अरे मुझे क्यों बुलवा लिया,शादी में देख तो लिया होगा सबने अब फिर से अलग से मेरा परिचय करवाने की क्या जरूरत है….दिल में यही विचार दौड़ रहे थे…

ऐसा लग रहा था आज तक का सबसे बड़ा इंटरव्यू फेस करने जा रही हूं….पापाजी एग्रीकल्चर के असिस्टेंट डायरेक्टर थे उनका स्टाफ बहुत अपेक्षा रखेगा उनकी बहू से ,मेरी कोई बात पापाजी को बुरी ना लग जाए आखिर स्टाफ के सामने बहु को लाना ….तब तक मम्मीजी ने मुझे चाय नाश्ते की ट्रे थमाते हुए कहा ,ये लेती जाओ साथ में….मैने उनकी तरफ चिंता से देखा पर वो बिल्कुल निश्चिंत थी



अब मरता क्या ना करता वाली स्थिति थी मेरी ….ट्रे लेके ड्राइंग रूम की तरफ चल तो पड़ी पर घबराहट के मारे हाल बुरा था….ड्राइंग रूम के दरवाजे के पास पहुंची ही थी कि अंदर से आती बात चीत सुनकर थोड़ा रुक गई…”सर आपके कितने बच्चे हैं…”स्टाफ का कोई सदस्य  पापाजी से पूछ रहा था….मेरे पांच बच्चे हैं “पापाजी का स्वर उभरा….परंतु सर आपके तो चार बच्चे हैं ना….किसी ने आश्चर्य से पूछा….

  हां,पहले चार थे पर अब पांच हैं…पापाजी की गर्व और स्नेह मिश्रित आवाज आई…. मेरी सारी घबराहट छू मंतर हो गई जब पापाजी ने मुझे खड़ा देख कर मेरे पास आकर ट्रे लेते हुए कहा   “ये है मेरा पांचवा बच्चा.”…मेरी तो आंखों से खुशी के आंसू ही निकल आए,लगा कि अपने मायके में ही हूं,बहुत स्नेह से मुझे अपने पास पूरे सम्मान से बिठाया भी और मेरे ढेरों गुणों की तारीफ करते हुए गदगद हो गए…इतना सम्मान मुझे अकल्पनीय प्रतीत हो रहा था, और उसी क्षण मेरा दिल अपने इस पिता के लिए अगाध श्रद्धा और सम्मान से भर गया था।

सच में ये जो पिता मुझे शादी के बाद मिले उन्होंने केवल अपना बच्चा मुझे कहा ही नहीं बल्कि पूरी जिंदगी निभाया भी ,हर सुख दुख के मौकों पर मेरी सलाह और मेरी राय जाने बिना वो निर्णय नही लेते थे हालांकि इसके कारण उन्हें अपने रिश्तेदारों और कई बार मम्मीजी का भी कोप भाजन बनना पड़ता था ….बहुत ही सरल,सहज,उदार,और बहुत ज्यादा ख्याल और सम्मान से रखने वाले  स्नेही पिता…..आज वो इस दुनिया में नहीं हैं पर उनके साथ मैंने जो समय बिताया है वो अविस्मरणीय और अनुकरणीय है…..!!

पितृ दिवस पर अपने इस पिता को भी इस उदार मंच से श्रद्धा सुमन अर्पित करने की मेरी अभिलाषा आज साकार हुई उनका अदृश्य आशीर्वाद भरा हाथ हमेशा साथ रहे

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