सरिता – भगवती सक्सेना गौड़

सरिता के मोबाइल की घंटी बहुत देर से हल्ला मचा रही थी, दौड़कर बोली, “हल्लो, मम्मा, कैसी हो।”

“ठीक हूँ, बेटा, तुमसे बात करने का मन कर रहा था, रातभर व्याकुल रही।”

“अरे क्या हो गया, कुछ गाने, भजन सुन लो, कारवां ऑन करो, तुम्हे तो गाने बहुत पसंद है।”

“अरे वो सब ठीक है, तुम्हारे पापा के जाने के बाद अकेलापन लगता ही है। गर्व और गरिमा बहू अभी तक तो बहुत खयाल रखते थे, कुछ दिनों से मेरी बात नही मानते।”

“क्या हुआ, साफ साफ बोलो।”

“तुम तो जानती हो, कोरोना काल में गरिमा ने मेरी इतनी सेवा करी, कि मैंने अपना बैंक एकाउंट, एफडी सब उनको दे दो, उनलोगों ने एक बढ़िया फ्लैट खरीद लिया। अब यहां से सारा सामान चला गया, मंती बिटिया मेरे पास है। कल से नए घर मे खाना भी बन रहा, राजू काका आकर दे जाते हैं, कैसे लोग हैं मुझे भूल गए।”

“नहीं मम्मा, बेकार के बातें मत सोचो, आराम करो।”

दूसरे दिन सुबह ही सरिता को देखकर वसुंधरा जी चकित रह गयी, “अरे कल तो बात हुई, तुमने बताया नही कि आ रही हो।”

“अब कुछ बोलिये मत, ये नई साड़ी पहनिए, कहीं जाना है।”

और वसुंधरा जी सज धज कर तैयार हो गयी, मंती नद भी नए कपड़े पहने।

सरिता मम्मी और भतीजी को लेकर नीचे आयी, एक गुब्बारे से सुसज्जित कार में वसुंधरा जी को बैठाया।



“कहाँ जाना है।”

“अरे मम्मा, चिल, आपको एक बढ़िया जगह ले जा रही।”

वसुंधरा जी चिंतित हो गयी थी, कहीं ऐसा तो नही, ये सबलोग मिलकर मुझे वृद्धाश्रम पहुँचा रहे।

आधे घंटे में एक बड़ी सी सोसाइटी की पार्किंग में कार रुकी। सरिता ने उन्हें पकड़कर आराम से लिफ्ट तक पहुँचाया। जैसे ही 20वे फ्लोर में पहुँचे, वसुंधरा जी को बहुत से लोगो ने घेर लिया, सारे रिश्तेदार थे।

धीरे धीरे आगे बढ़ी, एक फ्लैट के सामने उन्हें अपना नाम नजर आया  “वसुंधरा कुटीर”

आष्चर्यचकित हो सब देख रही थी, तब तक आरती की थाल लिए बेटा बहू घर के दरवाजे पर आए, माँ की आरती उतारी, कुमकुम लगाया। अब वसुंधरा जी सकते में थी और  उनकी आंखों से गंगा जमुना बहकर वातावरण को पवित्र कर रही थी। तभी फूलों से सुसज्जित एक परात में आलता और गुलाब के फूलों में उन्हें पैर डालना पड़ा, बहुत मना किया, पर सबके जोर देनेपर वो सब करती गयी। अंदर गयी, तो पंखा किसी ने चलाया, उनके ऊपर फूलों की वर्षा हो गयी। अंदर बड़े हाल में पंडित जी बैठे उनका इंतेज़ार कर रहे थे, सत्यनारायण कथा की तैयारी थी।

वो बोल पड़ी, “गरिमा, तुम पूरे परिवार की गरिमा बन गयी हो, एक दिन मैंने तुम्हारा गृह प्रवेश कराया था, आज नई रीत चलाकर तुमने मेरा गृह प्रवेश कराया, सास बहू के रिश्ते को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया और गर्व बेटा आज मुझे तुम पर और तुम्हारे नाम के सार्थक होने पर गर्व है। तुम्हारे प्रयास के बिना कुछ भी संभव नहीं।”

सरिता मुस्कराकर पूछ बैठी, और मम्मा, अब आंसू पोछो, जोर से हंसो।”

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

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