तीसरी बेटी – रीता मक्कड़

“मम्मी कहाँ हो आप,जल्दी से मुंह मीठा कराओ आज पहला दिन है न मेरे ड्यूटी जॉइन करने का..”

जैसे ही अनिता ने अपनी बिटिया के मुँह में दही चीनी डाली उसने अनिता के पांव छू लिए ..साथ ही अपने पापा के भी।

“अरे नही बिटिया..हमारे में बेटियां पांव नही छूती.. बस गले लग कर मां बाप का आशीर्वाद लेती हैं।”

ये सुनते ही तनवी बिटिया अपने माँ पापा दोनो के एक साथ गले लग गयी और बोली,”पर मोम डैड आप तो हमेशां कहते हो मैं आप का बेटा हूं।सच में आप दोनो तो मेरे मां बाप ही नही मेरे भगवान हो, मेरी जान हो,आप से ही तो मेरा वजूद है।”


“अच्छा चलो अब ज्यादा इमोशनल मत करो कहीं पहले दिन ही ड्यूटी पर जाने में देर न हो जाये ,चलती हूं”

कहते हुए तनवी जल्दी से निकल गयी।

उसके जाने के बाद अनिता ज्यों ही कमरे में आकर बैठी यादों के चक्रव्यूह ने उसको अपने घेरे में ले लिया ।सालों पहले की वो बातें जो आज भी उसके दिमाग में हमेशां ऐसे तरोताज़ा लगती हैं जैसे कल की बात हो। जब बिज़नेस में होने वाले नुकसान की वजह से पति मनीष बहुत ज्यादा परेशान थे।तब अचानक से उनको किसी ने बोल दिया कि अगर इन मुश्किलों से बाहर निकलना है तो तुम्हे एक बच्चा और अपने घर मे लाना ही होगा जबकि तब तक वो अपनी दोनो बेटियों के साथ बहुत खुश थे लेकिन उस बन्दे ने अपनी बातों से मनीष को इस कदर उलझा लिया कि उन्होंने अनिता को भी इस बात के लिए मना लिया कि वो चांस लेंगे और तीसरा बच्चा अवश्य लाएंगे।

फिर जब अनिता मां बनने वाली हुई तो सबके दिमाग में बस एक ही बात थी कि इस बार तो बेटा ही होना चाहिए। परिवार में सबको इस बात की बहुत टेंशन भी थी कि कहीं इस बार भी लड़की न हो जाये।तब किसी रिश्तेदार ने उनको बोला कि हमारी बेटी मां नही बन सकती ,अगर बेटी हुई तो वो उस बच्चे को गोद ले लेगी और लड़का हुआ तो वो आप रख लेना। अनिता के सास ससुर और यहां तक कि मनीष भी इस बात के लिए तैयार हो गए।दिन रात सब भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि लड़का हो जाये। लेकिन अनिता मन ही मन बहुत डरी हुई थी कि अगर लड़की हुई तो वो उसको देनी पड़ेगी।


कैसे वो अपने जिगर के टुकड़े को किसी और की झोली में डाल सकेगी।आखिर में वो दिन भी आ गया जब अनिता ने सुबह अस्पताल में जाना था।रात को सारी रात वो सो नही पाई बार बार उसको यही ख्याल आता रहा कि वो अपना बच्चा किसी और को दे कर कैसे जी पाएगी।सुबह होने से पहले ही उसने मन ही मन एक फैसला ले लिया और हॉस्पिटल जाने से पहले घर पर सबको बोल दिया कि बेटा हो या बेटी वो अपना बच्चा किसी और को नही देगी।उसका फैसला सुनकर मनीष और बाकी सभी घरवाले पहले तो बहुत हैरान हुए फिर सभी ने उसका ही साथ दिया।

“कहाँ खो गयी अनिता..आज कुछ खाने को मिलेगा कि नही,अरे भई अपनी बिटिया कलेक्टर बन गयी है कुछ मीठा तो बनाओ न आज घर मे”

“जी अभी लाती हूं”कहते हुए अनिता उठकर रसोईघर की तरफ चल दी ।सोच रही थी कि आज ये तीसरी बेटी न होती तो वो दोनो कितने अकेले होते।बड़ी दोनो बेटियां तो पढ़लिख कर विदेश चली गयी और शादी करके वहीं पर सेटल हो गयी ।अब इस उम्र में एक यही तो है जो बेटा बनकर हमारी देखभाल कर रही है और उसने तो ये भी बोल रखा है कि शादी भी उसी लड़के से करूंगी जो मेरे मां बाप के साथ इसी घर में रहेगा।

स्वरचित एवं मौलिक

#बेटी _हमारा_स्वाभिमान

रीटा मक्कड़

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