भरवाँ बैंगन – नीरजा कृष्णा

“अरे, सुबह से क्या खटर पटर कर रही हो?” अलसाए हुए माधव जी ने अपनी पत्नी मीरा को टोक ही दिया।

 

“वो… वो…कुछ खास नहीं। आज मोतियाबिंद का ऑपरेशन होना है। फिर आठ दस कुछ देख सुन नहीं पाऊँगी ना।”

 

वो चिढ़ गए,”इतनी सुबह फ्रिज में क्या हीरे मोती देख सुन रही हो?”

 

वो उत्साह से बोलीं,”ये अमरूद का जैम पीछे पड़ा रह गया था, हल्की फफूंदी सी आ गई है। मालती के आने से पहले ठीकठाक करके उसके बच्चों के लिए दे दूँगी। और ये चार रसगुल्ले भी पड़े रह गए थे। उसके बच्चे खा लेंगें।”

 

वो तपाक से उठ कर आए,”देखो मीरा, तुम ये पड़ी गली चीजें मालती के बच्चों को न दिया करो। नुक्सानदेह होती हैं।”

 

वो अनसुना करके बोली,”अरे बड़े मजबूत पेट होते हैं इन लोगों के। खाकर खुश ही होंगे।”

 



शाम को मीरा ऑपरेशन के बाद लेटी थी। तभी मालती अंदर आई और बोली,”रात का खाना बना कर टेबल पर सजा दिया है। भोला खिला देगा। मैं घर जा रही हूँ।”

 

दस मिनट बाद गेट से पुनः लौटी। माधव बाबू आश्चर्य से देखने लगे,”क्या बात है…तुम गई नहीं?”

 

वो धीरे से बोली,”आज भरवां बैंगन भी बना दिए हैं पर मैडम को मत दीजिएगा। भोला को कुछ समझ नहीं हैं।”

 

वो कह  बैठे,” पर भरवां बैंगन तो मीरा को बहुत पसंद हैं।”

 

“पर भैया, उनका ऑपरेशन हुआ है ..उनको नुक्सान करेगा।”

 

वो हैरानी से कभी मीरा को देख रहे थे और कभी मालती को।

 

नीरजा कृष्णा

पटना

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